वार्ता से दिल्ली की घटेगी दूरी, आखिर क्या चाहते हैं कश्मीर के लोग

कश्मीर पर वार्ता से पहले एक कमेटी ने वहां का दौरा किया था और कश्मीरी अवाम से बातचीत करके एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसे इस समिति ने केंद्रीय गृहमंत्री को सौंपा था. उन्होंने कश्मीर में शांति के लिए करीब 22 प्वाइंट सुझाव के दिए थे.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महबूबा मुफ्ती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महबूबा मुफ्ती

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 24 अक्टूबर 2017,
  • अपडेटेड 12:36 PM IST

15 अगस्त के मौके पर लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र ने तीसरे साल के संबोधन में कहा था- कश्मीर समस्या का समाधान न गाली से, न गोली से, बल्कि कश्मीरियों को गले लगाने से होगा. मोदी के इस बयान के 68 दिन बाद केंद्र सरकार ने कश्मीरी अवाम से बातचीत की पहल को दोबारा शुरू करने का कदम उठाया है. घाटी में मोदी सरकार की बात पूर्व IB चीफ दिनेश्वर शर्मा रखेंगे. माना जा रहा है कि इस वार्ता से कश्मीरी अवाम के दिलों में जमी बर्फ पिघलेगी और घाटी की दिल्ली से दूरी भी घटेगी.

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कश्मीर शांति के 22 सुझाव

बता दें कि नरेंद्र मोदी के 15 अगस्त वाले बयान के दूसरे दिन ही बीजेपी से जुड़े एमजे खान के नेतृत्व में चार सदस्यों की कमेटी ने कश्मीर समस्या का समाधान तलाशने जम्मू-कश्मीर का दौरा किया था. कश्मीर में शांति का संदेश लेकर जाने वाली कमेटी में बीजेपी सदस्य एमजे खान के अलावा पूर्व राज्यसभा सदस्य शाहिद सिद्दीकी, विदेश मामलों के जानकार कमर आगा और पूर्व न्यायाधीश इशरत मसरूर कुद्दूसी शामिल थे. उन्होंने कश्मीरी अवाम से बातचीत करके एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसे इस समिति ने केंद्रीय गृहमंत्री को सौंपा था. उन्होंने कश्मीर में शांति के लिए करीब 22 प्वाइंट सुझाव के दिए थे.

दिल्ली से नाराजगी और उम्मीदें दोनों

शांति का संदेश लेकर जाने वाले एम जे खान ने आज तक के साथ खास बातचीत में कहा कि उनकी समिति ने कश्मीर की सिविल सोसाइटी के लोगों से, धार्मिक रहनुमाओं, गुर्जरों, पहाड़ियों, महिला संगठनों और नई पीढ़ी के युवा नेताओं के साथ मिलकर बातचीत करके माहौल को समझने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि कश्मीरी आवाम दिल्ली से नाराज है, लेकिन साथ ही दिल्ली की तरफ उम्मीद भरी नजरों से भी देखते हैं.

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आशांति नहीं शांति के माहौल में हो बात

समिति का मानना है कि कश्मीर में अशांति के माहौल में सरकारें सक्रिय होती हैं, लेकिन ऐसे माहौल में बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकलता है. जबकि वहां की आवाम चाहती है कि शांति के माहौल में सरकारों को कश्मीरी आवाम से वार्ता करनी चाहिए. आशांति के माहौल में कोई काम नहीं हो पाता है. एम जे खान ने कहा कि पहली बार है कि मोदी सरकार ने कश्मीर में शांति के माहौल में बातचीत की पहल शुरू की है. ये कश्मीर के लिए सकारात्मक कदम है.

कश्मीर मुद्दे पर टीवी चर्चाओं से बिगड़ता माहौल

एमजे खान का कहना है कि कश्मीर मुद्दे को लेकर टीवी पर होने वाली चर्चाओं से कश्मीरी अवाम अपना एप्रोच बनाता है. कश्मीरी अवाम का बाकी देश से जुड़ाव कम है, ऐसे में जब टीवी पर बहस होती है तो कश्मीरी उसे पूरे हिंदुस्तान का विचार मानकर अपनी सोच बना लेते हैं. उन्हें लगता है कि देश के भर की अवाम उन्हें ऐसी ही देखती है. ऐसे में हमें टीवी पर कश्मीर को लेकर नकारात्मक चर्चा से बचने की जरूरत है. पिछले कुछ दिनों में टीवी पर कश्मीर को लेकर चर्चाएं कम हुई हैं.

कश्मीरियों से बातचीत बंद न हो

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वहां के लोगों का ये भी मानना है कि कश्मीर से बातचीत का सिलसिला जब शुरू हो तो लगातार जारी रहना चाहिए. बातचीत के सिलसिले को बंद नहीं किया जाना चाहिए. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी लगातार बातचीत के सिलसिले को जारी रखना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने पाकिस्तान से आगरा वार्ता के दौरान कहा था कि कश्मीर को लेकर एक कदम तुम पीछे करो और एक कदम हम. इस तरह दो कदम जगह होगी बात के लिए.

कश्मीरियों का भरोसा केंद्रीय संस्थानों पर

कश्मीर में गवर्नेंस में सुधार की जरूरत है. कश्मीरी आवाम का भरोसा स्टेट से ज्यादा केंद्रीय संस्थानों पर है. कश्मीरी मानता है कि स्टेट के संस्थानों में भाई, भतीजावाद और भ्रष्टाचार है. जबकि केंद्रीय संस्थानों में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद कम है.

कश्मीर का नेचर सूफीज्म

कश्मीर का नेचर सूफीज्य वाला रहा है. सूफीज्य के मानने वाले धर्मनिरपेक्षता में भरोसा रखते हैं. सरकार को चाहिए कि कश्मीर में सूफीज्य के संस्थान स्थापित करे. क्योंकि वहाबिज्म कश्मीर में अपने पैर पसारने की कोशिश कर रहा है, जिसे सूफीज्म के जरिए काउंटर किया जा सकता है.

जम्मू की तुलना में कश्मीर के साथ भेदभाव

कश्मीरी अवाम को लगता है कि जम्मू की तुलना में कश्मीर में कम विकास होता है. केंद्र की सरकार जम्मू का ज्यादा फेवर करती है. इसके लिए कश्मीर की आवाम जुबानी आकड़े भी बताते हैं. उनका कहना है कि कश्मीर में कोई सरकारी प्रोजेक्ट शुरू होता है, तो काफी समय के बाद पूरा होता है. चाहे रोड का मामला हो या फिर बिजली आदि. जबकि जम्मू में उसे समय से पहले पूरा कर लिया जाता है. इतना ही नहीं केंद्र सरकार के संस्थान भी जम्मू में ज्यादा लगाए जाते हैं.

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कश्मीर में लोकतंत्र

कश्मीरी अवाम का लगता है उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया जाता है. उन्हें लगता है कि जो हिंदुस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था है वह कश्मीर में नहीं है. कश्मीरी आवाम का मानना है कि वो अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हैं तो पुलिस उन पर गोली चलाती हैं, वहीं हरियाणा और कर्नाटक में लोग बसों को जला देते हैं और हिंसक हो जाते हैं तो पुलिस उनके साथ कोई किसी तरह का हिंसक रवैया नहीं अख्तियार करती है. ऐसे में कश्मीर के साथ क्यों ऐसा बर्ताव किया जाता है.

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