'7 साल तक नहीं था काम, तंगी में गुजारे दिन', 'तारक मेहता...' एक्टर का छलका दर्द, असित कुमार मोदी ने बदली जिंदगी

'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' में अब्दुल के किरदार से फैंस का दिल जीतने वाले शरद संकला एक समय पर मुश्किल वक्त देख चुके हैं. उनके पास काम नहीं था. 7 साल तक उन्होंने स्ट्रगल किया.

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एक्टर ने देखे मुश्किल दिन (Photo: Instagram @officialsharadsankla19) एक्टर ने देखे मुश्किल दिन (Photo: Instagram @officialsharadsankla19)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 10 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:06 PM IST

टीवी के ब्लॉकबस्टर शो 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' ने स्टार्स को खास पहचान दी है. उन्हीं में से एक एक्टर शरद संकला भी हैं. अब्दुल के किरदार ने उन्होंने लोगों क दिल में खास जगह बनाई है. उन्हें फैंस का बेशुमार प्यार मिलता है. मगर कम लोग ही जानते हैं कि शरद संकला ने अपनी जिंदगी में काफी स्ट्रगल किया है.

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एक्टर को याद आए मुश्किल दिन 

ईटाइम्स संग बातचीत में शरद संकला ने बताया कि 7 साल तक उनके पास कोई काम नहीं था. उन्होंने मुश्किल दिन देखे हैं. एक्टर ने शो के प्रोड्यूसर असित कुमार मोदी के बारे में भी कई बातें साझा की. अपने स्ट्रगल पर बात करते हुए शरद संकला बोले- साल 2001 से 2007 तक मैंने काफी कम काम किया है. हर कोई जिंदगी में मुश्किल वक्त का सामना करता है. उस वक्त प्रोडक्शन हाउस ज्यादातर अपनी टीम के साथ ही काम करते थे. इसलिए मुझे ज्यादा मौके नहीं मिले. 

'बाद में मुझे पता चला था कि असित कुमार मोदी बड़े स्केल पर एक शो बनाने की प्लानिंग कर रहे हैं. मेरे एक करीबी कॉलेज फ्रेंड ने असित भाई को मेरा नाम सजेस्ट किया था. उस टाइम कोई ऑडिशन नहीं हुआ था. असित भाई ने डायरेक्टली मुझे बुलाकर शो का कॉन्सेप्ट समझाया था. उन्होंने मुझे बताया था कि शो में अलग-अलग कम्युनिटी के किरदार होंगे, लेकिन कोई मुस्लिम किरदार नहीं था.'

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असित कुमार मोदी ने बनाई जिंदगी

एक्टर ने आगे कहा- ऑरिजनल स्टोरी में पान की दुकान थी, क्योंकि शो गुजरात से कनेक्टेड था, तो उन्होंने पान की दुकान के मालिक का किरदार मुझे निभाने को कहा, जो बहुत ही मासूम होता है. उस वक्त मेरे पास कोई काम नहीं था. ईमानदारी से कहूं तो कौन असित कुमार मोदी के ऑफर को ठुकराएगा? आज आप देख सकते हैं कि मैं कहां हूं.

अपने मुश्किल दिनों को याद कर शरद आगे बोले- काम उस वक्त पूरी तरह से धीमा पड़ गया था. मैं ज्यादातर छोटे रोल्स ही करता था, जैसे हीरो का दोस्त. उस वक्त इंडस्ट्री का यही कल्चर था. बाद में चीजें बदलनी शुरू हो गईं. ट्रेंड बदल गया. हीरो खुद ही कॉमेडी करने लगे और पूरी फिल्म का जिम्मा उठाने लगे. इसलिए मेरे लिए ये मुमकिन नहीं था कि मैं खुद ही रोल चूज करूं या फिर किसी किरदार को करने से इनकार करूं. आपको जो मिलता है उसे एक्सेप्ट करना पड़ता है. 

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