कृष्णावतारम रिव्यू: भव्यता पर भारी पड़े भाव, श्री कृष्ण की 'प्रेम नीति' को बड़ी सुंदरता से दिखाती है फिल्म

भगवान कृष्ण की कहानी को बड़े पर्दे पर दोहराना एक मुश्किल काम है, क्योंकि दर्शक इस संसार से पहले ही भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं. लेकिन क़ृष्णावतारम पार्ट 1: हृदयम अपने सुंदर विजुअल्स, दमदार म्यूजिक और राधा-कृष्ण के भावुक प्रेम के जरिए ऐसा संसार रचती है, जिसमें खो जाना आसान है.

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क़ृष्णावतारम रिव्यू (Photo: Instagram/@siddharthhgupta) क़ृष्णावतारम रिव्यू (Photo: Instagram/@siddharthhgupta)

सुबोध मिश्रा

  • नई दिल्ली ,
  • 08 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:35 PM IST
फिल्म:कृष्णावतारम
3/5
  • कलाकार : सिद्धार्थ गुप्ता, संस्कृति जायना, सुष्मिता भट, निवाशियनी कृष्णन
  • निर्देशक :हार्दिक गज्जर

भक्ति और सिनेमा में एक बात कॉमन है— दोनों में ही आपको अपना अविश्वास किनारे रखना पड़ता है. दोनों में ही परम आनंद तभी मिलता है, जब आप अपना संसार-अपनी रियलिटी भूलकर सामने दिख रहे संसार में खो जाएं. क़ृष्णावतारम पार्ट 1: हृदयम आपके सामने ऐसा ही एक संसार रचती है.

भगवान श्री कृष्ण की कहानी हमने बचपन से पढ़ी-सुनी है, ये हमारी संस्कृति का हिस्सा है. और इतनी परिचित कहानी जब भी दोहराई जाती है तो सबसे बड़ा चैलेंज यही होता है कि क्या इस बार कहानी कहने वाला वो संसार रच पाएगा जो आपको बांध सके? डायरेक्टर हार्दिक गज्जर की क़ृष्णावतारम अपनी छोटी-छोटी कमियों के बावजूद इस काम में काफी हद तक कामयाब होती है.

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क्या है फिल्म का प्लॉट?
क़ृष्णावतारम जगन्नाथ पुरी से शुरू होती है, जहां एक गुरुजी (जैकी श्रॉफ) दर्शन करने आए भक्तों को भगवान कृष्ण की कहानी सुना रहे हैं. एक यंग लड़का इस कहानी को 'अतार्किक और अवैज्ञानिक' कहता है और गुरुजी उसे कृष्ण के जीवन के पहलू समझाना शुरू करते हैं. इस सेटअप के साथ शुरू होती है मुख्य कहानी, जहां पैर में लगे तीर के साथ एक पेड़ के सहारे बैठे कृष्ण (सिद्धार्थ गुप्ता) का जीवन अंत हो रहा है. वो अपने जीवन को याद कर रहे हैं.

क़ृष्णावतारम आपको सीधा द्वारका ले जाती है, जहां आपको भामा (संस्कृति जायना) मिलती हैं. कृष्ण उनके पिता के शत्रु हैं, लेकिन उनके मन पर राज करते हैं. भामा अपना प्रेम जाहिर कर सके, इससे पहले कृष्ण अपनी सखी द्रौपदी के स्वयंवर के लिए चले जाते हैं. भामा को टेंशन में देख कृष्ण की बहन सुभद्रा उन्हें बताती हैं कि वो स्वयंवर में खुद शामिल नहीं होंगे, क्योंकि उनके हृदय में तो राधा (सुष्मिता भट) का प्रेम बसता है.

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यहां से कहानी बरसाना पहुंचती है. कृष्ण की रास लीला और राधा की प्रेम लीला के सीक्वेंस को बड़ी सुंदरता से पेश किया गया है. लेकिन अपने जन्म का रहस्य और कंस वध के लिए कृष्ण को बरसाना और राधा को छोड़कर जीवन में आगे बढ़ना पड़ता है. इधर द्वारका में कृष्ण की वापसी, उनकी पत्नी रुक्मिणी (निवाशियनी कृष्णन) के साथ होती है तो भामा का दिल टूटने के साथ फिल्म का इंटरवल होता है.

सेकंड हाफ में क़ृष्णावतारम भामा को सत्यभामा में बदलते और कृष्ण की दूसरी पत्नी बनते दिखाती है. यहीं से जामवंत के जरिए कृष्ण की कहानी, उनसे पहले के युग में हुए विष्णु अवतार श्रीराम को भी छूती है. जामवंत अपनी बेटी जामवंती को कृष्ण को सौंप देते हैं. बीच में द्रौपदी के चीर-हरण और फिर नरकासुर से कृष्ण और सत्यभामा का युद्ध दिखाकर क़ृष्णावतारम द्वारका के समुद्र में डूबने पर खत्म हो जाती है. यहां देखें क़ृष्णावतारम का ट्रेलर:

कितनी दमदार, कितनी कमजोर है क़ृष्णावतारम?
सुंदर प्रोडक्शन डिजाइन और बेहतरीन म्यूजिक वो संसार है जहां आप खो जाएंगे. बहुत लिमिटेड बजट और रिसोर्स के साथ बनी क़ृष्णावतारम का सेट डिजाइन रंगों से भरा हुआ है. रंगों और संगीत से रचा ये खूबसूरत संसार कई बार ओवर भी लगता है. क्लोज फ्रेम्स में फिल्म की सुंदरता भरपूर दिखती है, लेकिन फ्रेम खुलते ही फिल्म के प्रोडक्शन की लिमिटेशन नजर आने लगती है. CG (कंप्यूटर जनरेटेड) विजुअल्स जहां भी हैं, खासकर फाइट सीक्वेंस और नरकासुर वध वाले हिस्सों में, वहां स्केल की कमी का असर दिखता है. लेकिन क़ृष्णावतारम कहीं भी सीन्स में भाव कम नहीं होने देती.

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डायलॉग बहुत सॉलिड हैं और कहानी के टाइम पीरियड को काफी हद तक सूट करते हैं. फिल्म के सारे नए एक्टर्स इसकी जान हैं. सिद्धार्थ और सुष्मिता ने राधा-कृष्ण के प्रेम को जिस केमिस्ट्री के साथ पर्दे पर जिया है, वो इस कहानी की जान है. संस्कृति शुरुआत में सत्यभामा के रोल में थोड़ी असहज जरूर लगती हैं, मगर इंटरवल तक आते-आते वो स्क्रीन पर अपनी पकड़ बना लेती हैं. निवाशियनी के हिस्से कम सीन्स आए हैं, मगर उनमें उनकी एक्टिंग ध्यान बांधती है.

सिद्धार्थ की मुस्कुराहट में कृष्ण की शैतानी खूब झलकती है. तीनों एक्ट्रेसेज की खूबसूरती और स्क्रीन प्रेजेंस बांधने वाली है. मगर स्क्रीनप्ले की कमियां भी कई बार फ्लो तोड़ती हैं, खासकर सेकंड हाफ में. फर्स्ट हाफ पूरी तरह ड्रामा पर बेस्ड है और यही फिल्म की जान है. फिल्म में गाने बहुत हैं, लेकिन प्रसाद एस का शानदार म्यूजिक और इरशाद कामिल के बेहतरीन लिरिक्स इन गानों को कहीं भी बोझ नहीं बनने देते.

कुल मिलाकर क़ृष्णावतारम एक अद्भुत माइथोलॉजिकल कहानी को उसके पूरे रंगों और उस युग की भव्यता के साथ पेश करने की बहुत ईमानदार कोशिश है. ज्यादातर हिस्सों में ये फिल्म असर छोड़ने में कामयाब होती है. कमियां ऐसी नहीं हैं जो पूरे असर से बड़ी हों, इसलिए बड़े पर्दे पर क़ृष्णावतारम देखने का एक्सपीरियंस अच्छा है.

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