हाथ में डिग्री, जेब में आ रहे 10 हजार... क्यों नोएडा के ग्रेजुएट्स 'मजदूरी' और प्रोटेस्ट करने को मजबूर हैं?

Degree vs Skills Gap: नोएडा की सड़कों पर उतरा कर्मचारियों का गुस्सा स‍िर्फ सैलरी की मांग नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था की नाकामी का भी सबूत है. जान‍िए क्यों 90% अंक लाने वाले छात्र भी 10 हजार की नौकरी के लिए तरस रहे हैं.

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नोएडा में प्रदर्शन (Photo: PTI) नोएडा में प्रदर्शन (Photo: PTI)

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली/नोएडा,
  • 13 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:49 PM IST

नोएडा में पिछले कुछ दिनों से जो मंजर दिख रहा है, वह चौंकाने वाला है. '15 हजार देते हैं, 25 हजार बताते हैं...' एक महिला कर्मचारी का यह बयान उस दर्द को बयां करता है जो लाखों युवा रोज झेलते हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि बीए (BA), बीकॉम (BCom) और यहां तक कि बीटेककी डिग्रियां होने के बावजूद ये युवा इतनी कम सैलरी पर 'मजदूरी' जैसी स्थिति में काम करने को मजबूर क्यों हैं? फिर इतना काम करने के बावजूद उन्हें एक सामान्य कर्मचारी के हक नहीं मिल रहे और वो प्रोटेस्ट करने को मजबूर हो गए हैं. 

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डिग्री तो है, पर 'काबिलियत'?

ताजा 'इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2026' के आंकड़े बताते हैं कि भारत में ग्रेजुएट्स की 'एम्प्लॉयबिलिटी' (रोजगार पाने की क्षमता) में सुधार तो हुआ है, लेकिन अभी भी एक बड़ी खाई मौजूद है:

बीए और बीकॉम की बात करें तो आर्ट्स ग्रेजुएट्स की एम्प्लॉयबिलिटी महज 55.5% के आसपास है. यानी करीब आधे छात्र डिग्री होने के बाद भी किसी कंपनी की जरूरत के हिसाब से तैयार नहीं हैं. वहीं भले ही आईटी और कंप्यूटर साइंस में यह आंकड़ा 80% तक है, लेकिन अन्य कोर इंजीनियरिंग ब्रांच के छात्र अभी भी संघर्ष कर रहे हैं.

वहीं 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026' रिपोर्ट के मुताबिक, 25 साल तक के 40% ग्रेजुएट्स बेरोजगार हैं या अपनी योग्यता से बहुत कम स्तर का काम कर रहे हैं.

यह भी पढ़ें:  '15 हजार देते हैं, 25 बताते हैं और 250 बढ़ाते हैं...', कर्मचारियों ने खोली नोएडा में कंपनियों की पोल

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क्यों कंपनियां करती हैं 'शोषण'?

जब एक युवा के पास स‍िर्फ 'कागजी डिग्री' होती है और प्रैक्टिकल ज्ञान शून्य होता है तो कंपनियां उसे 'कच्चा माल' मानती हैं. कंपनियां कहती हैं कि हमें इन छात्रों को नए सिरे से सिखाना पड़ता है, इसलिए हम ज्यादा सैलरी नहीं दे सकते.

सस्ती मजदूरी का चक्र: स्किल की कमी के कारण छात्र मोलभाव (Bargaining) करने की स्थिति में नहीं होते. वे 10-12 हजार की नौकरी स‍िर्फ इसलिए स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि उनके पास कोई 'स्पेशलाइज्ड स्किल' नहीं है.

रट्टा मार पढ़ाई या स्किल-बेस्ड लर्निंग

नोएडा का यह आंदोलन सीधे तौर पर हमारे 'एजुकेशन मॉडल' पर सवाल उठाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि अब 'मार्क्स' की रेस छोड़कर 'मार्केट' की जरूरत को समझना होगा. हमें स‍िर्फ थ्योरी नहीं, बल्कि इंटर्नशिप और वोकेशनल ट्रेनिंग को स्कूल-कॉलेज स्तर से ही अनिवार्य करना होगा.

नई शिक्षा नीति (NEP) में सरकार अब 'स्किल इंडिया' और एनईपी के जरिए छात्रों को 12वीं के साथ ही प्रोफेशनल स्किल्स सिखाने पर जोर दे रही है, ताकि वे 'जॉब सीकर' के बजाय 'जॉब रेडी' बनें.

क्या है समाधान?
अगर आप छात्र हैं, तो स‍िर्फ डिग्री के भरोसे न रहें. आज के दौर में एआई (AI), डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल मार्केटिंग या एडवांस्ड कोडिंग जैसे शॉर्ट-टर्म कोर्सेज आपकी मार्केट वैल्यू को 10 हजार से बढ़ाकर 50 हजार तक ले जा सकते हैं. लेकिन नोएडा में जहां फैक्ट्री कर्मचारी इस तरह का प्रदर्शन कर रहे हैं, वहां ये साफ होता है कि कंपन‍ियां उनको एक सामान्य कर्मचारी को द‍िए जाने वाले हक नहीं दे रही हैं. 

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