ब्राह्मण वर्चस्व, गैर-ब्राह्मण चेतना और जस्टिस पार्टी का उदय, कैसे बदली दक्षिण की सियासत

तमिलों की संस्कृति, भाषा और जमीन को लेकर आर्य-द्रविड़ विवाद की जड़ें 19वीं सदी के ब्रिटिश भारत में पादरी रॉबर्ट काल्डवेल की रिसर्च से जुड़ी हैं. काल्डवेल ने द्रविड़ भाषाओं को संस्कृत से अलग बताया, जिससे दक्षिण भारत में क्षेत्रीय गौरव बढ़ा लेकिन उत्तर भारतीय प्रभुत्व पर सवाल उठे.

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तमिलनाडु की राजनीति के रुख बदलने का अलग ही इतिहास रहा है तमिलनाडु की राजनीति के रुख बदलने का अलग ही इतिहास रहा है

टीआर जवाहर

  • नई दिल्ली,
  • 19 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 7:58 PM IST

तमिलों की संस्कृति, उनकी जमीन और भाषा-बोली... इन तीनों को लेकर उनका उत्तर भारतीयों से जो टकराव है वह खुद एक बाहरी का खड़ा किया हुआ है. उस बाहरी का नाम है रॉबर्ट काल्डवेल जो कि एक पादरी थे और बाइबिल के दर्शन का प्रचार करने भारत पहुंचे थे. इसी सिलसिले में उन्होंने पहले दक्षिण भारतीय भाषाओं को लेकर स्टडी की और अपनी ओर से उन्होंने द्रविड़ भाषा (हालांकि तमिल लोग इसे भी बाहरी और ओवरटेक किया हुआ शब्द मानते हैं) को लेकर ग्रंथ लिखे.

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साल 1856 और 1875 में अपनी रचनाओं के जरिये कॉल्डवेल ने द्रविड़ भाषाओं को संस्कृत से अलग और आजाद बताया. उनकी रिसर्च का राजनीतिक असर भी हुआ. जिसने ये थॉट स्टैब्लिश कर दिया कि द्रविड़ भाषाएं सबसे पुरानी हैं. इससे दक्षिण भारत में क्षेत्रीय गौरव बढ़ा, लेकिन इसके साथ ही इसने संस्कृत और उत्तर भारतीय प्रभुत्व को लेकर शक के बीज भी बो दिए.

1912 की पब्लिक सर्विस कमीशन रिपोर्ट

ब्रिटिश शासन के दौर में मद्रास प्रेसीडेंसी में यह तनाव और उभरा. उस वक्त ब्राह्मण आबादी का लगभग 3 प्रतिशत थे. वह प्रशासन और शिक्षा के पदों पर बड़ी संख्या में दिखाई देने लगे. संस्कृत और अंग्रेज़ी पर उनकी पकड़ से उन्हें बढ़िया मौके मिलने लगे. 1912 की पब्लिक सर्विस कमीशन रिपोर्ट और अन्य औपनिवेशिक आंकड़ों में भी इस असंतुलन का जिक्र मिलता है. इससे गैर-ब्राह्मण समुदायों में असंतोष बढ़ा.

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इसी बैकग्राउंड में गैर-ब्राह्मण चेतना को स्वर देने वाले चेहरे उभरे. सी अय्योथे थास ने आर्य-द्रविड़ वाले अलगाव को सामाजिक अन्याय के संदर्भ में उठाया. उन्होंने ‘ओरु पैसा तमिऴन’ जैसे प्रकाशनों के जरिए ब्राह्मणवादी वर्चस्व की आलोचना की और खुद को 'मूल द्रविड़' पहचान से जोड़ा.

1915 में शुरू हुआ जस्टिस अखबार

20वीं सदी की शुरुआत में यह विचार संगठित राजनीति में बदला. 1915 में टीएम नायर ने ‘जस्टिस’ अखबार शुरू किया, जिसने गैर-ब्राह्मण अधिकारों की आवाज बुलंद की. 20 नवंबर 1916 को ‘साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन’ की स्थापना हुई, जिसे आगे चलकर ‘जस्टिस पार्टी’ कहा गया. इसके प्रमुख नेताओं में टीएम नायर, पी थिआगराया चेट्टी और सी नटेसा मुदलियार शामिल थे.

जस्टिस पार्टी ने 1916 के ‘नॉन-ब्राह्मण मेनिफेस्टो’ में प्रशासनिक पदों में आरक्षण और भाषाई सम्मान की मांग की. उनका तर्क था कि सत्ता में संतुलन जरूरी है. हालांकि पार्टी का रुख ब्रिटिश शासन के प्रति अपेक्षाकृत नरम था, जिससे स्वतंत्रता आंदोलन के मुख्यधारा नेताओं से उनका मतभेद रहा. एनी बेसेंट और उनके होम रूल आंदोलन को भी जस्टिस पार्टी ने ब्राह्मण हितों के करीब माना. इस दौर में राजनीतिक मतभेद केवल अंग्रेज़ वर्सेज भारतीयों का नहीं था, बल्कि समाज के अंदर भी प्रतिनिधित्व और पहचान की बहस चल रही थी.

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आर्य-द्रविड़ अलगाव और पॉलिटिक्स

जस्टिस पार्टी ने आर्य-द्रविड़ अलगाव को एक राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल किया. उनका उद्देश्य गैर-ब्राह्मण समुदायों के लिए अवसर तय करना था, लेकिन उनकी राजनीति में भी सीमाएं थीं. पार्टी पर एलीट इमेज का आरोप लगा और इस वजह से इसे ग्राउंड पर बड़ा जनसमर्थन नहीं मिला. समय के साथ यही थॉट आगे चलकर द्रविड़ आंदोलन और आधुनिक तमिल पॉलिटिक्स का बेस बन गया. आज भी तमिलनाडु की राजनीति में लैंग्वेज, आइडेंटिटी, और सोशल जस्टिस के मुद्दे उसी ऐतिहासिक बैकग्राउंड से जुड़े दिखाई देते हैं.

इस तरह तमिल भक्ति की भावनात्मक विरासत से निकलकर द्रविड़ राजनीति की वैचारिक और सामाजिक जंग तक की यात्रा केवल भाषा की कहानी नहीं, बल्कि आइडेंटिटी, और पॉवर बैलेंस की कहानी भी है.

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