चेन्नई में इंडिया टुडे की ओर से आयोजित 'राउंड टेबल तमिलनाडु' के मंच पर राजनीतिक हस्तियों ने शिरकत की. तमिलनाडु में होने वाले विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर बन रहे माहौल के बीच हो रहे इस आयोजन में जहां एक तरफ राजनीतिक दल अपनी बातचीत के जरिए जनता के विकास का ब्लूप्रिंट शेयर कर रहे हैं तो वहीं उन जरूरी सवालों के जवाब भी दे रहे हैं जो जनसरोकार के मुद्दे से जुड़े हैं.
इसी बीच इसके एक सेशन में भाजपा, डीएमके और एआईएडीएमके की वरिष्ठ महिला नेता एक ही मंच पर साथ नजर आईं. उन्होंने एक-दूसरे को गले लगाया, तीखे सवाल-जवाब भी किए, लेकिन एक बात पर सहमति जताई, महिलाओं को सत्ता के केंद्र में लाना अब जरूरी है. इंडिया टुडे के 'शी-पावर' सेशन में नेतृत्व और भागीदारी पर चर्चा हो रही थी, लेकिन ये चर्चा अगले ही पल कल्याणकारी योजनाओं, सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर की बहस में बदल गई. हालांकि सियासी मतभेदों के बावजूद आपसी सौहार्द बना रहा.
मंच पर तीनों पार्टियों की नेताओं ने की चर्चा
इस चर्चा में भाजपा की खुशबू सुंदर, डीएमके की डॉ. कनिमोझी सोमू और एआईएडीएमके की अप्सरा रेड्डी शामिल हुईं. तीनों नेताओं ने अपनी-अपनी पार्टियों के नजरिये और उपलब्धियों का बचाव किया और इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं की राजनीतिक भूमिका को और मजबूत करने की जरूरत है.
चर्चा की शुरुआत करते हुए डॉ. कनिमोझी सोमू ने तमिलनाडु में महिलाओं की प्रगति को द्रविड़ आंदोलन और पेरियार की विचारधारा से जोड़ा. उन्होंने कहा, 'महिलाओं को सशक्तिकरण, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की जरूरत है. उन्हें समाज में किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए.'
कनिमोझी ने किया डीएमके सरकार की योजनाओं का जिक्र
उन्होंने बताया कि 2021 से डीएमके सरकार ने महिलाओं के लिए कई योजनाएं लागू की हैं. मुफ्त बस यात्रा योजना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इससे महिलाओं को हर महीने 1,000 से 3,000 रुपये तक की बचत होती है. 'मगलिर उरिमाई थोगई' योजना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 'राज्य की लगभग 1.30 करोड़ महिलाएं इससे लाभान्वित हुई हैं और शुरुआत से अब तक हर एक लाभार्थी के खाते में कुल मिलाकर लगभग 29,000 रुपये जमा किए जा चुके हैं.'
शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने ‘पुधुमई पेन’ योजना का जिक्र किया, जिसके तहत उच्च शिक्षा पा रही छात्राओं को हर महीने 1,000 रुपये दिए जाते हैं. उन्होंने दावा किया कि इससे उच्च शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.
हालांकि चर्चा जल्द ही प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर केंद्रित हो गई. 2021 के विधानसभा चुनाव में केवल 12 महिलाएं चुनी गईं, जबकि 2016 में यह संख्या 17 थी. पिछले चुनाव में महिलाओं को टिकट वितरण 5 प्रतिशत से भी कम रहा. इसने सवाल खड़ा किया कि क्या कल्याणकारी योजनाएं वास्तविक राजनीतिक सशक्तिकरण में तब्दील हो पाई हैं?
देश की हर महिला को भारत की महिला के तौर पर देखने की जरूरत
भाजपा की खुशबू सुंदर ने कल्याणकारी योजनाओं को स्वीकार करते हुए व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने कहा, 'हमें महिलाओं को किसी एक पार्टी की संपत्ति की तरह नहीं देखना चाहिए. अगर इस देश की किसी महिला के साथ कुछ होता है, तो हमें उसे भारत की महिला के रूप में देखना चाहिए.'
उन्होंने कहा कि पितृसत्तात्मक सोच आज भी महिलाओं को राजनीति में आने से रोकती है. 'राजनीति में आने के लिए परिवार का खुला समर्थन चाहिए. दुर्भाग्य से वह समर्थन हमेशा नहीं मिलता,' उन्होंने कहा- महिला आरक्षण विधेयक पर उन्होंने केंद्र सरकार का समर्थन किया. देरी को लेकर उठे सवालों पर उन्होंने कहा, 'जो आप इतने सालों में नहीं कर सके, उसके लिए आपने हमें सिर्फ नौ साल दिए हैं. हमें काम जारी रखने दीजिए.'
महिलाओं के खिलाफ अपराध के मुद्दे पर उन्होंने कहा, 'चाहे घटना पोलाची में हुई हो या अन्ना यूनिवर्सिटी में, रेप, रेप है. आप राजनीतिक जरूरत के मुताबिक अत्याचारों को बांट नहीं सकते.' एआईएडीएमके की अप्सरा रेड्डी ने अपेक्षाकृत आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि तथ्यों का सामना करना जरूरी है. उन्होंने कहा, 'जब आप स्थानीय निकायों में महिलाओं की बड़ी संख्या की बात करते हैं, तो 50 प्रतिशत आरक्षण एआईएडीएमके ने लागू किया था.' उन्होंने अपनी पार्टी को सभी-महिला पुलिस थानों और सुरक्षा से जुड़ी अन्य पहलों का श्रेय भी दिया.
महिलाओं के खिलाफ अपराध पर जताई चिंता
महिलाओं के खिलाफ अपराध पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि POCSO मामलों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है. हाल की यौन हिंसा की घटनाओं का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, 'महिलाओं को राजनीति में आगे आने के लिए एकजुट होना होगा. भाजपा, डीएमके या एआईएडीएमके से ऊपर उठकर हमें महिलाओं के वोट बैंक के रूप में सोचना होगा.' उन्होंने चेतावनी दी, 'हर पल की देरी का मतलब है कि कहीं न कहीं एक बच्ची के साथ अत्याचार हो रहा है.'
आलोचनाओं का जवाब देते हुए डॉ. कनिमोझी ने द्रविड़ मॉडल के लंबे इतिहास का हवाला दिया और महिलाओं को संपत्ति अधिकार, सरकारी नौकरियों में आरक्षण और शिक्षा नीतियों का जिक्र किया. महिला आरक्षण विधेयक का स्वागत करते हुए उन्होंने इसके क्रियान्वयन की समय-सीमा पर सवाल उठाया. 'अगर इसे तुरंत लागू किया जाता तो बेहतर होता.
इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ना देरी का कारण बन सकता है,' उन्होंने कहा- बहस के दौरान कुछ पल ऐसे भी आए जब माहौल गर्म हुआ, लेकिन संचालक ने चर्चा को फिर साझा मुद्दों की ओर मोड़ दिया. तीखी सियासी बहस के बावजूद तीनों नेताओं ने एकजुटता के महत्व पर जोर दिया.
खुशबू सुंदर ने कहा, 'हम अलग-अलग पार्टियों से हैं, लेकिन जैसे ही हम यहां पहुंचे, हमने एक-दूसरे को गले लगाया. डॉ. कनिमोझी ने कहा, 'सभी महिलाएं एकजुट हों और कहें कि हमें नीतियां बनानी हैं, हमें मजबूती से खड़ा होना है.' चर्चा के दौरान हल्के-फुल्के पल भी आए, जब संसद में दोस्ताना संबंधों और उनकी बेटियों के स्कूल कनेक्शन का जिक्र हुआ. खुशबू ने मुस्कुराते हुए कहा, 'हम महिलाएं हैं और हम साथ अच्छे से निभा लेती हैं.'
तमिलनाडु उन राज्यों में है जहां महिला मतदाता पुरुषों से अधिक हैं और जहां साक्षरता व सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे सामाजिक सूचकांक देश में बेहतर माने जाते हैं. इसके बावजूद यह बहस स्पष्ट कर गई कि कल्याणकारी वादों की तुलना में राजनीतिक प्रतिनिधित्व अभी भी पीछे है.
aajtak.in