सिनेमा-भविष्य के भूत पर पहरा

यह फिल्म साफ तौर पर सीक्वल नहीं है. हां इसका विषय मिलता-जुलता है.

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सुबीर हलदर सुबीर हलदर

संध्या द्विवेदी / मंजीत ठाकुर

  • नई दिल्ली,
  • 26 मार्च 2019,
  • अपडेटेड 7:18 PM IST

डायरेक्टर अनिक दत्ता कहते हैं, ''यह अजीबोगरीब मामला है जिसमें जिंदगी कला की नकल करती है और कला जिंदगी की.'' ऐडमैन से फिल्ममेकर बने 58 वर्षीय दत्ता के अनुसार कि उन्होंने बता दिया था, उनकी हाल ही प्रदर्शित फिल्म भोबिष्योतेर भूत पर क्या प्रतिक्रिया होगी. शीर्षक में 'भूत' शब्द के साथ खेल किया गया है. इसका अर्थ अतीत और प्रेत दोनों हो सकता है, सो इसका अनुवाद 'भविष्य के प्रेत' भी किया जा सकता है और 'भविष्य का अतीत' भी. ''मगर प्रतिक्रियाएं किस शक्ल में सामने आएंगी, इसका अंदाजा नहीं लगाया था. ऐसी मूर्खता की उम्मीद नहीं की थी.''

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इस फिल्म को 15 फरवरी को रिलीज होने के एक दिन के भीतर ही 'निर्माताओं को बताए बिना बताए चुपचाप हटा लिया गया' और इसकी कोई औपचारिक वजह भी नहीं बताई गई. वे कहते हैं, ''न तो कोई इस बात की जिम्मेदारी ले रहा है और न ही कोई स्वीकार कर रहा है कि इसे हटाने के पीछे उनकी भूमिका अहम रही है. हर कोई कहीं ऊंचे बैठी अनजान और अमूर्त ताकत को दोषी ठहरा रहा है.''

यह उनकी पहली ही फिल्म जबरदस्त हिट भूतेर भोविष्योत का सीक्वल नहीं है, जो भूतों की ही कहानी थी. भोबिष्योतेर भूत में कुछ प्रेत बेघर हो जाने के बाद एक सियासतदां के साथ एक शरणार्थी शिविर में पनाह लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं. तंज से भरपूर इस रूपकात्मक फिल्म के साथ दिक्कतें बुनियाद से ही शुरू हो गईं. एक परेशानी जानी-मानी प्रोड्यूसर श्री वेंकटेश फिल्क्वस (एसवीएफ) की तरफ से पेश आई, जिसके पास भूतेर भोबिष्योत के अधिकार हैं. उसने इसके किसी सीक्वल पर भी अधिकार का दावा किया.

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यह फिल्म साफ तौर पर सीक्वल नहीं है. हां इसका विषय मिलता-जुलता है. दत्ता बताते हैं, ''एक के बाद एक फरमानों के जरिए फिल्म में एक साल की देरी कर दी गई. हमें तमाम स्रोतों से दबाव और धमकियों का भी सामना करना पड़ा.'' कइयों ने बीच-बचाव की भी कोशिश की. वे कहते हैं, ''पुलिस वाले मेरे पास आए और उन्होंने बेखौफ यह फिल्म बना पाने के लिए मुझे शुभकामनाएं दीं और मुझसे कहा कि मैं दी गई तारीख से पहले शूटिंग खत्म कर लूं. हमें शूटिंग की मुख्य लोकेशन पर शूटिंग में जल्दबाजी के साथ-साथ तकरीबन आठ से नौ दिनों की कटौती करनी पड़ी और ग्रीन स्क्रीन के सामने इंप्रोवाइज करना पड़ा. हमने तकरीबन गुरिल्ला अंदाज में शूट किया.'' वे कहते हैं कि अंत में जो फिल्म बनी, उसमें ''इंप्रूवाइजेशन है मगर कंप्रोमाइज नहीं.''

वे कहते हैं, ''मेरी दूसरी फिल्मों के मुकाबले इसमें कला कम थी और यह फिल्म वह कहने का साधन ज्यादा थी जो मैं कहना चाहता था. आम तौर पर मेरी फिल्म में बहुत ज्यादा मैसेज नहीं होते. अवचेतन के स्तर पर कुछ सामाजिक-राजनैतिक टीका-टिप्पणियां भले हो सकती हैं. पर यह फिल्म वह कहने के लिए ही बनाई गई जो मुझे कहना था.

मैं भीतर से बहुत भरा हुआ महसूस करने लगा था. मुझे अपने वक्त के बारे में बात करनी थी...कुछ ऐसी बात जो आज समकालीन बंगाली फिल्मों से गायब है.'' वे इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि हर फिल्म अपने ढंग से राजनैतिक होती है. ''आप इसके बारे में बात कर रहे हों या नहीं, पर 20 साल बाद लोग समझ ही लेंगे कि हुकूमत उस वक्त इतनी दमनकारी थी कि फिल्मकार उन चार दीवारों के बाहर कुछ भी दिखाने की जुर्रत नहीं कर सके.'' मगर 'मजेदार कहानियों' के जरिए खुद को जाहिर करना दत्ता की फितरत में ही है और भूतों का इस्तेमाल करने वाला व्यंग्य भोबिष्योतेर भूत के लिए सही माध्यम साबित हुआ. वे कहते हैं कि जनसाधारण तक पहुंचने के लिए भूत उनका औजार हैं.

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किसी संगठन, पार्टी या लोगों का नाम लिए बगैर दत्ता कहते हैं कि वे छिपाने की कोशिश नहीं कर रहे थे. ''इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यहां पहले से नहीं घट रहा.'' मगर वे रोड़े अटकाने वालों का नाम बताते-बताते रुक जाते हैं.

लगता है कि यह फिल्म जल्दी ही नए सिरे से फिर रिलीज होगी. सुप्रीम कोर्ट ने 15 मार्च को एक अंतरिम आदेश पारित किया है और पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया है कि वह भोबिष्योतेर भूत फिल्म का बगैर किसी रुकावट के परदे पर दिखाया जाना पक्का करे.

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