भरोसेमंद साथी से सीधे प्रतिद्वंद्वी तक: क्या नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ 'जायंट किलर' बनकर उभरेंगे TMC के पवित्र कर?

पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में इस बार चुनावी मुकाबला दिलचस्प हो गया है. बीजेपी छोड़कर टीएमसी में आए पबित्र कर को पार्टी ने शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ उम्मीदवार बनाया है. कर ने इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने जनता के मूड को देखते हुए यह फैसला लिया. उन्होंने नंदीग्राम में राजनीतिक स्थिति, अपने संगठन और चुनावी लक्ष्य को लेकर भी बात की. यह सीट पहले भी हाई प्रोफाइल मुकाबलों के कारण चर्चा में रही है.

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नंदीग्राम की जमीन पर आमने-सामने दो चेहरे, चुनावी जंग की तस्वीर साफ (Photo: ITG) नंदीग्राम की जमीन पर आमने-सामने दो चेहरे, चुनावी जंग की तस्वीर साफ (Photo: ITG)

अनिर्बन सिन्हा रॉय

  • कोलकाता,
  • 02 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 8:46 AM IST

नंदीग्राम, पश्चिम बंगाल की राजनीति का वो केंद्र, जहां से सत्ता की तकदीर बदलती है. आज उसी नंदीग्राम की गलियों में एक ऐसी चर्चा छिड़ी है, जिसने भारतीय जनता पार्टी के खेमे में हलचल मचा दी है. कभी शुभेंदु अधिकारी के सबसे खास सिपाही और उनके कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले पवित्र कर ने पाला बदल लिया है. उन्होंने न सिर्फ भाजपा को अलविदा कहा, बल्कि अब वो तृणमूल कांग्रेस (TMC) के टिकट पर अपने पुराने बॉस शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ सीधे मैदान में उतर आए हैं.

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पवित्र कर का यह कदम बंगाल की राजनीति में किसी बड़े धमाके से कम नहीं है. आखिर ऐसा क्या हुआ कि शुभेंदु का दाहिना हाथ कहे जाने वाले इस नेता ने रातों-रात पोस्टर और बैनर बदलवा दिए? कल तक जिन बैनरों पर शुभेंदु के साथ उनकी तस्वीरें होती थीं, आज वहां सीएम ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी नजर आ रहे हैं. इस बदलाव ने लोगों के मन में कई सवाल पैदा कर दिए हैं, जिनका जवाब खुद पवित्र कर ने एक खास बातचीत में दिया.

पवित्र कर का कहना है कि पार्टी बदलना कोई गुनाह नहीं है, क्योंकि शुभेंदु ने भी तो कभी पार्टी बदली थी. वे कहते हैं कि जब आप किसी नए सफर पर निकलते हैं, तो पुराने निशान पीछे छूट ही जाते हैं. लेकिन बात सिर्फ पोस्टर बदलने की नहीं है, बात उस भरोसे और अपमान की है जिसने एक वफादार साथी को प्रतिद्वंद्वी बना दिया. पवित्र कर के मुताबिक, नंदीग्राम की जमीन पर अब उन पुराने भाजपाइयों की कोई कद्र नहीं बची है जिन्होंने खून-पसीना एक करके पार्टी खड़ी की थी.

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'प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गई है भाजपा'

पवित्र कर ने साफ-साफ  कहा कि आज भाजपा एक ऐसी 'प्राइवेट लिमिटेड कंपनी' की तरह चलाई जा रही है, जहां कार्यकर्ताओं की बात सुनने वाला कोई नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि नंदीग्राम में राजनीतिक द्वेष के कारण लोगों पर झूठे केस लादे जा रहे हैं और जनता इस बोझ से अब थक चुकी है. पवित्र कहते हैं कि 'मैं कहीं बाहर से नहीं आया हूं, तृणमूल कांग्रेस मेरा पुराना घर है और मैं बस अपने घर वापस लौटा हूं. नंदीग्राम की जनता का मूड भांपने के बाद ही मैंने यह फैसला लिया.'

जब उनसे उनके और शुभेंदु अधिकारी के रिश्तों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया. पवित्र ने कहा कि शुभेंदु के साथ उनके निजी रिश्ते उतने कड़वे नहीं हैं, जितना लोग कयास लगा रहे हैं, लेकिन राजनीति में आत्मनिर्भरता सबसे जरूरी है. उन्होंने याद दिलाया कि 2021 में शुभेंदु अधिकारी की जो जीत हुई थी, उसके पीछे वो संगठन था जिसे उन्होंने एक-एक ईंट जोड़कर बनाया था. वे गर्व से कहते हैं कि 'मैं शुभेंदु के सामने सिर झुकाने वाला आदमी नहीं हूं. जब वे ममता सरकार में कद्दावर मंत्री थे, तब भी मैंने निर्दलीय चुनाव लड़कर उनके नाक के नीचे से ग्राम पंचायत जीत ली थी.'

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पवित्र कर का दावा है कि इस बार नंदीग्राम की हवा बदल चुकी है. उनका लक्ष्य है केस-मुक्त नंदीग्राम बनाना, जहां लोगों को विकास और सामाजिक सुरक्षा मिले, न कि पुलिस की फाइलें. उनका मानना है कि अल्पसंख्यक समुदाय भी अब शुभेंदु की भाषा और राजनीति से ऊब चुका है और वे इस बार बदलाव के लिए वोट करेंगे.

अंत में, जब जीत के मार्जिन की बात आई, तो पवित्र कर ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा कि वे 30,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से चुनाव जीतेंगे. उनका कहना है कि वे 4 तारीख को सीधे कालीघाट जाएंगे और नंदीग्राम की मिट्टी ममता को सौंप देंगे. नंदीग्राम की यह जंग अब सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि साख की लड़ाई बन गई है. क्या पवित्र कर सचमुच 'जायंट किलर' साबित होंगे? इसका फैसला नंदीग्राम की जनता जल्द ही करने वाली है.

वो जमीन जिसने बंगाल की सत्ता पलट दी

नंदीग्राम का इतिहास बड़े संघर्षों और आंदोलनों से भरा रहा है. साल 2007 में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ शुरू हुए एक आंदोलन ने ऐसी चिंगारी सुलगाई कि ममता बनर्जी देखते ही देखते सत्ता के शिखर तक पहुंच गईं. इसी का नतीजा था कि साल 2011 में बंगाल के 34 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत हो गया. साल 2021 में यह इलाका एक बार फिर पूरे देश की सुर्खियों में तब आया, जब ममता बनर्जी ने अपने पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी को उनके ही घर में चुनौती देने के लिए अपनी पुरानी भवानीपुर सीट छोड़ दी और नंदीग्राम से मैदान में उतर गईं. उस ऐतिहासिक और बेहद रोमांचक मुकाबले में ममता बनर्जी को महज 1,956 वोटों के बहुत ही मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा था. इसके बाद साल 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने यहां अपनी पकड़ और भी मजबूत कर ली और टीएमसी को करीब 8,200 वोटों से पीछे छोड़ दिया.

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चुनावी इतिहास की बात करें तो नंदीग्राम में अब तक 15 बार विधान सभा चुनाव हो चुके हैं. शुरुआती दशकों में यहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जबरदस्त दबदबा रहा और उसने नौ बार यहां जीत दर्ज की. कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने भी यहां से दो-दो बार जीत का स्वाद चखा है, जबकि भाजपा के लिए साल 2021 की जीत इस क्षेत्र में पहली चुनावी सफलता थी.

नंदीग्राम की राजनीति को समझने के लिए यहां के भूगोल और लोगों के मिजाज को समझना बेहद जरूरी है. यहां करीब 2.58 लाख रजिस्टर्ड वोटर हैं, जिनमें लगभग 23.60 प्रतिशत मुस्लिम और 16.46 प्रतिशत अनुसूचित जाति के मतदाता एक निर्णायक भूमिका निभाते हैं. यह पूरा इलाका 96 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण है. यहां की उपजाऊ मिट्टी और यहां से बहने वाली हल्दी और भागीरथी नदियां खेती-किसानी को काफी समृद्ध बनाती हैं. यहां के लोगों की कमाई और जिंदगी मुख्य रूप से चावल की खेती, सब्जियों के उत्पादन और मछली पालन पर टिकी है.

राजनीतिक रूप से यहां के लोग कितने जागरूक हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां मतदान का प्रतिशत हमेशा ऊंचा रहता है, जो साल 2021 में रिकॉर्ड 88.51 प्रतिशत तक पहुंच गया था. रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण और बड़े औद्योगिक शहर हल्दिया के ठीक सामने होने के बावजूद, नंदीग्राम आज भी बड़े उद्योगों के लिए तरस रहा है. यहां की जनता अपनी रोजी-रोटी के लिए आज भी काफी हद तक खेती और छोटे व्यापार पर ही निर्भर है. अब देखना यह होगा कि साल 2026 की इस बड़ी जंग में नंदीग्राम का 'बेटा' कहलाने वाले पवित्र कर कोई बड़ा उलटफेर कर पाते हैं या फिर शुभेंदु अधिकारी अपना किला बचाने में कामयाब होते हैं.

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