सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को टीएमसी नेता मुकुल रॉय को अयोग्य घोषित करने के कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे लगा दिया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉय माल्य बागची की बेंच ने मुकुल रॉय की गंभीर बीमारी और अस्पताल में इलाज की तस्वीरों पर गौर करते हुए यह आदेश पारित किया. कोर्ट ने कहा कि पेश किए गए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का परीक्षण किया जाना जरूरी है क्योंकि इनमें एआई (AI) के इस्तेमाल की संभावना हो सकती है.
मुकुल रॉय 2021 के चुनाव में बीजेपी के टिकट पर विधायक चुने गए थे, लेकिन बाद में वे वापस टीएमसी में शामिल हो गए. बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी और अंबिका रॉय ने उनके खिलाफ दलबदल कानून के तहत याचिका दायर की थी, जिसे स्पीकर ने पहले खारिज कर दिया था लेकिन हाईकोर्ट ने अयोग्य ठहराने का आदेश दिया था.
अब सुप्रीम कोर्ट ने शुभेंदु अधिकारी और अंबिका रॉय को नोटिस जारी कर चार हफ्ते में जवाब मांगा है.
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
कलकत्ता हाईकोर्ट की जस्टिस देबांशु बसाक की बेंच ने शुभेंदु अधिकारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए मुकुल रॉय को अयोग्य ठहराने का फैसला सुनाया था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने साक्ष्यों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि तस्वीरों में चेहरों के साथ छेड़छाड़ या एआई तकनीक का प्रयोग हो सकता है, इसलिए फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाना जरूरी है.
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बीमारी का तर्क और विपक्षी दलीलें
मुकुल रॉय के वकील ने कोर्ट में उनकी खराब सेहत का हवाला देते हुए हॉस्पिटल की तस्वीरें पेश कीं. दूसरी तरफ, प्रतिवादी के वकील गौरव अग्रवाल ने स्टे का विरोध करते हुए कहा कि मुकुल रॉय अस्पताल में जरूर हैं लेकिन उन्होंने विधायक के रूप में चुनाव लड़ा है. इसके बावजूद, बेंच ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के गहन परीक्षण की जरूरत बताते हुए मुकुल रॉय को फिलहाल पद पर बने रहने की अनुमति दे दी है.
क्या है पूरा मामला?
मुकुल रॉय का दल बदल मामला पिछले करीब चार साल से चर्चा में है. साल 2017 में टीएमसी छोड़कर बीजेपी में गए रॉय मई 2021 में विधायक बने, लेकिन जून 2021 में ही ममता बनर्जी की मौजूदगी में टीएमसी में लौट आए. इसके तुरंत बाद 18 जून 2021 को शुभेंदु अधिकारी ने उनकी सदस्यता खत्म करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष को अर्जी दी थी. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है.
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सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सभी पक्षों को अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए एक महीने का वक्त दिया है. अगली सुनवाई तक मुकुल रॉय की विधायकी पर कोई खतरा नहीं है. बंगाल की राजनीति में इसे टीएमसी की नैतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि चुनाव से पहले सीनियर नेता की सदस्यता रद्द न होना टीएमसी के लिए अच्छा संकेत है.
संजय शर्मा