पायल कपाड़िया की फिल्म 'ऑल वी इमेजिन ऐज लाइट' से कुछ साल पहले ग्लोबल ब्रेकथ्रू मिलने के बाद कनि कुश्रुति ने अब अनुभव सिन्हा की कोर्टरूम ड्रामा फिल्म 'अस्सी' के साथ हिंदी सिनेमा में एंट्री कर ली है. वे इसमें परिमा नाम की एक रेप सर्वाइवर का किरदार निभा रही हैं, जो नई दिल्ली के लोकल कोर्ट में अपने अपराधियों के खिलाफ न्याय की लड़ाई लड़ रही है. उनका केस एक जज्बाती वकील रावी (तापसी पन्नू) लड़ती है. इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में एक्ट्रेस ने अपनी भाषा की कमी, मलयालम फिल्म सेट्स पर महिलाओं की सुरक्षा में बदलाव और विजिलेंट/सेवियर/रिवेंज वाली कहानियों पर अपनी राय शेयर की.
मलयालम सिनेमा में नहीं थी सुरक्षा?
कनि कुश्रुति से पूछा गया कि उन्होंने पहले कहा था कि उनको वर्कप्लेस पर अनुचित तरीके से अप्रोच किया गया है. क्या केरल में WCC यानी Women in Cinema Collective बनने के बाद फिल्म सेट्स ज्यादा सुरक्षित हो गए हैं? जवाब में उन्होंने कहा, 'मैं कम से कम केरल में बदलाव देख रही हूं. 15 साल पहले अगर मैं किसी मलयालम फिल्म सेट पर जाती थी, तो ज्यादातर अन्य महिला एक्ट्रेस ही एकमात्र महिलाएं होती थीं. केरल की तुलना में, जब मैं मुंबई आती हूं, तो सेट पर ज्यादा महिलाएं मौजूद होती हैं. इससे, पहले ही वर्कप्लेस का माहौल बदल जाता है. केरल में मुश्किल से एक फीमेल असिस्टेंट डायरेक्टर होती थी, वो भी हाल ही में. पहले उन्हें पेमेंट नहीं मिलता था या सेट पर वॉशरूम जैसी सुविधाएं नहीं मिलती थीं. लेकिन अब, क्योंकि लोग खुलकर बोल रहे हैं और WCC जैसे उभरा, ज्यादातर सेट्स पर एक इंटरनल कमिटी होती है जहां महिलाएं जाकर बात कर सकती हैं. इसलिए अब क्रिएटिव साइड पर भी ज्यादा महिलाएं हैं. लोग कोई भी काम करने से पहले सोचते हैं.
उनसे आगे पूछा गया कि क्या आपको लगता है कि ये असली बदलाव है या सिर्फ डर की वजह से? कनि कुश्रुति ने जवाब दिया, 'कहीं न कहीं, ये डर से आ रहा है, जो आदर्श नहीं है. इससे लगता है कि आप छिप रहे हैं. आपके मन में कोई भी अनियंत्रित विचार आ सकते हैं, लेकिन आपको सोचने और व्यवहार करने का तरीका सीखना चाहिए. कुछ चीजें जेनेटिक होती हैं, जिन पर आपका कंट्रोल नहीं होता. लेकिन आपके पास ये कंट्रोल होता है कि आप उस पर कैसे एक्ट करते हैं. जैसे मुझे चीनी बहुत पसंद है (लेकिन क्या मुझे हर बार इंडल्ज करना जरूरी है?). तो केरल में कुछ बदलाव है, जिससे मैं बहुत खुश हूं. साथ ही नई जेनरेशन अलग है. उनके अलग इश्यू हो सकते हैं, जो सामने आएंगे और हम देखेंगे कि उनका सामना कैसे करें, लेकिन हां, बदलाव है.
'अस्सी' में रेप सीक्वेंस शूट करना था मुश्किल
फिल्म 'अस्सी' में कनि कुश्रुति ने एक रेप सीन किया था, जिसे देखकर किसी का भी दिल दहल सकता है. इसे शूट करने को लेकर सवाल के जवाब में एक्ट्रेस ने कहा, 'ये मेरे लिए उतना ही मुश्किल था जितना मेरे को-एक्टर्स के लिए, जिन्हें वो एक्ट करना पड़ता है जो वे वैसे नहीं करते. वे भी संघर्ष कर रहे थे. शायद मैं कम संघर्ष कर रही थी. मेरी अप्रोच क्लिनिकल है. मैं अपने शरीर के साथ बहुत कंफर्टेबल हूं. मैं थिएटर से हूं. जब मैं कोई न्यूज पढ़ती हूं कि कुछ हुआ है, तो वो मुझे सच में डराता है. जब ये फिक्शन है, तो मैं इसे हमेशा ऐसे अप्रोच करती हूं. ये मुझे उतना प्रभावित नहीं करता जितना कोई रियल न्यूज करती है, जहां ये सच में हुआ है. वो मुझे हर दिन डराता है.
ऐसे में कनि से पूछा गया कि फिल्म में उनके किरदार का तापसी के किरदार के साथ क्या रिलेशन है? ये सेवियर सिंड्रोम नहीं है? एक्ट्रेस ने जवाब दिया, 'जब मैंने इसे किया, तो मुझे ईमानदारी से पता नहीं चला. जब मैंने फिल्म देखी, तो मुझे बहुत पसंद आया कि इक्वेशन कैसे आ रहा है. वरना हमेशा सेवियर होता है. यहां ऐसा नहीं लगा. बहुत-सी महिलाएं इसे अलग-अलग तरीके से झेलती हैं. अक्सर ऐसा लगता है कि उन्हें मदद की जरूरत है. सबको मदद चाहिए, लेकिन ये सभी महिलाओं के अनुभवों को शामिल नहीं करता. इस फिल्म में सभी फीमेल कैरेक्टर्स, जैसे रेवती मैम का किरदार (जज) और तापसी की असिस्टेंट भी, अपने-अपने सफर से अलग-अलग पर्सपेक्टिव रखती हैं, जो बहुत अच्छी इंटरप्रिटेशन है.
हिंदी फिल्मों में क्यों नहीं मिल रहा काम?
कनि कुश्रुति लंबे वक्त से साउथ सिनेमा का हिस्सा रही हैं. 'अस्सी' के साथ उन्हें पहली बार हिंदी सिनेमा में देखा गया है. ऐसे में उनसे पूछा गया कि उन्हें हिंदी फिल्में क्यों नहीं मिलतीं? एक्ट्रेस ने कहा, 'क्योंकि मैं हिंदी नहीं बोलती. मुझे जो भी पार्ट्स ऑफर होते हैं, मैं सब नहीं कर पाऊंगी. मैं उन्हें कहती हूं, 'प्लीज मुझे कास्ट मत करो.' ये कुछ ऐसा होना चाहिए जैसे अस्सी, क्योंकि अनुभव (सिन्हा) ने बहुत अच्छे से मेरे किरदार को केरल से बनाया. वरना वो इसे उत्तर भारत के किसी और हिस्से से, शायद दिल्ली से बनाना चाहते थे. मैंने उन्हें कहा कि मैं लाइन्स भी नहीं सीख सकती. उन्हें समझने में ही बहुत समय लगेगा. मुझे नहीं लगता कि मैं हिंदी इतनी जल्दी सीख सकती हूं. साथ ही कल्चर और बहुत-सी चीजें. मैं हर पहलू में एक ट्रू मलयाली हूं. मैं अभी भी मलयालम में सोचती हूं. इंग्लिश में बोलते वक्त मुझे लगातार ट्रांसलेट करना पड़ता है.'
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