जेल से बाहर आए सोनम वांगचुक, बोले- लड़ाई अभी खत्म नहीं, पूरी हों लद्दाख की मांगें

करीब छह महीने हिरासत में रहने के बाद रिहा हुए सोनम वांगचुक ने दिल्ली में कहा कि उनकी लड़ाई पूरे लद्दाख के हक की है. उन्होंने अनशन को मजबूरी बताया और सरकार के बातचीत प्रस्ताव का स्वागत किया. साथ ही स्पष्ट किया कि सिक्स्थ शेड्यूल और राज्य का दर्जा जैसी मांगें पूरी होने पर ही असली जीत मानी जाएगी.

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रिहाई के बाद सोनम वांगचुक का पहला बयान (Photo: ITG) रिहाई के बाद सोनम वांगचुक का पहला बयान (Photo: ITG)

जितेंद्र बहादुर सिंह

  • नई दिल्ली ,
  • 17 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 5:59 PM IST

करीब 6 महीने हिरासत में रहने के बाद रिहा हुए लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने मंगलवार को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी बात रखी. उन्होंने साफ कहा कि यह लड़ाई सिर्फ उनकी नहीं बल्कि पूरे लद्दाख के लोगों की है और वह इसे तभी जीत मानेंगे जब लद्दाख का असली भला होगा.

सोनम वांगचुक ने कहा कि वह व्यक्तिगत जीत को महत्वपूर्ण नहीं मानते. उनके लिए असली जीत तब होगी जब लद्दाख के लोगों की मांगें पूरी होंगी और वहां के भविष्य को सुरक्षित किया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि जेल में रहते हुए भी उन्हें पूरा भरोसा था कि न्याय मिलेगा और कोर्ट में उनकी जीत होगी.

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साथ ही उन्होंने कहा कि उन्हें पहले से विश्वास था कि अदालत में उनका पक्ष मजबूत है. जेल में रहते हुए भी यही भरोसा बना रहा. लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि पूरे समाज की है और इसका परिणाम भी समाज के हित में होना चाहिए.

रिहाई के बाद वांगचुक का पहला बयान

रिहाई के बाद केंद्र सरकार की तरफ से बातचीत की पेशकश पर वांगचुक ने सकारात्मक रुख दिखाया. उन्होंने कहा कि सरकार के इस कदम से वह खुश हैं और इसे एक विन विन सिचुएशन मानते हैं. उनके अनुसार इससे सरकार की छवि भी बेहतर होगी और आंदोलन कर रहे लोगों को भी अपनी बात रखने का मौका मिलेगा.

इसके अलावा उन्होंने कहा कि लद्दाख में जो भी आंदोलन हुए हैं, उनका उद्देश्य हमेशा से संवाद शुरू कराना रहा है. उन्होंने बताया कि लोग लेह से दिल्ली तक पैदल चले, अनशन किया और कई तरह के शांतिपूर्ण तरीके अपनाए, सिर्फ इसलिए कि सरकार बातचीत शुरू करे.

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वांगचुक ने कहा कि वह खुद अनशन करना नहीं चाहते थे, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया. उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति भूखा रहना नहीं चाहता, लेकिन जब मजबूरी होती है तो ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने यह तरीका महात्मा गांधी से सीखा है.

अनशन को बताया मजबूरी, गांधी से ली प्रेरणा

जेल के अनुभव को साझा करते हुए वांगचुक ने कहा कि उन्होंने खुद को पूरे 12 महीने जेल में रहने के लिए मानसिक रूप से तैयार कर लिया था. हालांकि जेल में रहना आसान नहीं था, लेकिन वहां के अनुभव ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया. उन्होंने कहा कि जेल में अपनी बात बाहर पहुंचाना मुश्किल था, यहां तक कि वकीलों और पत्रकारों तक भी अपनी बात पहुंचाना चुनौतीपूर्ण था.

इसके अलावा उन्होंने बताया कि जेल में सब कुछ बुरा नहीं था. वहां के लोग दयालु थे और उन्होंने कई नई चीजें सीखी. उन्होंने यह भी कहा कि सभी को जीवन में एक बार जेल का अनुभव जरूर लेना चाहिए ताकि समाज के उस हिस्से को समझा जा सके जो अक्सर नजरअंदाज हो जाता है.

वांगचुक ने जेल के माहौल का जिक्र करते हुए कहा कि वहां कैदियों का एक बैंड भी होता है, जिसे बाहर कार्यक्रमों में भेजा जाता है और उन्हें इसके लिए भुगतान भी मिलता है. उन्होंने जेल के खाने को लेकर भी कहा कि उन्हें खाना खराब नहीं लगा और वहां अंकुरित मूंग और चने जैसे साधारण लेकिन पोषक आहार मिलते थे.

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सरकार के संवाद प्रस्ताव का किया स्वागत

उन्होंने यह भी कहा कि जेल में करीब 70 प्रतिशत लोग गरीब और अनपढ़ तबके से आते हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ये लोग जेल क्यों पहुंच रहे हैं और कौन उन्हें वहां तक पहुंचा रहा है. उनके अनुसार समाज और व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है ताकि ऐसे लोगों को बेहतर शिक्षा और अवसर मिल सकें.

लद्दाख में 24 सितंबर को हुई हिंसा का जिक्र करते हुए वांगचुक ने कहा कि उस घटना की जांच होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि यह समझना जरूरी है कि हिंसा कैसे भड़की और इसके पीछे क्या कारण थे. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अब आगे बढ़ने का समय है और लद्दाख में फिर से सकारात्मक माहौल बनाना जरूरी है.

वांगचुक ने कहा कि सरकार और उनकी तरफ से बातचीत के संकेत मिल रहे हैं, जो एक अच्छी बात है. लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लद्दाख की मुख्य मांगें अभी भी अधूरी हैं. इनमें सिक्स्थ शेड्यूल, राज्य का दर्जा और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दे शामिल हैं.

जेल के अनुभव और व्यवस्था पर उठाए सवाल

उन्होंने कहा कि अब सबकी नजर इस बात पर है कि केंद्र सरकार और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत कब और कैसे आगे बढ़ती है. उन्होंने उम्मीद जताई कि यह बातचीत सिर्फ औपचारिक न होकर ठोस नतीजे देने वाली होगी.

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वांगचुक ने कहा कि अगर बातचीत से समाधान नहीं निकला तो संघर्ष लंबा भी चल सकता है. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ छह महीने का मामला नहीं है, बल्कि जरूरत पड़ी तो यह संघर्ष छह साल तक भी चल सकता है.

उन्होंने न्यायपालिका पर भी भरोसा जताया और कहा कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान उनका विश्वास और मजबूत हुआ है. उन्होंने कहा कि अदालत में जो कुछ हुआ, उससे उन्हें न्याय मिलने का भरोसा और बढ़ा है.

लद्दाख की मांगों पर आगे भी जारी रहेगा संघर्ष

अंत में वांगचुक ने कहा कि वह जल्द ही लद्दाख लौटेंगे और वहां के नेताओं से बातचीत करेंगे. इसके बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी. उन्होंने कहा कि उनका मकसद हमेशा से शांतिपूर्ण तरीके से समाधान निकालना रहा है और आगे भी वही प्रयास जारी रहेगा.

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