बसपा संस्थापक कांशीराम ने अस्सी के दशक में समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े दलित समाज के बीच राजनीतिक चेतना जगाने का काम किया. दलित राजनीति का ऐसा सियासी प्रयोग किया कि बसपा ने उत्तर प्रदेश में मजबूती के साथ दस्तक दी और मायावती ने एक−दो बार नहीं बल्कि चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली. सूबे में दलित वोटों पर मायावती का लंबे समय तक एकछत्र राज कायम रहा, लेकिन दलितों के एक तबके ने बसपा से मुंह मोड़ा तो फिर उन्हें सत्ता नसीब नहीं हुई.
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा की सियासी बिसात बिछाई जाने लगी है. मायावती सूबे में सत्ता में वापसी के लिए ब्राह्मण समुदाय को साधने में जुटी हैं तो उनके दलित वोटबैंक में सेंधमारी के लिए सारी पार्टियां लगी हैं. पश्चिम यूपी में दलित राजनीति का नया चेहरा बनकर उभरे चंद्रशेखर बसपा के विकल्प के तौर पर खुद को पेश कर रहे हैं जबकि मायावती 2007 की तरह ही सत्ता में आने के लिए बेताब हैं. इसके अलावा कांग्रेस से लेकर सपा और बीजेपी की नजर भी दलित वोटों पर है.
दलित दो हिस्सों में बंटा
ओबीसी समुदाय के बाद उत्तर प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी हिस्सेदारी दलित समुदाय की है. सूबे में दलित आबादी 22 फीसदी के करीब है. यह दलित वोटबैंक जाटव और गैर-जाटव के बीच बंटा हुआ है. 22 फीसदी कुल दलित समुदाय में सबसे बड़ी संख्या 12 फीसदी जाटवों की है और 10 फीसदी गैर-जाटव दलित हैं.
यूपी में दलितों की कुल 66 उपजातियां हैं, जिनमें 55 ऐसी उपजातियां हैं, जिनका संख्या बल ज्यादा नहीं हैं. इसमें मुसहर, बसोर, सपेरा और रंगरेज जैसी जातियां शामिल हैं. दलित की कुल आबादी में 56 फीसदी जाटव के अलावा दलितों की अन्य जो उपजातियां हैं, उनकी संख्या 46 फीसदी के करीब है. पासी 16 फीसदी, धोबी, कोरी और वाल्मीकि 15 फीसदी और गोंड, धानुक और खटीक करीब 5 फीसदी हैं.
बसपा प्रमुख मायावती और भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर जाटव समुदाय से आते हैं. यूपी की सियासत में दलित राजनीति की कमान जाटव समुदाय के ही इर्द-गिर्द रही है. वहीं, 2012 के चुनाव के बाद से गौर-जाटव दलित में बाल्मीकि, खटीक, पासी, धोबी, कोरी सहित तमाम जातियों के विपक्षी राजनीतिक दल अपने-अपने पाले में लामबंद करने में जुटे हैं.
जाटव समुदाय
उत्तर प्रदेश में जाटव और चमार की दलितों में सबसे बड़ी भागेदारी है. आजमगढ़, जौनपुर, आगरा, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, गोरखपुर, गाजीपुर, अमरोहा, मुरादाबाद, नोएडा, अलीगढ़, गाजियाबाद, बस्ती, संतकबीरनगर, गोंडा, सिद्धार्थनगर, मेरठ, बुलंदशहर, बदायूं और सहारनपुर में जाटव समुदाय की बड़ी आबादी रहती है. दलित सियासत में जाटव समुदाय ही प्रमुख रूप से हावी रहा है. मायावती और चंद्रशेखर दोनों ही जाटव समुदाय से आते हैं. जाटव समुदाय अभी बसपा का कोर वोटबैंक माना जाता है.
पासी समुदाय
दलितों में जाटव के बाद दूसरे नंबर पर पासी जाति आती है, जो खासकर सेंट्रल यूपी में सियासी तौर पर काफी प्रभावी मानी जाती है. सीतापुर, रायबरेली, बाराबंकी, अमेठी, कौशांबी, प्रतापगढ़, लखनऊ देहात, फतेहपुर, उन्नाव, हरदोई, बस्ती, गोंडा जैसे जिले में प्रभावी है. बीजेपी ने पासी समुदाय के तौर पर केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर को आगे बढ़ाया तो सपा ने बसपा छोड़कर आए इंद्रजीत सरोज पर दांव खेला है.
धोबी-वाल्मीकि
दलितों में धोबी और वाल्मीकि भी काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है. बरेली, शाहजहांपुर, सुल्तानपुर, गाजियाबाद, मेरठ, हाथरस और बागपत में धोबी और वाल्मीकि काफी बड़ी संख्या में है. पश्चिम यूपी में जाटव केंद्रित राजनीति के चलते वाल्मीकि शुरू से ही बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है और धोबी समुदाय भी 2012 के बाद से बसपा से छिटक गया है.
कोरी समुदाय
दलितों में कोरी समुदाय भी काफी अहम है. इनकी संख्या भले ही बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन कानपुर देहात, औरेया, इटावा, जालौन, महोबा, हमीरपुर, झांसी, फर्रुखाबाद, चित्रकूट, फिरोजाबाद, मैनपुरी, कन्नौज जैसे में जिले में है. कोरी समुदाय भी बसपा से छिटका है और बीजेपी उसे साधने के तमाम कवायद कर रही है.
खटिक जाति
उत्तर प्रदेश में खटिक समुदाय भी गैर-जाटव दलित समुदाय में काफी महत्वपूर्ण है. खाटिकों की संख्या कौशांबी, कानपुर, इलाहाबाद, अमेठी, जौनपुर, बुलंदशहर, भदोही, वाराणसी, आजमगढ़, सुल्तानपुर में अच्छी खासी है. खटिक समाज बीजेपी का हार्डकोर वोटर माना जाता है.
यूपी में दलित सियासत
उत्तर प्रदेश में 42 ऐसे जिलें हैं, जहां दलितों की संख्या 20 फीसदी से अधिक है. सूबे में सबसे ज्यादा दलित आबादी सोनभद्र में 42 फीसदी, कौशांबी में 36 फीसदी, सीतापुर में 31 फीसदी है, बिजनौर-बाराबंकी में 25-25 फीसदी हैं. इसके अलावा सहारनपुर, बुलंदशहर, मेरठ, अंबेडकरनगर, जौनपुर में दलित समुदाय निर्णायक भूमिका में है. यूपी में 17 लोकसभा और 85 विधानसभा सीटें दलित समुदाय के लिए रिजर्व हैं.
दलित रिजर्व सीट पर परफॉर्मेंस
सूबे की 85 रिजर्व विधानसभा सीटों पर 2012 के चुनाव में सपा ने 31.5 फीसदी वोट लेकर 58 और बसपा ने 27.5 प्रतिशत वोटों के साथ 15 सीटें जीती थीं. वहीं बीजेपी को 14.4 फीसदी वोट के साथ महज 3 सीटें मिली थीं. वहीं 2017 में नतीजे बिल्कुल उलट गए और 85 सुरक्षित सीटों पर 2017 के नतीजों में 69 सीटें भाजपा ने जीती. उन्हें 39.8 प्रतिशत वोट मिले. वहीं सपा को 19.3 फीसदी वोट और 7 सीट मिली जबकि बीएसपी सिर्फ 2 सीटें जीत पाई.
समाजशास्त्री बद्री नारायण ने अपनी किताब 'फैसिनेटिंग हिन्दुत्वः सैफरन पॉलिटिक्स और दलित मोबिलाइजेशन' में लिखा है कि दलितों के बीच सामाजिक समरसता अभियान के तहत आरएसएस ने उस दलित वोट बैंक पर निशाना साधा जिस पर बीएसपी ने कभी ध्यान ही नहीं दिया था. इसका फायदा बीजेपी को सीधे-सीधे देखने को मिला. गैर-जाटव दलित जातियों को बसपा में न तो नेतृत्व में जगह मिली और न ही सत्ता में जाटव समाज की तरह भागेदारी. ऐसे में गैर-जाटव दलितों को बसपा से मोहभंग हुआ और उसका फायदा बीजेपी और दूसरी अन्य पार्टियों ने उठाया है.
कुबूल अहमद