बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में संस्कृत टीचर के तौर पर डॉ फिरोज खान की नियुक्ति के खिलाफ कुछ छात्रों ने प्रदर्शन किया है. उनका तर्क है कि मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ा सकते. लेकिन, विरोध करने वालों को देश भर के संस्कृत के इन मुस्लिम विद्वानों से जरूर मिलना चाहिए. कैसे उनकी बदौलत संस्कृत को एक नई पहचान मिली है. इनमें से किसी ने कुरान की आयतों का गीता से मिलान किया है तो कोई पंडित तो कोई शास्त्री के रूप में पहचान बना चुका है. देश की गंगाजमुनी संस्कृति के ये पहरुये बताते हैं कि भाषाएं किसी मजहब की सीमा में बंधी नहीं हैं.
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85 साल की उम्र के गुलाम दस्तगीर बिराजदार विश्व संस्कृत प्रतिष्ठान के पूर्व महासचिव है. वर्तमान में वो महाराष्ट्र के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली संस्कृत की किताबें तैयार करते हैं. उनकी भाषा में पकड़ इस तरह की है कि कई बार हिंदुओं ने उन्हें शादी, पूजा या अन्य संस्कारों में कर्मकांड के लिए न्यौता तक दिया.
फोटो: गुलाम दस्तगीर बिराजदार
पंडित बीराजदार ने Times of India को बताया कि मैंने अपने पूरे जीवन में संस्कृत को बढ़ावा दिया है और इसे विभिन्न स्थानों में पढ़ाया है. इसमें बीएचयू भी शामिल है जहां मैंने कई व्याख्यान दिए हैं. मुझे किसी ने कभी नहीं बताया कि मुसलमानों को यह नहीं सिखाना चाहिए, इसके विपरीत, संस्कृत के बड़े विद्वान मेरी प्रशंसा करते हैं और प्राचीन भाषा के प्रति मेरे प्यार की सराहना करते हैं.
फाइल फोटो: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
बीराजदार एक ऐसे जाने माने प्रकांड पंडित हैं जिन्हें पूर्व राष्ट्रपति डॉ केआर नारायणन से प्रशस्ति पत्र भी मिला. बिराजदार भारत के उन कई मुसलमानों में से हैं, जिन्होंने एक खास ग्रंथि को धता बताकरर संस्कृत का अध्ययन और अध्यापन किया. उनके लिए वैदिक सिद्धांत एकम् ब्रह्म: द्वितिया: नास्ति (अर्थात ईश्वर एक है और उसके सिवाय कोई दूसरा नहीं है) वैसा ही सच है जैसा कि कुरान की उक्ति 'ला इल्लाह इल्लल्लाह’ है. इसका अर्थ भी (कोई ईश्वर नहीं है लेकिन ईश्वर है) है.
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ऐसे ही एक संस्कृत विद्वान डॉ. मेराज अहमद खान हैं. उन्होंने बीए और एमए दोनों में पटना विश्वविद्यालय में कॉलेज और विश्वविद्यालय में संस्कृत से पढ़ाई की थी. एक पुलिस इंस्पेक्टर का ये बेटा कश्मीर विश्वविद्यालय में संस्कृत का एसोसिएट प्रोफेसर है.
फोटो: प्रो मेराज अहमद खान
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खान ने TOI से कहा कि हम विश्वविद्यालयों में जो पढ़ाते हैं, वह आधुनिक संस्कृत है जिसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. उन्हें संस्कृत का विद्वान होने के कारण कभी भेदभाव भी महसूस नहीं हुआ. वो कहते हैं कि अगर वो भेदभाव करते, तो मुझे एमए में स्वर्ण पदक नहीं देते.
फोटो: प्रो मेराज अहमद खान
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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में संस्कृत के पूर्व प्रमुख डॉ खालिद बिन यूसुफ संस्कृत विद्वान के तौर विख्यात हैं. वो कहते हैं कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को समझने के मूल स्रोत संस्कृत में हैं, इसलिए कई मुस्लिम इसे सीखते हैं. हमारे विभाग में 50% से अधिक छात्र मुस्लिम हैं. यहां शिक्षकों की नियुक्ति में कोई भेदभाव नहीं किया गया है. मेरे मुस्लिम छात्र विभिन्न विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं.
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एएमयू संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो मोहम्मद शरीफ ने कहा कि संस्कृत को यूपीएससी परीक्षाओं के लिए स्कोरिंग विषय माना जाता है. इसलिए भी इसे लोग अपनाते हैं. उन्हें पता है कि अगर यूपीएससी नहीं निकाल पाए तो टीचर बनने का मौका तो रहता ही है. किसी एक विशेष वर्ग को कोई भाषा सीखने का अधिकार नहीं है.
फोटो: प्रो मोहम्मद शरीफ
2016 में दिल्ली में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान से एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में सेवानिवृत्त हुए डॉ मोहम्मद हनीफ खान शास्त्री ने संस्कृत भाषा में बड़ा मुकाम हासिल किया. वो कहते हैं कि कई मुसलमान इसलिए भी संस्कृत सीखते हैं ताकि वो कुरान और हिंदू धर्मग्रंथों के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से इस्लाम और हिंदू धर्म को करीब ला सकें. वो इनके ज्ञान का उपयोग करना चाहते हैं. वो बताते हैं कि पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा उनकी संस्कृत से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने उन्हें शास्त्री की उपाधि दी थी.
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शास्त्री का कहना है कि वो सनातन धर्म की पुस्तकों वेद, उपनिषद, भगवद गीता और कुरान और हदीस (पैगंबर मुहम्मद की सीख) के बीच समानताएं खोजना चाहते थे. यदि मैंने संस्कृत का अध्ययन नहीं किया होता, तो मैं वसुधैव कुटुम्बकम (अर्थात पूरी दुनिया एक परिवार है) का सही अर्थ नहीं जान पाता. पैगंबर ने ये भी कहा कि रंग और नस्ल के आधार पर लोगों के बीच कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए. बता दें कि उनकी पीएचडी कुरान की सूरह फातेहा और ऋग्वेद के गायत्री मंत्र के तुलनात्मक अध्ययन पर है.
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