मोटापे को दुनियाभर में एक ऐसी महामारी माना जा रहा था जिसे रोकना नामुमकिन लग रहा था क्योंकि लगातार लोगों का मोटापा बढ़ रहा था. लेकिन हाल ही में आई एक ग्लोबल स्टडी का कहना है कि कई देशों में मोटापे की बढ़ती रफ्तार अब न सिर्फ धीमी हुई है बल्कि कुछ जगहों पर यह स्थिति रुक गई या कम होने लगी है. नेचर जर्नल में पब्लिश स्टडी के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव इस बात का सबूत है कि सही पॉलिसी और जागरूकता से इस गंभीर समस्या को पलटा जा सकता है.
इंपीरियल कॉलेज लंदन के रिसर्चर्स ने 2000 रिसर्च वाली टीम ने 1980 से 2024 के बीच हर साल के मोटापे के डेटा का एनालेसिस किया जिसमें 4050 पॉपुलेशन बेस्ड स्टडीज के डेटा को शामिल किया गया था जिसमें 23.2 करोड़ लोगों का डेटा शामिल किया गया था.
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 45 सालों में लगभग हर देश में मोटापे के मामले बढ़े हैं लेकिन अब हाई-इनकम वाले देशों में यह ट्रेंड बदल रहा है. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में जहां मोटापे की दर बहुत हाई थी, अब वहां इसके बढ़ने की स्पीड काफी कम हो गई है.
आंकड़ों की बात करें तो 2024 में अमेरिका में मोटापे की दर 40-43 प्रतिशत और ब्रिटेन में 27-30 प्रतिशत दर्ज की गई है. वहीं फ्रांस जैसे देश में तो इसमें गिरावट के संकेत मिलने लगे हैं, जहां अब सिर्फ 11-12 प्रतिशत वयस्क ही इस स्थिति में हैं. जर्मनी में भी यह आंकड़ा 20-23 प्रतिशत पर आकर ठहर गया है.
लंदन के इंपीरियल कॉलेज में ग्लोवल एनवायरमेंट हेल्थ के प्रोफेसर और इस स्टडी के राइटर माजिद एज्जती ने कहा, 'मुझे लगता है कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विविधता उन देशों में भी मौजूद है जिनकी आर्थिक, पर्यावरणीय और तकनीकी विशेषताएं काफी हद तक समान हैं. इसलिए देखने में देश भले ही एक जैसे लगें लेकिन मोटापा अलग-अलग रूप धारण कर लेता है.'
'मोटापे को रोकना अब 'असंभव' नहीं लगता. रिसर्च में पाया गया कि दुनिया के अलग-अलग देशों में मोटापे के आंकड़े और उनके कारण अलग-अलग हैं. सिर्फ खान-पान ही नहीं, बल्कि उस देश की आर्थिक स्थिति, हेल्दी फूड की उपलब्धता और सरकारी नीतियां भी इसमें अहम रोल निभाती हैं. हालांकि, जहां अमीर देशों में हालात सुधर रहे हैं, वहीं मिडिल और लो-इनकम वाले देशों में अभी भी चुनौती बनी हुई है, जहां मोटापे के मामले बढ़ रहे हैं.'
स्टडी में एक दिलचस्प बात यह सामने आई कि वयस्कों के मुकाबले बच्चों और वयस्कों में मोटापे की रफ्तार थमने का सिलसिला काफी पहले शुरू हो गया था. डेनमार्क जैसे देशों में तो यह सुधार 1990 के दशक में ही दिखने लगा था. ज्यादातर विकसित देशों में 2000 के दशक के मध्य तक बच्चों में मोटापे की दर स्थिर हो गई थी.
जापान इस मामले में सबसे आगे है, जहां बच्चों में मोटापे की दर सबसे कम यानी महज 3-7 प्रतिशत के बीच है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि बच्चों में आया यह बदलाव आने वाले समय में पूरी वयस्क आबादी की सेहत सुधारने में मददगार साबित होगा.
आजतक लाइफस्टाइल डेस्क