दुनिया नहीं देख सकतीं, हौसलों से चला रहीं कैफे... दिल्ली की दृष्टिबाधित बेटियों की कहानी

दिल्ली के आर.के. पुरम में शुरू हुआ ‘कैफे बियॉन्ड आइज़’ इन दिनों लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. इस कैफे की खास बात यह है कि यहां काम करने वाले ज्यादातर युवा दृष्टिबाधित हैं, जो अपने हुनर और आत्मविश्वास से हर किसी को प्रेरित कर रहे हैं. यह पहल दिव्यांग युवाओं को सम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ आगे बढ़ने का मंच दे रही है.

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दिल्ली में 15 दृष्टिबाधित लड़कियों ने खोला कैफे (Photo: itg) दिल्ली में 15 दृष्टिबाधित लड़कियों ने खोला कैफे (Photo: itg)

मनीष चौरसिया

  • नई दिल्ली,
  • 07 मई 2026,
  • अपडेटेड 1:21 PM IST

दिल्ली के आर.के. पुरम में शुरू हुआ ‘कैफे बियॉन्ड आइज़’ अब चर्चा का केंद्र बन गया है. यहां काम करने वाले सभी युवा दृष्टिबाधित हैं, लेकिन उनके हौसले किसी से कम नहीं. ये कैफे सिर्फ रोजगार का जरिया नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान के साथ जीने की एक पहल है. करीब 15 लड़कियों को यहां काम और हुनर दोनों का मौका मिला है. यहां डायरेक्टर भावना सहाय ने बताया- अब तक हम 60 दिव्यांगों को ट्रेनिंग देकर नौकरी दे चुके हैं. कोई कितना देख सकता है या बिल्कुल नहीं देख सकता इसके आधार पर इनकी ट्रेनिंग और नौकरी होती है.

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इन युवाओं को खास ट्रेनिंग दी गई है, जिसमें देखने के बजाय छूने, सूंघने और स्वाद के जरिए खाना बनाना सिखाया जाता है. मशहूर शेफ के मार्गदर्शन में ये युवा प्रोफेशनल कुकिंग सीख रहे हैं. यहां काम करने वाली पुष्पा पार्शियल डेफ एंड ब्लाइंड हैं. वो बताती हैं कि वैसे तो वो एक स्पोर्ट्स प्लेयर हैं लेकिन अब वो अपना पूरा टाइम कैफ़े को ही देती हैं..इस कैफे से उनके जीवन को नई दिशा मिली हैं.


लेकिन भला ये कैफ़े पूरी तरह से ब्लाइंड लोग चलाते कैसे हैं? हमने भी इसका एक डेमो किया. हमने बक़ायदा खाने का ऑर्डर दिया.. और देखा कि कैसे हमारा खाना तैयार किया जाता है और टेबल तक पहुंचाया जाता है.
 
यहां पर कार्यरत यूपी की उपासना बचपन से ऐसी नहीं थी. नर्सिंग का कोर्स करने के दौरान एक हादसे में उनकी आंखों की रोशनी चली गई. उपासना बताती हैं कि मुझे लगता था कि जैसे मेरी जिंदगी खत्म हो गई. लेकिन फिर मुझे कुकिंग और दूसरी चीजों की ट्रेनिंग दी गई. और अब मैं कैफ़े में खुशी - खुशी काम कर रही हूं. लोगों को भी इस कैफ़े का कॉन्सेप्ट और खाना बहुत पसंद आ रहा है. ये पहल सहानुभूति नहीं, बल्कि अवसर देने की सोच को आगे बढ़ाती है. सही माहौल मिले तो ये युवा किसी से कम नहीं.
 

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