जब भी दो देशों के बीच तनाव होता है, लाख अफरा-तफरी के बावजूद डिप्लोमेट्स तक आंच नहीं आती. वे सुरक्षित रूप से होस्ट कंट्री से अपने देश वापस लौटाए जाते हैं. यह डिप्लोमेटिक इम्यूनिटी है. पद पर बैठे लीडर्स के लिए भी हेड-ऑफ-स्टेट इम्यूनिटी काम करती है. लेकिन क्या वजह है, जो वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को यह छूट नहीं मिल सकी? बल्कि अमेरिकी फोर्स ने उन्हें जबरन उठा लिया और ऐसे डिटेंशन सेंटर में डाल दिया, जहां की हिस्ट्री बेहद खराब है.
क्या किसी देश के लीडर को डिप्लोमेटिक इम्यूनिटी मिलती है
हां, आमतौर पर किसी देश के मौजूदा राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को हेड ऑफ स्टेट इम्यूनिटी मिलती है. इसका मतलब यह है कि जब तक वे पद पर हैं, तब तक किसी दूसरे देश की अदालत उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकती या उन पर मुकदमा नहीं चला सकती.
क्या यह इम्यूनिटी स्थायी है
नहीं. यह सुरक्षा पक्की नहीं. जैसे ही कोई नेता पद से हटता है, इम्यूनिटी काफी हद तक खत्म हो जाती है. पूर्व राष्ट्राध्यक्षों पर दूसरे देशों में केस चल सकते हैं, खासकर अगर आरोप गंभीर हों जैसे मानवाधिकार उल्लंघन या ड्रग और हथियारों की तस्करी.
वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति मादुरो ने ट्रायल के पहले दिन इसी बात का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि जब उन्हें अमेरिकी फोर्स ने पकड़ा, वे तब भी वेनेजुएला के राष्ट्रपति थे, और अब भी हैं. ऐसे में उन्हें डिटेंशन सेंटर में रखने की बजाए सुरक्षा और सम्मान मिलना चाहिए.
तब क्या अमेरिका ने नियम तोड़ा है
दरअसल, यहां खेल कुछ और है. अमेरिका मादुरो को वैध राष्ट्रपति मानता ही नहीं. वॉशिंगटन का आरोप है कि पिछले चुनावों में मादुरो ने वोटों की धांधली की ताकि रिजल्ट उनके पक्ष में आए. बकौल अमेरिका, मादुरो वैध लीडर नहीं हैं इसलिए उन्हें किसी तरह की छूट नहीं दी जा रही.
मादुरो का क्या कहना है
ट्रायल के लिए न्यूयॉर्क सिटी की अदालत में जाते ही मादुरो ने कहा कि वे अब भी देश के राष्ट्रपति हैं और उन्हें इम्यूनिटी मिलनी ही चाहिए. साथ ही साथ उन्होंने खुद को प्रिजनर ऑफ वॉर यानी युद्ध बंदी भी बता दिया.
युद्धबंदी के स्टेटस से मादुरो के साथ सम्मानजनक व्यवहार की उम्मीद कितनी
मादुरो ने स्पेनिश में कहा कि उन्हें अगवा करके युद्धबंदी बना लिया गया. इसका मतलब ये है कि अमेरिका ने कानून के तहत एक्शन नहीं लिया, बल्कि मिलिट्री एक्शन लेते हुए उन्हें बंदी बनाया. अगर कोई युद्धबंदी है तो उसे जेनेवा कन्वेंशन के तहत रखा जाता है.
क्या होता है जेनेवा कन्वेंशन में
कन्वेंशन के मुताबिक युद्धबंदी की आवाजाही पर कुछ पाबंदियां हो सकती हैं, लेकिन उन्हें आम अपराधियों की तरह कड़ी कैद में नहीं रखा जा सकता, जब तक कि उनकी सुरक्षा के लिए ऐसा करना जरूरी न हो. आमतौर पर जंग खत्म होते ही युद्धबंदियों को रिहा कर दिया जाता है. उन्हें कोई सजा नहीं मिलती.
तो क्या मादुरो युद्धबंदी कहला सकते हैं
अमेरिकी तरीके से देखें तो नहीं. वॉशिंगटन दरअसल मादुरो को नशे की तस्करी का आरोपी मानता है, न कि सैन्य संघर्ष में फंसा हुआ प्रिजनर. अदालत उनकी वॉर प्रिजनर की रिक्वेस्ट भी खारिज कर चुकी.
तो अब मादुरो के पास क्या उम्मीद है
उनकी अकेली उम्मीद अब वेनेजुएला की नई लीडरशिप से है. वहां के नेता इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में अपील कर सकते हैं कि मादुरो स्टेट हेड हैं और उन्हें इम्यूनिटी दी जाए. लेकिन चूंकि आईसीजे भी किसी देश के, खासकर अमेरिका के मामलों में दखल नहीं देता, लिहाजा मादुरो के पास उम्मीद काफी कम है.
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