भूख की मजबूरी, स्कूल बैग की जगह कंधे पर प्लास्टिक का बोरा... इस देश में 32 लाख बच्चों का स्कूल छूटा

आज यमन के 2,400 से अधिक स्कूल मलबे में तब्दील हो चुके हैं और शिक्षकों को बरसों से वेतन नहीं मिला है. गरीबी का आलम यह है कि 80% आबादी मानवीय सहायता पर निर्भर है, जिससे बच्चों के लिए स्कूल की जगह 'पेट की भूख' पहली प्राथमिकता बन गई है.

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प्रतीकात्मक फोटो (Unsplash) प्रतीकात्मक फोटो (Unsplash)

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 21 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:16 PM IST

यमन की राजधानी साना की सड़कों पर सुबह 7 बजे जब दुनिया जाग रही होती है, 14 साल का कासिम एक सफेद बोरा लेकर अपने 'संघर्ष' की शुरुआत करता है. कासिम कोई स्कूल बैग नहीं, बल्कि प्लास्टिक की खाली बोतलें इकट्ठा करने वाला बोरा ढो रहा है. अल जजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कासिम जैसे लाखों बच्चों के लिए स्कूल जाना अब एक ऐसा सपना है जिसे उनका परिवार वहन नहीं कर सकता.

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कासिम दिन भर बोतलें चुनता है ताकि उसे 1,500 यमनी रियाल (लगभग 3 डॉलर) मिल सकें. यह रकम उसके छह सदस्यों के परिवार के दोपहर के भोजन का सहारा बनती है. दोपहर बाद यही जिम्मेदारी उसका 12 साल का भाई आसिम संभालता है, ताकि रात के खाने का इंतजाम हो सके. कासिम का कहना है, 'क्लासरूम में बैठने से मेरा पेट नहीं भरेगा.'

आखिर क्यों बर्बाद हुआ यमन का बचपन?
यमन में यह संकट 2014 में शुरू हुआ, जब ईरान समर्थित हुती विद्रोहियों और सऊदी समर्थित सरकारी सेना के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया. दशक भर से जारी इस जंग ने यमन की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है. आज देश के 2,400 से अधिक स्कूल मलबे में तब्दील हो चुके हैं और शिक्षकों को बरसों से वेतन नहीं मिला है. गरीबी का आलम यह है कि 80% आबादी मानवीय सहायता पर निर्भर है, जिससे बच्चों के लिए स्कूल की जगह 'पेट की भूख' पहली प्राथमिकता बन गई है.

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यूनिसेफ (UNICEF) के अनुमान के अनुसार, यमन में स्कूल जाने की उम्र के लगभग 32 लाख बच्चे वर्तमान में स्कूल से बाहर हैं. वहीं, 15 लाख विस्थापित बच्चे ऐसे हैं जिनका स्कूल हमेशा के लिए छूटने की कगार पर है. अप्रैल 2022 के संघर्ष विराम के बावजूद, आर्थिक बदहाली ने बच्चों को कलम छोड़कर मजदूरी अपनाने पर मजबूर कर दिया है.

युद्ध ने माता-पिता की सोच भी बदल दी है. कासिम के पिता अब्दू, जो खुद एक दिहाड़ी मजदूर हैं. उनका कहना है कि भूखे बच्चे को देखना, स्कूल छोड़ चुके बच्चे को देखने से ज्यादा दर्दनाक है. वे देखते हैं कि यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट्स भी निर्माण स्थलों पर मजदूरी की तलाश कर रहे हैं, ऐसे में उन्हें लगता है कि शिक्षा पर समय और पैसा बर्बाद करने से बेहतर है कि बच्चे अभी से काम सीखें.

2400 स्कूल तबाह
'सेव द चिल्ड्रन' के अनुसार, यमन में 2,400 से अधिक स्कूल या तो पूरी तरह तबाह हो चुके हैं या सेना द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं. बचे हुए स्कूलों में शिक्षकों को वर्षों से वेतन नहीं मिला है. यमन की यह तस्वीर सिर्फ एक देश की बर्बादी नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी के भविष्य के 'अंधेरे' की कहानी है. 

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