लक्ष्मी भंडार योजना... वो स्कीम जिसके दम पर ममता हर बार रोक देती हैं BJP का रथ!

लक्ष्मी भंडार योजना पश्चिम बंगाल की राजनीति का केंद्र बनी हुई है, जिसने 2021 से 2026 तक के चुनावी नैरेटिव को जोड़ दिया है. ममता बनर्जी सरकार द्वारा अंतरिम बजट में राशि बढ़ाने के ऐलान और विपक्षी वादों के बावजूद, यह योजना महिला वोट बैंक पर तृणमूल कांग्रेस की मजबूत पकड़ को दिखाती है. राज्य में महिलाओं का वोट निर्णायक भूमिका निभाता है और लक्ष्मी भंडार व कन्याश्री जैसी योजनाओं ने इस वर्ग को सीधे प्रभावित किया है.

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ममता बनर्जी सरकार ने इस योजना के तहत महिलाओं को मिलने वाली राशि को 2021 से लगातार बढ़ाया है. (File Photo: ITG) ममता बनर्जी सरकार ने इस योजना के तहत महिलाओं को मिलने वाली राशि को 2021 से लगातार बढ़ाया है. (File Photo: ITG)

aajtak.in

  • कोलकाता,
  • 06 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:30 PM IST

‘लक्ष्मी भंडार’, सर्च इंजन की भाषा में कहें तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति का सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला कीवर्ड है. यह 2021 में जितना प्रासंगिक था, 2026 में भी उतना ही अहम बना हुआ है. ममता बनर्जी सरकार के अंतरिम बजट में लक्ष्मी भंडार की राशि 500 रुपये बढ़ाने के ऐलान ने 2021 और 2026 के विधानसभा चुनावों के नैरेटिव को आपस में जोड़ दिया है. बजट के बाद ही नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि अगर भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तो लक्ष्मी भंडार के तहत 3000 रुपये दिए जाएंगे. कुछ लोग भले ही इसे भत्ते की राजनीति कहें, लेकिन हकीकत यह है कि 2021 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव, दोनों में तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में अच्छा प्रदर्शन किया है.

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राजनीति का एक अलग तरीका

2021 के बाद से पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति ने एक नया मोड़ लिया है. पहला, भत्ता या अनुदान की राजनीति. दूसरा, धर्म की राजनीति. लेकिन इन दोनों को केवल भत्ते या धर्म की राजनीति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. यह भी राजनीति का ही एक तरीका है. राजनीतिक विश्लेषक शुभमय मैत्र ने फोन पर बताया था कि प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता के अलावा भी कई फैक्टर होते हैं. जैसे लक्ष्मी भंडार एक फैक्टर है, भ्रष्टाचार एक फैक्टर है और प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता भी एक फैक्टर है. जब भी धर्म या ईश्वर से जुड़ा कोई मुद्दा सामने आता है, तब कई चीजें एक साथ काम करती हैं.

2021 में ममता बनर्जी ने पहली बार लक्ष्मी भंडार योजना का ऐलान किया था. साफ था कि इसका मकसद राज्य के महिला वोट बैंक को साधना था. इसका असर भी तुरंत दिखा. 2021 के नतीजों में महिला मतदाताओं ने बड़ी संख्या में तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया. पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं की संख्या करीब 3 करोड़ 76 लाख है. इसमें हर समुदाय और जाति की महिलाएं शामिल हैं. इस वोट बैंक में धर्म के आधार पर कोई बड़ा बंटवारा नहीं है.

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2019 में सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के पोस्ट पोल सर्वे के मुताबिक, पूरे देश में तृणमूल कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसे पुरुषों के मुकाबले महिलाओं से ज्यादा वोट मिलते हैं. 2016 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल को मिले कुल वोटों में करीब 52 प्रतिशत महिला वोट थे. पश्चिम बंगाल में करीब 48 प्रतिशत महिला मतदाता वोट डालती हैं. यानी राज्य में लगभग आधा वोट बैंक महिलाओं का है. लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाएं सीधे तौर पर इसी वर्ग को प्रभावित करती हैं. ममता बनर्जी ने सत्ता में आते ही यह बात समझ ली थी. इसी सोच का नतीजा 2013 में कन्याश्री योजना का ऐलान था.

2021 से अब तक कैसे बढ़ी लक्ष्मी भंडार की राशि

2021 में ममता बनर्जी ने पहली बार पश्चिम बंगाल की महिलाओं को हर महीने 500 रुपये देने का ऐलान किया. यह एक मास्टर स्ट्रोक माना गया. भले ही उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की सीटें बढ़ीं और वह मुख्य विपक्षी दल बनी, लेकिन तृणमूल कांग्रेस की सीटें भी बढ़ गईं. इसके बाद समय के साथ लक्ष्मी भंडार की राशि बढ़ती चली गई. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इसमें 500 रुपये और जोड़ दिए गए. अब 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले फिर से 500 रुपये की बढ़ोतरी की गई है. इस बार के अंतरिम बजट में लक्ष्मी भंडार के लिए 15 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त प्रावधान किया गया है. अब सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1500 रुपये और अनुसूचित जाति व जनजाति की महिलाओं को 1700 रुपये प्रतिमाह मिलेंगे. बढ़ी हुई राशि इसी महीने से मिलना शुरू हो जाएगी.

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क्यों अहम हैं बंगाल के मौन मतदाता?

अब सवाल उठता है कि क्या भारतीय जनता पार्टी महिला वोटरों का भरोसा जीत पाने में नाकाम रही है. 2021 में पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को अपने साथ जोड़ा था, लेकिन उसका खास फायदा नहीं हुआ, यह नतीजों से साफ है. इस बार चुनाव में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा जोर-शोर से उठाया जा रहा है. लेकिन क्या इससे महिला वोट पर असर पड़ेगा, इस पर संदेह है. वजह है बंगाल के मौन मतदाता. ये मतदाता चुपचाप वोट डालते हैं और यह समझना बेहद मुश्किल होता है कि उन्होंने किसे वोट दिया. इन मौन मतदाताओं में महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा मानी जाती है.

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