जमीन पर बूट्स उतारने से डरता नहीं वॉशिंगटन, वेनेजुएला पर ट्रंप के बयान का क्या है मतलब, क्या और भी देश निशाने पर?

अमेरिकी सैनिकों ने वेनेजुएला पर हमला कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अरेस्ट कर लिया. अब वे न्यूयॉर्क के डिटेंशन सेंटर में रखे गए हैं, जहां उनपर हथियारों और ड्रग्स की तस्करी के लिए मुकदमा चलेगा. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस बीच कहा कि वॉशिंगटन अस्थिर जगहों पर अपने बूट्स उतारने से नहीं डरता.

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ड्रग तस्करी के आरोप में अमेरिका ने वेनेजुएला के लीडर को गिरफ्तार कर लिया. (Photo- AFP) ड्रग तस्करी के आरोप में अमेरिका ने वेनेजुएला के लीडर को गिरफ्तार कर लिया. (Photo- AFP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 05 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:13 PM IST

वेनेजुएला पर फिलहाल अमेरिकी कंट्रोल हो चुका. ये बदलाव हाल ही में हुआ, जब डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर हमला करते हुए अमेरिका की सेना ने वेनेजुएला के प्रेसिडेंट को अगवा कर कैद में ले लिया. अब अस्थाई तौर पर इस देश का प्रशासन यूएस चलाएगा. ट्रंप ने खुद कहा कि वॉशिंगटन तब तक वेनेजुएला को चलाएगा, जब तक वहां सत्ता का सही बदलाव नहीं हो जाता. यानी सैनिकों के जरिए वाइट हाउस ही वहां मौजूद रहने वाला है.

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अमेरिका के लिए ये नई बात नहीं. पहले भी वो कई देशों की सत्ता में दखलंदाजी कर चुका. उसने लैटिन अमेरिकी और कैरेबियन देशों में अनेकों बार अपनी सेना उतारी और सत्ता बदलने में भूमिका निभाई. यह सब ज्यादातर अपने रणनीतिक हितों और सुरक्षा बनाए रखने के नाम पर हुआ. 

किन-किन देशों में हस्तक्षेप

शुरुआती मामलों में क्यूबा का नाम आता है. साल 1898 में स्पेन-अमेरिका जंग के बाद अमेरिका ने क्यूबा में अपनी सेना उतारी. स्पेन को हराने के बाद क्यूबा को आजादी तो मिली लेकिन असल में अमेरिका का दबदबा बना रहा. वो मदद के नाम पर वहीं बना रहा और भीतर मामलों में दखल देता रहा. बाद में साठ के दशक में अमेरिका समर्थित बे-ऑफ-पिग्स हमला हुआ जिसमें क्यूबाई कास्त्रो सरकार को गिराने की नाकाम कोशिश की गई.

हैती में अमेरिका ने साल 1915 से 1934 तक सेना तैनात रखी. कहा गया कि वहां राजनीतिक अराजकता है और अमेरिकी हित खतरे में हैं. लेकिन इस दौरान अमेरिका ने हैती की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था पर गहरा कंट्रोल रखा. कई फैसले वाशिंगटन के इशारे पर हुए. हैती की जनता अब भी इसे लेकर यूएस से नाराज रहती है. 

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निकोलस मादुरो की पकड़ने के लिए अमेरिकी सेना ने ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व चलाया. (Photo: Reuters)

डोमिनिकन रिपब्लिक में साल 1965 में अमेरिका ने बीस हजार से ज्यादा सैनिक उतारे. वहां चुने हुए राष्ट्रपति बोश को हटाए जाने के बाद गृहयुद्ध जैसे हालात बन गए थे. अमेरिका ने कहा कि वह कम्युनिज्म को रोकना चाहता है. लेकिन असल में वो अपनी पसंद की सत्ता वहां चाहता था और यही हुआ भी. 

निकारागुआ में अमेरिका ने सीधे सेना उतारने की बजाय लंबे समय तक सशस्त्र दखल दिया. साल 1912 से 1933 तक अमेरिकी सैनिक वहां रहे. बाद में वहां की सरकार को कमजोर करने के लिए अमेरिका ने स्थानीय विद्रोहियों को सपोर्ट किया. उन्हें हथियारों की सप्लाई की. इसका असर यह हुआ कि देश में सालों तक गृहयुद्ध चलता रहा. 

पनामा में 1989 में अमेरिका ने ऑपरेशन जस्ट कॉज के नाम से हमला किया. तत्कालीन शासक मैनुएल नोरिएगा पहले अमेरिका के सहयोगी थे लेकिन बाद में उनका मन बदलने लगा. फायदा न होता देख अमेरिकी फोर्स ने पनामा सिटी में घुसकर शासक को हटाया ही नहीं, बल्कि उन्हें अरेस्ट कर अमेरिका ले गए. इसके बाद यूएस- फ्रेंडली सरकार बनी. 

क्यों पड़ोस के गरीब देशों में दिलचस्पी

लैटिन अमेरिका और कैरेबियन में अमेरिकी सैन्य दखल कोई एक घटना नहीं बल्कि एक लंबा सिलसिला रहा है. यहां अमेरिका की दिलचस्पी कई वजहों से रही है. सबसे पहली वजह भौगोलिक नजदीकी है. ये इलाके अमेरिका का बैकयार्ड माने जाते हैं. अमेरिका हमेशा चाहता रहा कि उसके आसपास कोई दुश्मन ताकत या विरोधी विचारधारा पैर न जमाए. यह वैसा ही है, जैसे अपने पड़ोस में कमजोर या अपने जैसे लोग रखना, जिनकी सोच और कल्चर मिलता-जुलता हो. इससे लोग खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. 

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अमेरिकी सेना के वेनेजुएला पर हमले की कई देश और मानवाधिकार संगठन आलोचना कर रहे हैं. (Photo: Reuters)

दूसरी बड़ी वजह आर्थिक हित है. यहां तेल, खनिज और खेती से जुड़े भारी रिसोर्सेज हैं. अमेरिकी कंपनियों ने इन देशों में काफी निवेश किया. जब भी किसी सरकार ने रिफॉर्म या राष्ट्रीयकरण की बात की तो अमेरिका को अपने कारोबारी हित खतरे में लगने लगे. 

कोल्ड वॉर भी एक कारण है. ये दौर तो बीत चुका लेकिन अमेरिका तब से ही रूस से डरा हुआ है कि कहीं वहां से होता हुआ कम्युनिज्म उसका दरवाजा न खटखटाने लगे. इसलिए उसने कई बार किसी न किसी बहाने से पड़ोसी देशों की सत्ता में बदलाव किया. 

क्या वेनेजुएला के बाद और भी देश निशाने पर 

क्यूबा अमेरिका की नजर में बेहद संवेदनशील देश है. हालांकि वहां सीधा हमला मुश्किल है क्योंकि इससे इंटरनेशनल दबाव बढ़ सकता है, जबकि अब तक सारे देश दूर से आलोचना तक ही सीमित हैं. 

निकारागुआ भी अमेरिका के निशाने पर है. वहां की सरकार पर तानाशाही और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते हैं. लेकिन अमेरिका सीधा हाथ डालने की बजाए प्रतिबंधों का सहारा ले सकता है. 

हैती में हालात बेहद खराब हैं. गैंग-वॉर और राजनीतिक संकट के चलते वहां अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की बात यूएस खुद बोलता रहा. लेकिन यहां भी वो आड़ में ही काम कर रहा है.

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