ईरान-अमेरिका/इजरायल जंग को 15 दिन बीत चुके हैं. बीतते वक्त के साथ भारत की हवा में मानो रसोई गैस संकट की बेचैनी भी घुलती जा रही है. गैस एजेंसियों से भीड़ की तस्वीरें लगातार आ रही थीं. ऐसे में सोचा, चलकर गैस गोदाम का हाल देखा जाए. घर से करीब ढाई किलोमीटर का रास्ता था. निकल पड़े.
रास्ता जैसे खुद कहानी सुनाने लगा. कोई बाइक पर सिलेंडर लादे चला जा रहा था, कोई बैटरी रिक्शा में खाली सिलेंडर टिकाए बैठा था, तो कोई साइकिल पर रस्सी से बांधकर लिए जा रहा था.
दरअसल, सिस्टम सीधा है. आपने सिलेंडर बुक किया, फिर आपको DAC नंबर मिला. इसके बाद दो-तीन दिन में सिलेंडर आपके घर पहुंच जाना चाहिए. लेकिन जमीन पर तस्वीर अभी कुछ और है. एजेंसी की अपनी दिक्कतें हैं, और ग्राहकों का सब्र भी जवाब दे रहा है.
नतीजा ये कि लोग बुकिंग के बाद इंतजार करने के बजाय खुद ही खाली सिलेंडर उठाकर एजेंसी पहुंच रहे हैं. एक ही बात... लो मेरा खाली सिलेंडर, भरा हुआ दे दो.
ऐसे में एजेंसी भी हाथ खड़े कर रही है. स्टॉक न होने की बात कहकर लोगों को सीधे गोदाम का रास्ता दिखा दिया जाता है. फिर वही सिलेंडर, वही लोग… और गोदाम के बाहर लंबी होती कतार.
शास्त्री पार्क के इस गोदाम में लोगों के साथ खाली सिलेंडर भी लाइन में थे. कोई उन्हें घसीटकर आगे बढ़ा रहा था, कोई हाथ-पैरों से धकेलकर. कतार धीरे-धीरे खिसक रही थी... लोग भी, सिलेंडर भी.
तब ही भीड़ को चीरता हुआ एक शख्स कंधे पर भरा हुआ सिलेंडर लादकर निकला. चेहरे पर हल्की मुस्कान. पास आया तो खुद ही बोल पड़ा, 'भाई, तीन दिन से लाइन में लगा था… अब जाकर मिला है.'
उसके पीछे-पीछे एक और शख्स निकला. बोला- सुबह छह बजे आया था, आखिरकार मुझे भी मिल गया.
फिर जैसे लाइन में खड़े लोगों का सब्र टूट गया. बात करने की देर थी, शिकायतों का सिलसिला शुरू हो गया.
गिरधारी लाल ने बताया, होली पर वो अपने गांव, कोटपूतली चले गए थे. अब दिल्ली लौटे तो घर का सिलेंडर खाली. बुकिंग कराई तो एजेंसी वालों ने सीधा कह दिया...'गोदाम से ले आओ.' बस तभी से वो यहां लाइन में हैं. बोले, 'सुबह से खड़ा हूं… घर पर फिलहाल लकड़ी के चूल्हे से काम चला रहा हूं.'
लाइन में ही खड़े असलम का गुस्सा अलग था. उन्होंने कहा, 'मैंने 5 मार्च को पुराने रेट (₹853) में सिलेंडर बुक किया था. लेकिन बाद में एजेंसी ने कहा कि पुराना स्टॉक खत्म हो गया. फिर ₹60 और देने पड़े.' यानी बुकिंग पुराने दाम पर, लेकिन सिलेंडर नए रेट का. और वो भी कब मिलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं.
असलम से आगे लगी बुजुर्ग फौजिया धूप में काफी देर खड़े रहने के बाद अपने खाली सिलेंडर पर ही बैठ गईं. थकी आवाज में बोलीं, '2 मार्च को बुक किया था. लेकिन अब तक घर नहीं आया. आखिर में खुद ही लेने आना पड़ा.'
लाइन आगे खिसकती रही... और हर चेहरे पर इंतजार और झुंझलाहट दोनों साफ नजर आते रहे.
इसी बीच गोदाम पर हंगामा हो गया. पता चला कि लाइन में खड़ा एक शख्स खुद सिलेंडर लेकर नहीं आया था. तभी उसका साथी अचानक पहुंचा और सीधे लाइन तोड़कर अपना सिलेंडर आगे फिट करने लगा. आगे-पीछे खड़े लोग भड़क गए.
बहस बढ़ी तो बाद में आए उस शख्स ने तपाक से कहा, 'अरे, मैंने 700 रुपये दिहाड़ी पर इसे लाइन में खड़ा किया है.'
ये सुनते ही लोगों के कान खड़े हो गए. माहौल एक पल को ठहर-सा गया. लोगों का रिएक्शन देखकर वो थोड़ा संभला. फिर बात पलटते हुए बोला,'भाई, रोजा है… तो इसको पैसे देकर अपने लिए लाइन में खड़ा किया है.'
खैर, जिसने ये तिगड़म लगाई है उसके लिए सौदा घाटे का नहीं है. बाजार में ब्लैक में गैस करीब 300 रुपये किलो तक पहुंच गई है. यानी 14 किलो का सिलेंडर अगर उसी हिसाब से लिया जाए तो करीब 4200 रुपये का पड़ेगा.
लेकिन यहां हिसाब अलग है. 913 रुपये का सिलेंडर… और लाइन में खड़ा करने के लिए 700 रुपये की दिहाड़ी. यानी कुल मिलाकर करीब 1613 रुपये में वही सिलेंडर मिल जाएगा.
इस अफरा-तफरी के बीच कुछ लोग ऐसे भी थे जो भीड़ को समझाने की कोशिश कर रहे थे. कह रहे थे... घबराइए मत, सब्र रखिए.
न्यू सीलमपुर के हाजी मुकीम भी उन्हीं में से एक थे. उन्होंने भीड़ की तरफ देखते हुए कहा, 'लोग खुद ही बेवजह लाइन में लग रहे हैं. खबरें देखकर घबरा रहे हैं. अरे सिलेंडर बुक कीजिए, घर पर आराम कीजिए… खुद ही आ जाएगा.'
लेकिन लाइन में खड़े लोगों को उनकी बात पर भरोसा कुछ कम ही था. वजह भी सामने ही थी... हाजी मुकीम. जो खुद उसी गोदाम पर सिलेंडर लेने पहुंचे हुए थे.
डिलीवरी बॉय का दर्द
मुकीम अपनी बात पूरी ही कर रहे थे कि पीछे से एक तेज आवाज आई. एक डिलीवरी बॉय (सूरज) था. बोला, 'ऐसे हालात में हम क्यों घर-घर सिलेंडर देने जाएं? जाना मतलब मौत को दावत देना है.'
इतनी बड़ी बात सुनकर आसपास खड़े लोग एक पल को चुप हो गए. सबकी नजरें उसी पर टिक गईं. जैसे सबके मन में एक ही सवाल हो... आखिर हुआ क्या है?
उसने बताया, 'ब्रह्मपुरी रोड पर अशोक (हमारा ही एक डिलीवरी बॉय) सिलेंडर लेकर जा रहा था. दिन-दहाड़े उसे रोक लिया. जबरन सिलेंडर लूट लिया… और जाते-जाते 1000 रुपये फेंककर भाग गए.' जैसे कोई रॉबिनहुड हो. कि बुरा काम तो करेगा लेकिन थोड़ी अच्छाई के साथ.
उसने आगे कहा, 'नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में वैसे ही क्राइम बहुत है. ऐसे में अगर रास्ते में कोई हमसे सिलेंडर लूट ले तो? हम अपनी जान क्यों जोखिम में डालें, इसलिए कई लोग घर-घर डिलीवरी करने से बच रहे हैं.'
डिलीवरी बॉय सूरज ने आगे बताया, 'होली के वक्त कई डिलीवरी बॉय छुट्टी लेकर घर चले गए थे. उसी दौरान जंग की खबरों के बीच अचानक बुकिंग रॉकेट की रफ्तार से बढ़ गई. नतीजा ये हुआ कि डिलीवरी पेंडिंग में जाती गई.'
उन्होंने कहा, 'उधर थोड़ा स्टॉक भी कम आया. बस यहीं से लोगों में घबराहट फैल गई. फिर क्या था… लोग बुकिंग का इंतजार करने के बजाय खुद ही एजेंसियों और गोदामों पर पहुंचने लगे.'
हालात ये हैं कि एजेंसी या गोदाम भले ही सुबह करीब 9.30 बजे खुलते हों, लेकिन लाइन सुबह 5-6 बजे से ही लगनी शुरू हो जाती है. फिलहाल कब तक हालात सामान्य होंगे? इसका जवाब किसी के पास साफ-साफ नहीं है.
विष्णु रावल