साल 1987 की बात है, जब जयपुर में ये घटना घटी थी. यहां फरवरी 1987 में एक 18 साल की रूप कंवर की शादी सीकर जिले के दिवराला में माल सिंह शेखावत से हुई थी. शादी के 7 महीने ही हुए थे, अभी पति पत्नी एक दूसरे को समझ ही रहे थे कि अचानक माल सिंह की बीमारी से मौत हो गई. भीतर तक टूट चुकी रूप कंवर बदहवास थी लेकिन बाहर बात फैल गई कि रूप कंवर पति की चिता पर सती होंगी. लेकिन, सभ्य समाज का रूप देखिए, उन्होंने उसे समझाने या पूरे मामले में कानूनी प्रक्रिया अपनाने के बजाय उसके चिता में कूदने की तैयारियां शुरू कर दीं.
इस पूरे मामले को देवराला के सती रूप कंवर कांड के नाम से भी जाना जाता है. राजस्थान के सीकर जिले के पास स्थित ये गांव पिंक सिटी और राजस्थान की राजधानी जयपुर से करीब तीन घंटे की दूरी पर है. यहीं पर रूप कंवर का ससुर सुमेर सिंह टीचर था, वहीं उसका पति माल सिंह बीएससी की पढ़ाई कर रहा था. रूप के पिता जयपुर के ट्रांसपोर्ट नगर में ट्रक ड्राइवर थे. बताते हैं कि जिस वक्त ये घटना हुई, रूप कंवर अपने मायके में थी. अभी तीन ही दिन हुए कि पति की बीमारी की मनहूस खबर आ गई. अगले दिन रूप कंवर अपने पिता और भाई के साथ उसे लेकर सीकर के अस्पताल पहुंची. वहां से पिता और भाई तो चले गए लेकिन दो दिन बाद सुबह 8 बजे माल सिंह की मौत हो गई. परिजन शव को देवराला लेकर पहुंचे. यहीं वो अफवाह फैल गई कि रूप कंवर सती होना चाहती है, और साथ में उसके सत का महिमामंडन होने लगा.
फिर 4 सितंबर को वो दिन भी आया जब पुरानी प्रथा के गुणगान हुए. इसी बीच लोगों ने माल सिंह की चिता के साथ एक लड़की को झोंकने की पूरी तैयारी कर ली. उस लड़की को हाथों में नारियल देकर पूरे सोलह शृंगार में सजाकर घुमाया गया और फिर उसे चिता में झोंका गया. यकीन मानिये उस दिन एक जातिगत दंभ के चलते तमाम संविधान और मानवता भी उसके साथ आग में झोंके गए.
बता दें कि इंडिया टुडे ने इस कांड के बाद 1987 में ही तफ्तीश की थी. इस पूरे मामले में रूप कंवर को जलाने के वक्त वहां मौजूद रहे तेज सिंह शेखावत ने बताया कि 15 मिनट तक रूप कंवर ने पति की चिता की परिक्रमा लगाई. हमने उससे कहा कि जल्दी करो नहीं तो पुलिस आ जाएगी और गड़बड़ हो जाएगी. उसने कहा फिक्र न करो. फिर वो चिता पर चढ़ गई और पति का सिर गोद में रखा. फिर माल सिंह के छोटे भाई ने माचिस जलाई लेकिन आग नहीं जली. उसने कहा कि आग तो अपने आप जली थी. लोगों ने घरों से कनस्तर भर भरके चिता में घी झोंका. वो जलती हुई चिता से नीचे गिरी लेकिन वापस पति का पैर पकड़कर चिता में लौट गई. उसके परिजनों को भी बेटी के जलने के बाद मामले का पता चला. बाद में चिता के स्थान पर उसके नाम पर मंदिर भी बना जिसमें हजारों लोग यहां पहुंचे थे.
खैर, इस पूरे मामले में IPC की धारा 306 के तहत पूरे गांव पर केस रजिस्टर हुआ था. मुख्य आरोपी ससुर सुमेर थे जो टीचर होकर ये जुर्म देखते रहे. पुलिस पहुंची लेकिन कोई गवाह नहीं था. इस मामले में 39 लोगों के खिलाफ मुकदमा हुआ. पहली गिरफ्तारी 9 सितंबर को पुष्पेंद्र सिंह की हुई . लेकिन इस पूरे मामले में राज्य सरकार की सख्ती कहीं भी नहीं दिखी. यही नहीं राजस्थान में तथाकथित सती का महिमामंडन करने के लिए चुनरी महोत्सव हुआ जिस पर जयपुर में बड़ा आंदोलन हुआ. हाई कोर्ट प्रशासन की सख्ती के बावजूद इस महोत्सव में 50 हजार के करीब लोग पहुंचे थे. फिलहाल इस मामले में आठ आरोपियों को लेकर फैसला आना है, कोर्ट ने इसके लिए अगली तारीख तय कर दी है.