डीएमके सांसद दयानिधि मारन ने बुधवार को ‘फ्रीबीज बनाम वेलफेयर’ की जारी बहस के बीच तमिलनाडु की कल्याणकारी योजनाओं का बचाव किया. उन्होंने कहा कि जिसे आलोचक रेवड़ी राजनीति कहते हैं, असल में वह नागरिकों का सशक्तिकरण है. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले इंडिया टुडे की ओर से आयोजित 'राउंडटेबल तमिलनाडु' के दौरान मारन ने कहा कि, इन योजनाओं को महज चुनावी तोहफा बताना गलत है.
द्रविड़ मॉडल से तमिलनाडु का हुआ बदलाव
दयानिधि मारन ने तर्क दिया कि दशकों में तमिलनाडु का बदलाव द्रविड़ मॉडल की शासन व्यवस्था की वजह से संभव हुआ, जिसने समानता और वंचित वर्गों के लिए राज्य समर्थन को प्राथमिकता दी. उन्होंने कहा कि आजादी के बाद 1950 के दशक में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में गिने जाने वाला तमिलनाडु आज देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है.
उन्होंने कहा, 'हमें फ्रीबीज कहकर मजाक उड़ाना आसान है, लेकिन यह फ्रीबीज नहीं, सशक्तिकरण है.' मारन ने जोर देते हुए कहा कि जिन लोगों के पास संसाधनों की पहुंच नहीं है, उनकी मदद करना सरकार का कर्तव्य है. करीब 20 लाख छात्रों को लैपटॉप बांटना जैसी योजनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह की पहल उन लोगों के बीच की खाई को पाटती है जो तकनीक खरीद सकते हैं और जो नहीं खरीद सकते, खासकर ऐसे देश में जहां बड़ी आबादी की क्रय शक्ति सीमित है.
'महिलाओं को सशक्त करने पर है ध्यान'
उन्होंने मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की नीतियों को शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता पर केंद्रित बताया. मारन ने कहा, 'हम जातिवाद में निवेश नहीं कर रहे हैं और न ही धर्म के आधार पर लोगों को बांटने की कोशिश कर रहे हैं. हम शिक्षा के जरिए, खासकर महिलाओं को, सशक्त बनाने की कोशिश कर रहे हैं.' यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य में चुनावी माहौल बन रहा है और कल्याणकारी योजनाएं चुनाव प्रचार का प्रमुख मुद्दा बनने के साथ-साथ सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के बीच विवाद का मुख्य केंद्र भी हैं.
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