उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव का भले ही औपचारिक ऐलान न हुआ हो, लेकिन सियासी बिगुल बज चुका है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने दादरी से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत कर दी है तो सीएम योगी और पीएम मोदी ने विकास की सौगात से राजनीतिक माहौल बनाने में जुट गए हैं. सपा और बीजेपी के चुनावी हुंकार के बाद बसपा अध्यक्ष मायावती भी मिशन-2027 के मोड में उतर गई है. इस तरह यूपी की राजनीति पर चुनावी रंग चढ़ चुका है.
अखिलेश यादव के तेवर और सियासी रणनीति को देखते हुए मायावती ने मंगलवार को आनन-फानन में बसपा नेताओं की बैठक बुलाई. इस दौरान मायावती ने पार्टी संगठन को मजबूती देने और बसपा के खिसके जनाधार को वापस लाने के 14 अप्रैल को मिशन-2027 का आगाज करने का प्लान बनाया है.
उत्तर प्रदेश की बदली हुई सियासत में बसपा को एक के बाद एक चुनावी मात मिलती जा रही है. मायावती का जनाधार भी चुनाव दर चुनाव खिसकता ही जा रहा और तमाम बड़े नेता पार्टी छोड़ गए हैं. इस तरह से यूपी की राजनीति में बसपा अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. ऐसे में बसपा के वोटबैंक पर विपक्षी दलों की नजर है, जिसके चलते ही मायावती ने जमीन पर उतारने की रणनीति बनाई है.
अखिलेश की रैली के बाद मायावती एक्टिव
अखिलेश यादव ने 2027 का बिगुल नोएडा के दादरी से ही फूंककर पश्चिम में सियासत क गरमा दिया है. इसके बाद मायावती भी बेहद सक्रिय दिखाई देने लगी हैं मायावती न अचानक पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की अपनी मांग भी शुरू करती है.
अखिलेश यादव भी पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने के समर्थन में दिखाई दे रहे हैं. मायावती को चिंता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अगर दलित गुर्जर और मुसलमान के वोट में अखिलेश यादव ने सेंध लगा दी तो बसपा के लिए यूपी की सियासत लगभग खत्म सी हो जाएगी.
मायावती 14 अप्रैल को भरेंगी चुनावी हुंकार
2027 का विधानसभा चुनाव सिर पर है, जो मायावती और उनकी पार्टी बसपा के लिए 'करो या मरो' से कम नहीं है. मायावती ने संविधान निर्माता और दलित समाज के मसीहा कहे जाने वाले डा. आंबेडकर के सहारे दोबारा से खड़े होने और 'मिशन-2027' का आगाज करने का प्लान बनाया है, जिसके लिए सियासी एक्सरसाइज भी शुरू कर दी है.
मायावती ने मंगलवार को अपने नेताओं से स्पष्ट किया कि पार्टी की राजनीति सामाजिक संतुलन और न्याय पर आधारित रहेगी. इसके अलावा 14 अप्रैल को डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर की जयंती के अवसर पर लखनऊ में भव्य कार्यक्रम आयोजित करने का ऐलान किया गया है, जिसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं के जुटने की उम्मीद है. इस बार नोएडा के बजाय लखनऊ को कार्यक्रम का केंद्र बनाकर पार्टी ने प्रदेश की राजनीति में अपनी सक्रियता का संदेश देने की कोशिश की है।
आंबेडकर के सहारे मिशन-2027 का आगाज
माना जा रहा है कि आंबेडकर जयंती पर मायावती अपने समर्थकों को एकजुट कर विपक्षी दलों को अपनी सियासी ताकत का एहसास करा देना चाहती हैं. मायावती इंडिया ब्लॉक या किसी भी अन्य दल के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ने के अपने फैसले पर अडिग हैं. बसपा अपने दम पर विधानसभा चुनाव में उतरने की तैयारी में है. इसके लिए आंबेडकर जयंती मुफीद अवसर माना जा रहा है, यही वजह है कि मायावती ने अपने सिपहसालारों को रैली में भीड़ जुटाने का भी जिम्मा सौंपा है,
मायावती पिछले 20 सालों से हर विधानसभा चुनाव से लगभग एक साल पहले अपने अभियान की शुरुआत कर देती हैं. यही वजह है कि 14 अप्रैल को लखनऊ में होने वाली रैली को बसपा के 'मिशन 2027' का आगाज माना जा रहा है.
बसपा प्रमुख लखनऊ में अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को पार्टी की आगामी रणनीति के बारे में जानकारी देने के साथ उन्हें विपक्ष के झूठे प्रचार से भी अवगत कराएंगी. इस तरह मायावती की कोशिश बसपा के खिसके हुए जनाधार को दोबारा से मजबूत करने की है, क्योंकि सपा से लेकर बीजेपी और कांग्रेस तक की नजर उनके वोटबैंक पर है.
अखिलेश की हुंकार से मायावती ने बदले तेवर
उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय के 22 फीसदी वोट बैंक पर विपक्षी दलों की निगाहें लगी हुई हैं. राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव तक दलित वोटों को जोड़ने की मुहिम में जुटे हैं. राहुल ने कांशीराम को 'भारत रत्न' देने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा तो अखिलेश यादव ने कांशीराम की जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाया. सपा और कांग्रेस की रैलियों में जय भीम के नारे भी गूंजने लगे हैं, जो कभी बसपा की जनसभा में लगते थे.
मायावती पर बीजेपी का बी-टीम का आरोप लगता है, क्योंकि बीजेपी से ज्यादा कांग्रेस और सपा को निशाने पर लेती हैं. ऐसे में विपक्ष उन्हें बीजेपी खेमे में खड़े करने का दांव चलता रहा है. इसके चलते मुस्लिम वोटर पूरी तरह से मायावती से दूर हो गए हैं तो दलितों का एक बड़ा तबका भी छिटका है. वेस्ट यूपी से अखिलेश के चुनावी बिगुल फूंकने के बाद मायावती ने अपनी राजनीतिक तौर तरीके को पूरी तरह बदल दिया है.
बीजेपी की बी-टीम वाले नैरेटिव तोड़ पाएंगी?
बसपा प्रमुख मायावती ने मंगलवार को पार्टी नेताओं के साथ बैठक के बाद एक बयान जारी किया. मायावती ने अपने बयान में केंद्र और राज्य की बीजेपी सरकार पर निशाना साधते हुए महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ती जीवन-यापन लागत को लेकर गंभीर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि गैस सिलेंडर, पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी, खासकर गरीब और मेहनतकश वर्ग की कमर तोड़ दी है. सरकार पर उदासीनता का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि जनता के मुद्दों पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है.
बीजेपी पर हमले करके मायावती ने साफ कर दिया है कि अब उनके निशाने पर सिर्फ सपा और कांग्रेस ही नहीं बल्कि बीजेपी भी रहने वाली है. ऐसे में साफ है कि मायावती अपने ऊपर लग रहे बीजेपी परस्त वाली छवि से बाहर निकलने की है ताकि अपने कोर वोटबैंक को जोड़े रखने और खिसकते जनाधार को वापस पाने की स्टैटेजी मानी जा रहा है.
BSP के खिसकते जनाधार को रोकने की चुनौती
उत्तर प्रदेश की सियासत में बसपा के सामने कई चुनौतियां हैं. पिछले कुछ वर्षों में बसपा का वोट शेयर कम हुआ है और कई प्रमुख नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है. मायावती की जाटव समाज पर पकड़ अभी भी बरकरार है, लेकिन गैर-जाटव दलित उनसे छिटके हैं. बसपा का वोटर शेयर कम होकर 9 फीसदी के करीब पहुंच गया है. यही वजह है कि मायावती अपने जनाधार को वापस पाने की जुगत में है, जिसके लिए उन्होंने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठनात्मक मजबूती और जनाधार विस्तार की रणनीति तय की
लखनऊ में मंगलवार को हुई बैठक में प्रदेशभर से आए पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को मायावती ने स्पष्ट संदेश दिया गया कि बसपा को जमीनी स्तर पर सक्रिय और प्रभावी बनाना होगा. इसके अलावा बैठक में संगठन की वर्तमान स्थिति की विस्तृत समीक्षा की गई. मायावती ने कहा कि केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क खड़ा कर ही पार्टी को दोबारा सत्ता के करीब लाया जा सकता है.
बसपा से चुनाव लड़ने वालों की क्या बढ़ेगी डिमांड
मायावती ने कार्यकर्ताओं को मेहनत, अनुशासन और निष्ठा के साथ काम करने के निर्देश देते हुए कहा कि जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना ही बसपाकी प्राथमिकता होनी चाहिए. आर्थिक और जमीनी मजबूती पर जोर देते हुए उन्होंने पार्टी फंडिंग और संसाधनों के पारदर्शी उपयोग की भी बात कही है. साथ ही बसपा के जनाधार बढ़ाने के लिए गांव-गांव और शहर-शहर में सक्रिय संपर्क अभियान चलाने का आह्वान किया है. इस तरह से मायावती बसपा को चुनावी मैदान में लड़ते हुए दिखाने की कवायद में है ताकि पार्टी के साथ मजबूत नेता जुट सकें.
उत्तर प्रदेश में एक समय बसपा के टिकट का मतलब जीत की गारंटी मानी जाती है, इसके चलते बड़ी संख्या में लोग बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए बेताब रहते हैं. इसकी वजह बसपा का दलित वोटबैंक हुआ करता था, लेकिन 2012 के बाद से लगातार खिसका है. ऐसे में बसपा से चुनाव लड़ने वाले मजबूत नेताओं की कमी आई है. ऐसे में मायावती एक्टिव होकर बसपा को चुनावी मोड में लानी चाहती हैं ताकि मजबूत नेताओं को अपने साथ जोड़ सकें.
कुबूल अहमद