डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन जोर-शोर से मास डिपोर्टेशन की मुहिम चलाए हुए है. अवैध प्रवासी लगातार बाहर निकाले जा रहे हैं. इस बीच कैलिफोर्निया में एक घटना हो गई, जिससे इमिग्रेशन एजेंसी ICE पर ही सवाल खड़े होने लगे. यहां तक कि उसके खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं. इस बीच एक दिलचस्प बात ये भी है कि वाइट हाउस भले ही अवैध इमिग्रेंट्स को बाहर करना चाहे लेकिन कई अमेरिकी राज्य खुद उन्हें सुरक्षा दे रहे हैं.
क्या है वो घटना, जिससे एजेंसी घिरी
कैलिफोर्निया में 7 जनवरी को ICE की कार्रवाई के दौरान एक महिला रेने निकोल गुड की गोली लगने से मौत हो गई. अधिकारियों के मुताबिक, रेने अपनी कार से उनका रास्ता रोक रही थीं. इसी दौरान एक अधिकारी उनके पास पहुंचा, तभी कार आगे बढ़ी. खुद को बचाने के लिए अधिकारी ने फायरिंग की, जिसमें महिला की मौत हो गई. इसके बाद से ICE आउट के नारे लग रहे हैं.
क्या है ICE और कैसे करती है काम
यह एक फेडरल एजेंसी है. इसके पास दस्तावेजों के बिना रहते लोगों की जांच करने, गिरफ्तारी और डिपोर्टेशन का कानूनी अधिकार होता है. कोई भी राज्य या शहर ICE को अपने इलाके में काम करने से पूरी तरह रोक नहीं सकता, क्योंकि फेडरल कानून पूरे देश में लागू होते हैं. यानी कागज पर ICE की ताकत मजबूत है और उसे किसी राज्य के आदेश की जरूरत नहीं होती.
लेकिन असल में ICE की ताकत सीमित है, क्योंकि उसे स्थानीय प्रशासन की मदद की जरूरत पड़ती है. सैंक्चुअरी राज्यों में पुलिस, जेल और स्थानीय एजेंसियां ICE के साथ काम नहीं करतीं. इससे ICE को खुद ही लोगों को ढूंढना पड़ता है. एजेंसी के पास सीमित स्टाफ और संसाधन हैं. बिना लोकल मदद के बड़े पैमाने पर कार्रवाई उसके लिए मुश्किल है.
कई राज्य पहले से ही ICE को लेकर काफी सख्त रहे. यहां तक कि ऐसे राज्यों में एजेंसी प्रवेश भी नहीं कर सकती. अगर बहुत जरूरी हो तो स्टेट की इजाजत के साथ ही वो भीतर जा सकती है, जबकि ICE खुद फेडरल एजेंसी है, जिसे देश के कोने-कोने में जाने के लिए राज्य की मंजूरी की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए.
पिछले अप्रैल में ट्रंप के आदेश पर जस्टिस डिपार्टमेंट ने ऐसे राज्यों और शहरों की लिस्ट बनाई, जो अवैध प्रवासियों को शरण देते रहे हैं. इनमें कैलिफोर्निया के अलावा न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन समेत कुल 17 राज्य हैं. हाल के महीनों में न्याय विभाग ने ऐसे राज्यों पर केस भी फाइल किए.
कौन से नियम दे रहे सैंक्चुअरी स्टेट्स को ताकत
सैंक्चुअरी स्टेट्स में ऐसे नियम बनाए गए हैं, जिनकी वजह से संघीय इमिग्रेशन एजेंसियों को स्थानीय प्रशासन से पूरा सहयोग नहीं मिल पाता. हर जगह नियम थोड़े-बहुत अलग हैं, लेकिन कुल मिलाकर ये नीतियां सेंटर के इमिग्रेशन कानून से टकराती हैं. इन नियमों के कारण कई बार अवैध प्रवासियों से जुड़ी जानकारी केंद्र को नहीं दी जाती और कार्रवाई में रुकावट आती है.
इन नीतियों को संविधान के खिलाफ भी बताया जाता है. अमेरिकी संविधान कहता है कि इमिग्रेशन पर फैसले का अधिकार केंद्र के पास है और फेडरल कानून राज्यों से ऊपर होते हैं. साथ ही राष्ट्रपति की जिम्मेदारी है कि कानूनों को सही तरीके से लागू कराया जाए, लेकिन सैंक्चुअरी राज्य इसमें अड़चन बन जाते हैं.
सबसे बड़ा मुद्दा सुरक्षा का है. आरोप है कि इन नियमों की वजह से संघीय एजेंसियां अवैध प्रवासियों तक नहीं पहुंच पातीं, जिनका आपराधिक रिकॉर्ड होता है. इससे आम लोगों के साथ साथ कानूनी तौर पर रह रहे प्रवासियों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ती है.
फिलहाल अमेरिका के 17 राज्यों और वॉशिंगटन डीसी में सैंक्चुअरी से जुड़े नियम लागू हैं. पूरे देश में ऐसे एक हजार से ज्यादा इलाके हैं, जहां स्थानीय नीतियां ऐसी हैं कि केंद्र अपने एक्शन न ले सके. एक्शन होता भी है तो काफी सीमित रहता है.
वॉशिंगटन साल 2017 में सैंक्चुअरी स्टेट बना. फरवरी 2017 में तत्कालीन गवर्नर जे इंस्ली ने इसके लिए एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर निकाला था. दो साल बाद वहां कीप वॉशिंगटन वर्किंग एक्ट आया. इसके तहत, सिर्फ ICE के कहने से किसी को हिरासत में नहीं रखा जा सकता. इसके तुरंत बाद वहां की पुलिस ने भी अवैध प्रवासियों को पकड़ने की जिम्मेदारी से दूरी बना ली. साथ ही दस्तावेजों के बगैर रह रहे लोगों के बच्चे वहां के स्कूलों में भी पढ़ सकते हैं. यानी वॉशिंगटन में पुलिस, जेल और स्कूल, तीनों लेवल पर सैंक्चुअरी नियम लागू हैं.
राज्यों को क्यों पड़ी ऐसी जरूरत
सबसे बड़ी वजह यह थी कि अगर स्थानीय पुलिस और प्रशासन इमिग्रेशन एजेंसियों के साथ मिलकर काम करेंगे, तो प्रवासी लोग पुलिस से दूरी बना लेंगे. इससे अपराध की रिपोर्टिंग कम होगी. स्थानीय प्रशासन का तर्क था कि लोग तभी पुलिस की मदद लेंगे, जब उन्हें डिपोर्ट होने का डर न हो.
दूसरा कारण मानवाधिकार से जुड़ा है. राज्य सरकार का मानना था कि सिर्फ इमिग्रेशन स्टेटस के आधार पर किसी को हिरासत में रखना या गिरफ्तार करना गलत है. लोकल जेलों और पुलिस को ICE की सीधी मदद से रोका गया.
राजनीतिक और सामाजिक वजह भी रही. वॉशिंगटन समेत बाकी सारे बड़े राज्यों में बड़ी संख्या में इमिग्रेंट आबादी है, जो खेती, कंस्ट्रक्शन, हेल्थकेयर और सर्विस सेक्टर में काम करती है. इन्हें हटाने पर राज्य की पूरी व्यवस्था गड़बड़ा सकती है.
फेडरल सरकार कैसे बनाती है राज्यों पर दबाव
केंद्र सरकार ऐसे राज्यों और शहरों की फेडरल ग्रांट्स रोकने या शर्तों से जोड़ने की कोशिश कर सकती है, जैसे पुलिस, ट्रांसपोर्ट या हाउसिंग से जुड़ा पैसा. हालांकि कई बार अदालतें इसे सीमित कर देती हैं.
फेडरल सरकार सैंक्चुअरी कानूनों को अदालत में यह कहकर चुनौती दे सकती है कि वे संविधान और फेडरल कानूनों के खिलाफ हैं. इस पर फैसला अक्सर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचता है.
ICE और दूसरी फेडरल एजेंसियां बिना राज्य की मदद के भी रेड, गिरफ्तारी और डिपोर्टेशन कर सकती हैं, लेकिन इसमें संसाधन और समय ज्यादा लगता है.
कांग्रेस नया कानून बनाकर राज्यों पर ज्यादा स्पष्ट जिम्मेदारियां डाल सकती है, हालांकि इसके लिए राजनीतिक सहमति जरूरी होती है.
फेडरल सरकार सैंक्चुअरी स्टेट्स को सार्वजनिक तौर पर दोषी ठहराकर राजनीतिक दबाव बना सकती है, जिससे स्थानीय सरकारें नीति बदलने को मजबूर हों.
फेडरल एजेंसियां इन राज्यों के कार्यक्रमों की जांच कर सकती हैं कि कहीं फेडरल पैसे का गलत इस्तेमाल तो नहीं हो रहा.
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