₹10 हजार के बदले देने पड़ेंगे 3.28 लाख... ATM से नहीं निकले पैसे और कट गया था बैलेंस, 9 साल बाद बैंक को मिली बड़ी सजा

सूरत के एक आम ग्राहक की 9 साल लंबी कानूनी लड़ाई ने बैंकिंग जगत के लिए एक बड़ी मिसाल पेश की है. सूरत जिला उपभोक्ता आयोग ने SBI के ATM से पैसे न निकलने और खाते से राशि कट जाने के मामले में बैंक ऑफ बड़ौदा को सेवा में गंभीर कमी का दोषी पाया है.

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ATM से पैसे न निकलने पर बैंक की लापरवाही पड़ी महंगी.(Photo: Representational) ATM से पैसे न निकलने पर बैंक की लापरवाही पड़ी महंगी.(Photo: Representational)

संजय सिंह राठौर

  • सूरत ,
  • 19 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 8:37 PM IST

गुजरात के सूरत शहर में एक ATM लेन-देन से जुड़ा  मामला सामने आया है. इसमें ATM मशीन से नकदी न निकलने के बावजूद ग्राहक के खाते से 10 हजार रुपये कट गए थे. सूरत जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बैंक को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाया है और 10 हजार के बदले ग्राहक को 3.28 लाख रुपये चुकाने का आदेश दिया है.

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शिकायतकर्ता जितेश कुमार गांधी सूरत के पर्वत पाटिया, दुंभाल इलाके के निवासी हैं. उन्होंने 20 दिसंबर 2017 को सूरत जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें बैंक ऑफ बड़ौदा की दुंभाल शाखा और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की उधना शाखा को पक्षकार बनाया गया था. 

शिकायत में बताया गया कि उन्होंने बैंक ऑफ बड़ौदा की दुंभाल शाखा में बचत खाता खुलवाया था और लंबे समय से ATM कार्ड का उपयोग कर रहे थे.

18 फरवरी 2017 की रात को उन्होंने उधना स्थित एक ATM मशीन से 10 हजार रुपये निकालने का प्रयास किया. मशीन से न तो नकदी निकली और न ही रसीद मिली, लेकिन खाते से 10 हजार रुपये डेबिट होने का संदेश उनके मोबाइल पर आ गया. घटना के बाद ग्राहक ने बैंक से संपर्क किया और लिखित शिकायत भी दर्ज कराई. 

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इसके अलावा, उन्होंने ईमेल के माध्यम से बैंक, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया तथा अन्य संबंधित अधिकारियों को भी सूचित किया. बावजूद इसके लंबे समय तक न तो राशि वापस की गई और न ही कोई संतोषजनक जवाब मिला.

बैंक ने बचाव में कहा कि संबंधित ATM मशीन स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की थी और उनके रिकॉर्ड में लेन-देन सफल दिख रहा था. साथ ही CCTV फुटेज उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी दूसरी बैंक पर डाली गई.

आयोग ने सुनवाई के दौरान पाया कि बैंक ग्राहक को ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया कि वास्तव में ग्राहक को नकदी मिली थी. साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार ऐसी स्थिति में निर्धारित समय-सीमा के भीतर खाते में राशि वापस करनी जरूरी थी, जो नहीं की गई. इस आधार पर आयोग ने बैंक ऑफ बड़ौदा को निर्देश दिया कि वह ग्राहक को 10 हजार रुपये की राशि ब्याज सहित वापस करे. 

इसके अतिरिक्त देरी के लिए प्रतिदिन 100 रुपये का भुगतान करने तथा मानसिक पीड़ा के लिए 3000 रुपये और वाद-व्यय के रूप में 2000 रुपये देने का भी आदेश 26 फरवरी 2026 को दिया गया.

जानिए पूरा मामला

यह मामला 18 फरवरी 2017 का है, जब उधना इलाके में ग्राहक SBI के ATM से 10 हजार रुपये निकालने गया था. ग्राहक ने कार्ड डालकर PIN दर्ज किया, लेकिन मशीन से न कैश निकला और न रसीद मिली. कुछ ही देर में मोबाइल पर मैसेज आया कि खाते से 10 हजार रुपये डेबिट हो चुके हैं.

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इसके बाद जितेश गांधी ने 21 फरवरी को बैंक ऑफ बड़ौदा की दुंभाल शाखा में लिखित शिकायत दर्ज कराई और मार्च से मई 2017 के बीच कई बार ईमेल से फॉलो-अप किया.

CCTV के लिए RTI भी लगाई

उन्होंने RBI और संबंधित अधिकारियों से भी शिकायत की तथा SBI से CCTV फुटेज प्राप्त करने के लिए RTI भी दाखिल की, लेकिन कहीं से संतोषजनक जवाब नहीं मिला. अंततः थक-हारकर उन्होंने 20 दिसंबर 2017 को उपभोक्ता फोरम का रुख किया.

सुनवाई के दौरान बैंक ऑफ बड़ौदा ने दलील दी कि ATM SBI का था और ट्रांजैक्शन उनके रिकॉर्ड में सफल दिख रहा है, इसलिए उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती. उपभोक्ता आयोग ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ग्राहक का इससे कोई लेना-देना नहीं है और ट्रांजैक्शन से जुड़ा ठोस सबूत पेश करना बैंक की जिम्मेदारी है. 

9% ब्याज सहित लौटानी होगी राशि

आदेश में यह भी कहा गया कि RBI के नियमों के अनुसार 5 दिनों के भीतर राशि वापस की जानी चाहिए थी, लेकिन बैंक इसमें विफल रहा. आयोग ने फैसले में बैंक ऑफ बड़ौदा को निर्देश दिया कि ग्राहक को 10 हजार रुपये की मूल राशि 9% वार्षिक ब्याज सहित लौटाई जाए. साथ ही देरी के लिए 100 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा भी दिया जाए. 26 फरवरी 2026 तक 3 हजार 288 दिनों की देरी के कारण यह मुआवजा 3 लाख 28 हजार 800 रुपये तक पहुंच गया. 

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यह भी पढ़ें: ATM ठगी में 'नेता जी' बेनकाब! सूरत में कार्ड बदलकर उड़ाए 25 हजार, यूपी का जिला पंचायत सदस्य गिरफ्तार

इसके अलावा, 3000 रुपये मानसिक पीड़ा और 2000 रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने के निर्देश दिए गए. आदेश में स्पष्ट किया गया कि यह अंतिम आदेश है और इसका पालन आदेश की तारीख से 30 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से किया जाना होगा.

यह फैसला एक कड़ा संदेश देता है कि यदि बैंक ग्राहक की शिकायतों को नजरअंदाज करते हैं और समय पर कार्रवाई नहीं करते, तो उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. यह मामला न केवल बैंकिंग सिस्टम की लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि लंबी लड़ाई के बाद न्याय जरूर मिलता है.

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