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भारत का मुंबई, PAK का कराची, आजादी से पहले ऐसे दिखते थे ये शहर

मानसी मिश्रा
  • 14 अगस्त 2019,
  • अपडेटेड 9:19 AM IST
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सालों साल की गुलामी के बाद देश को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली. ये आजादी किसी का दिया हुआ तोहफा नहीं थी, बल्क‍ि ये हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानी से हमें मिली. पूरे देश से स्वतंत्रता आंदोलन की उठी लपटों ने गोरों को यहां से भागने पर मजबूर कर दिया. आइए आज इन शहरों की एक झांकी यहां देखते हैं और महसूस करते हैं उस दौर को जब हम आप इस जंग में शामिल नहीं थे. यहां देखें आजादी से पहले कैसे दिखते थे हमारे राज्य और शहर. इनमें बिहार और दिल्ली से लेकर पाकिस्तान में गए पेशावर, लाहौर, कलकत्ता और कराची आदि शहर शामिल हैं.

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तात्या टोपे और बाल गंगाधर तिलक की ये धरती आजादी के आंदोलन की गवाह रही है. कैसे महात्मा गांधी के साथ करोड़ों देशवासी यहां हुए कई आंदोलनों में शरीक हुए हैं. देखें 1947 से पहले की बंबई किस तरह अंग्रेजों के लिए बॉम्बे और बाद में हिंदुस्तानियों के लिए मुंबई बन गई.

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बिहार ने इतिहास के पन्नों पर हमेशा नए अध्याय लिखे हैं. आधुनिक बिहार की राजनीति से लेकर यहां की पाटलिपुत्र की धरती रही है. आजादी की लड़ाई से लेकर अब तक हर कदम में बिहार का खास योगदान रहा है. अगस्त क्रांति के मतवालों में बड़ी संख्या में बिहार के क्रांतिकारियों के नाम आते रहे हैं. सन 1947 से पहले अंग्रेज कुछ यूं गंगा के तट का इस्तेमाल करते थे.

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आर्टिकल 370 को लेकर चर्चा में बने श्रीनगर की खूबसूरती उस दौर में कुछ इसी तरह कायम थी. 1947 से पहले यहां राजा हरि सिंह का शासन था. बताते हैं कि राजा हरि सिंह ने अंग्रेजों से कहा था कि वो अपनी रियासत को हिंदू-मुस्लिम की सियासत से दूर रखने की गुजारिश कर रहे हैं.

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ये तस्वीर 1947 से पहले के पेशावर शहर की है. ये शहर जहां वीर सपूताें के सैकड़ों किस्से आज भी दफ्न है.  वर्तमान में ये शहर पाकिस्तान में है. यह ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रान्त की राजधानी है. पेशावर को पुराने पुस्तकों में "पुरुषपुर" के नाम से उल्लेख मिलता है.

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पाकिस्तान के पंजाब राज्य की राजधानी लाहौर को पाकिस्तान का दिल भी कहा जाता है. भगत सिंह जैसे वीर जवानों की धरती रही लाहौर कभी पंजाब जो पांचों नदियों से मिलकर बना था, उसी का हिस्सा रहा है. ऐसा माना जाता है कि लाहौर की स्थापना भगवान श्री राम के पुत्र लव ने की थी. देखें इसकी एक पुरानी झलक.

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कोलकाता भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के हर चरण में केन्द्रीय भूमिका में रहा है. इस शहर ने अरविंद घोष, इंदिरा देवी चौधरानी, विपिनचंद्र पाल जैसे क्रांतिकारी इस देश को दिए. आरंभिक राष्ट्रवादियों के प्रेरणा के केन्द्र बिन्दु बने रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानंद, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पहले अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी और स्वराज की वकालत करने वाले पहले व्यक्ति सुरेन्द्रनाथ बनर्जी भी कोलकाता से ही थे. यहां के साहित्यकार बंकिमचंद्र चटर्जी का आनंदमठ में लिखा गीत वन्दे मातरम आज भी भारत का राष्ट्र गीत है. यहां के सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन कर अंग्रेजो को पानी पिला दिया था. रवींद्रनाथ टैगोर की धरती ने न जाने कितने वीर सपूत आजादी की लड़ाई में कुर्बान किए हैं.

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आज की आधुनिक दिल्ली बनने से पहले दिल्ली सात बार उजड़ी और विभिन्न स्थानों पर बसी, जिनके तमाम निशान आज भी दिल्ली में देखे जा सकते हैं. 1857 के सैनिक विद्रोह के बाद दिल्ली पर ब्रिटिश शासन ने कब्जा जमा लिया था. पहले भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम को पूरी तरह दबाने के बाद अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर को रंगून भेज दिया और भारत को गुलाम बना दिया. इसके बाद दिल्ली तमाम वीरों के किस्सों की गवाह रही.

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पाकिस्‍तान के सिंध प्रांत की राजधानी कराची जिन्‍ना की जन्‍मस्‍थली के लिए प्रसिद्ध है. यहां के लोग इसीलिए इसे शहर-ए-कायद कहकर बुलाते हैं. रोशनी के इस शहर में पाकिस्तान का सबसे बड़ा बंदरगाह भी है जिसे कभी अंग्रेज अपने व्यापार के लिए इस्तेमाल करते थे. देखिए 1947 में जब ये भारत का हिस्सा हुआ करता था.

Image Credit: Arif Hasan

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