पश्चिम बंगाल में चुनाव खत्म होने के बाद होने वाली हिंसा से निपटने के लिए प्रशासन ने पूरी तैयारी कर ली है. राज्य में करीब 75,000 अर्धसैनिक बलों के जवानों को तैनात किया गया है. इसके साथ ही सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF) की अत्याधुनिक मार्क्समैन बख्तरबंद गाड़ियां और नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) की सक्रिय खुफिया टीम भी पूरी तरह अलर्ट मोड पर है.
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, बंगाल के कई इलाकों में चुनाव के दौरान तैनात की गई इन बख्तरबंद गाड़ियों को अभी भी संवेदनशील क्षेत्रों में ही रखा जाएगा. 29 अप्रैल को दूसरे चरण के चुनाव के दौरान भी NIA की टीम जमीन पर उतरी थी ताकि लोगों के मन में सुरक्षा का विश्वास पैदा हो सके और यह संदेश जाए कि किसी भी तरह की हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी. आगे भी एनआईए की टीम ग्राउंड पर निगरानी रखने के लिए अलर्ट रहेगी.
चुनाव बाद हिंसा: क्यों होता है बंगाल संवेदनशील?
पश्चिम बंगाल का चुनावी इतिहास राजनीतिक रूप से जितना जीवंत रहा है, उतना ही संवेदनशील भी. यहां चुनाव सिर्फ वोटिंग तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अक्सर ये राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बन जाते हैं. कई बार नतीजों के बाद कार्यकर्ताओं के बीच आपसी टकराव, बदले की भावना और शक्ति प्रदर्शन की वजह से हिंसा भड़क उठती है. खासकर ग्रामीण इलाकों, सीमावर्ती जिलों और उन क्षेत्रों में यह खतरा ज्यादा होता है जहां राजनीतिक मुकाबला कड़ा है.
यही वजह है कि सुरक्षा एजेंसियों ने पोस्ट-पोल फेज (चुनाव के बाद का समय) को सबसे ज्यादा संवेदनशील मानते हुए विशेष रणनीति तैयार की है. करीब 75,000 अर्धसैनिक बलों के जवानों को पूरे राज्य में तीन स्तरों पर तैनात किया गया है, जिसमें अति संवेदनशील क्षेत्र, संवेदनशील क्षेत्र और सामान्य क्षेत्र शामिल हैं. इन जवानों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे केवल किसी घटना का इंतजार न करें, बल्कि ऐसी प्रिवेंटिव कार्रवाई करें जिससे हिंसा शुरू होने से पहले ही उसे रोका जा सके.
CRPF की मार्क्समैन बख्तरबंद गाड़ियां रहेंगी तैनात
इस बार सुरक्षा व्यवस्था का सबसे खास हिस्सा CRPF की मार्क्समैन बख्तरबंद गाड़ियां हैं, जो गेम-चेंजर साबित हुई हैं. ये गाड़ियां गोली और विस्फोट से सुरक्षा देती हैं और इन्हें खास तौर पर भीड़ नियंत्रण के लिए डिजाइन किया गया है. हाई-टेक निगरानी सिस्टम से लैस ये गाड़ियां कठिन रास्तों पर भी आसानी से चल सकती हैं. इन्हें उन इलाकों में तैनात रखा गया है जहां हिंसा की आशंका ज्यादा है. इनकी मौजूदगी से असामाजिक तत्वों में डर बना रहता है. इसके अलावा, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे भारत-बांग्लादेश सीमा से जुड़े जिलों पर विशेष फोकस है. इन क्षेत्रों में तस्करी, घुसपैठ और बाहरी तत्वों को रोकने के लिए सीमा सुरक्षा बलों के साथ तालमेल बिठाकर रात में विशेष पेट्रोलिंग की जा रही है.
29 अप्रैल को दूसरे चरण के मतदान के दौरान एनआईए को विशेष रूप से अलर्ट पर रखा गया था. हालांकि एनआईए सीधे तौर पर हर बूथ पर नहीं होती, लेकिन इस बार एजेंसी ने कोलकाता और आसपास के शहरी क्षेत्रों में सोशल मीडिया और संगठित नेटवर्क पर अपनी खुफिया नजर रखी. मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में बाहरी फंडिंग और संदिग्ध गतिविधियों की भी जांच की जा रही है. हावड़ा और हुगली जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में भी मजदूरों और स्थानीय समूहों के बीच तनाव की संभावना को देखते हुए एनआईए की नजर बनी हुई है.
किसी भी साजिश या उकसावे की निगरानी में NIA की भूमिका क्या रही?
सूत्रों के मुताबिक, एनआईए ने खुफिया इनपुट जुटाने और संदिग्ध फंडिंग पर नजर रखने के लिए आईबी (IB) और राज्य पुलिस के साथ बेहतरीन तालमेल बिठाया है. इतना ही नहीं, चुनाव खत्म होने और रिजल्ट आने के बाद भी एनआईए की विशेष टीम अलर्ट मोड पर रहेगी, ताकि सोशल मीडिया पर उकसावे या शरारती तत्वों की किसी भी साजिश पर पैनी नजर रखी जा सके. यही वजह है कि इस बार की सुरक्षा व्यवस्था पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा आधुनिक और व्यापक नजर आ रही है. खास बात ये है कि 75,000 जवान, मार्क्समैन गाड़ियां और एनआईए की ये खुफिया निगरानी इस बात का साफ संकेत है कि चुनाव आयोग नतीजों के बाद भी कोई जोखिम उठाना नहीं चाहता. हालांकि, इसकी असली सफलता तभी मुमकिन है जब राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी समझें और प्रशासन पूरी तरह निष्पक्ष होकर अपना काम करे.
जितेंद्र बहादुर सिंह