9 साल में 25 करोड़ लोग... आखिर इतनी जल्दी लोग गरीबी से कैसे बाहर आ रहे हैं?

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी सरकार के 9 सालों में लगभग 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं. सबसे ज्यादा करीब 6 करोड़ लोग उत्तर प्रदेश के हैं. उसके बाद बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान से हैं.

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9 साल में लगभग 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं. 9 साल में लगभग 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं.

Priyank Dwivedi

  • नई दिल्ली,
  • 16 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 9:13 PM IST

मोदी सरकार के नौ साल में लगभग 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आ गए हैं. सबसे ज्यादा करीब 6 करोड़ लोग उत्तर प्रदेश के हैं. उसके बाद बिहार और मध्य प्रदेश है. केंद्र सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में ये जानकारी दी है. 

सोमवार को आई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2013-14 से 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोग मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी यानी बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा लोग गरीबी से बाहर आए हैं. करीब 12 करोड़ लोग इन्हीं तीन राज्यों से हैं.

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नीति आयोग के मुताबिक, 2013-14 में देश में मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी की दर 29.17% थी, जो 2022-23 में घटकर 11.28% पर आ गई. इस हिसाब से 9 साल में 17.89% की कमी आई है.

इन आंकड़ों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हम सर्वांगीण विकास की दिशा में काम करना जारी रखेंगे और हर भारतीय के लिए समृद्ध भविष्य सुनिश्चित करेंगे.

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ये मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी क्या है?

नीति आयोग के मुताबिक, मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी को हेल्थ, एजुकेशन और स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग यानी रहन-सहन के तरीके के आधार पर मापा जाता है. 

इसमें न्यूट्रीशन, बाल मृत्यु दर, मटैरनल हेल्थ, स्कूल में कितने साल पढ़ाई की, स्कूल अटेंडेंस, साफ-सफाई, पीने की पानी की सुविधा, बिजली की सुविधा, घर, संपत्ति और बैंक अकाउंट जैसे 12 इंडिकेटर्स होते हैं.

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भारत में मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स मापने के लिए 12 इंडिकेटर्स का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि वैश्विक स्तर पर 10 ही होते हैं. 

जानकार मानते हैं कि मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स की तुलना भारत में पारंपरिक और आधिकारिक रूप से गरीबी का अनुमान लगाने वाले तरीके से नहीं की जा सकती.

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स निकालने के लिए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 और 5 से आंकड़े लिए गए हैं.

कैसे हुई गरीबी कम?

न्यूज एजेंसी पीटीआई को नीति आयोग के सदस्य रमेश चांद ने बताया कि 9 साल में 24.82 करोड़ लोग मल्टीडायमेंशनल गरीबी से बाहर निकले हैं. इस हिसाब से हर साल 2.75 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए हैं.

आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रह्मण्यम ने बताया कि सरकार का लक्ष्य मल्टीडायमेंशनल पॉवर्टी को 1 फीसदी से कम करना है और इस दिशा में तेजी से काम किया जा रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक, 2005-06 में गरीबी का स्तर 55.34% था, जो 2015-16 में घटकर 24.85% पर आ गया. 2019-21 में ये स्तर 15% से भी कम हो गया. वहीं, 2022-23 में ये और कम होकर 11.28% हो गया.

रिपोर्ट में बताया गया है कि गरीब राज्यों में गरीबी तेजी से कम हुई है, जो असमानता में कमी की ओर इशारा करती है. सबसे ज्यादा 5.94 करोड़ लोग उत्तर प्रदेश के हैं. बिहार में 3.77 करोड़, मध्य प्रदेश में 2.30 करोड़ और राजस्थान में 1.87 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं.

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गरीबी कम होने के कारण क्या?

नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि केंद्र सरकार की योजनाओं ने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकलने में मदद की. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत, 81.35 करोड़ से ज्यादा लोगों को मुफ्त अनाज दिया जा रहा है. ये गांवों की 75% और शहर की 50% आबादी को कवर करता है.

इसके अलावा, सरकार पोषण अभियान भी चला रही है जिससे करीब 10 करोड़ बच्चों और मांओं को फायदा पहुंच रहा है. गर्भवती महिलाओं के लिए प्रधानमंत्री मातृत्व अभियान चलाया जा रहा है, जिससे करीब 4 करोड़ महिलाओं को लाभ मिल रहा है. 

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ से ज्यादा एलपीजी कनेक्शन मुफ्त में दिए गए हैं, जिससे 31 करोड़ लोगों को फायदा पहुंच रहा है. 

इसके साथ ही प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत, 50 करोड़ से ज्यादा बैंक खाते खोले जा चुके हैं. प्रधानमंत्री आवास योजना के जरिए 4 करोड़ से ज्यादा लोगों को घर दिए गए हैं, जिनसे उनके रहन-सहन में सुधार हुआ है.

तो क्या इससे मिडिल क्लास बढ़ी है?

अक्सर ये सवाल उठता है कि जब गरीबी कम हो रही है तो क्या इससे मिडिल क्लास की संख्या बढ़ रही है. भारत में मिडिल क्लास की कोई आधिकारिक परिभाषा नहीं है और न ही आंकड़े हैं.

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हालांकि, एक निजी संस्था पीपुल्स रिचर्स ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकोनॉमी (PRICE) ने पिछली साल मिडिल क्लास पर एक रिपोर्ट जारी की थी. 

इस रिपोर्ट में संस्था ने सालाना कमाई के आधार पर परिवारों को चार कैटेगरी में बांटा था. जिन परिवारों की सालाना कमाई 5 से 30 लाख रुपये थी, उन्हें मिडिल क्लास माना गया था. इसमें अनुमान लगाया गया था कि 43 करोड़ से ज्यादा आबादी मिडिल क्लास है. 

वहीं, 73 करोड़ से ज्यादा लोग एस्पायरर की कैटेगरी में आते हैं, जिनकी सालाना कमाई 1.25 लाख से 5 लाख रुपये के बीच है. ये वो लोग हैं जो मिडिल क्लास से एक कैटेगरी नीचे हैं. 

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