UGC का नया नियम क्या है? जिसे लेकर मचा बवाल, आयोग को इस बदलाव की क्यों पड़ी जरूरत

यूजीसी के नए नियम का विरोध करते हुए बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा दे दिया. इसके खिलाफ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में भी पीआईएल दाखिल किया है. याचिका में इसके कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने की गुहार लगाई है. सोशल मीडिया पर भी इसका भारी विरोध हो रहा है. ऐसे में जानते हैं ये नियम क्या है और क्यों यूजीसी को इस नियम की जरूरत पड़ी?

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यूजीसी के नए नियम के इस प्रावधान को लेकर पीआईएल दर्ज हुआ (Photo - ITG) यूजीसी के नए नियम के इस प्रावधान को लेकर पीआईएल दर्ज हुआ (Photo - ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:40 PM IST

यूजीसी के नए नियम को लेकर बवाल मचा हुआ है. पहले सोशल मीडिया पर इसके विरोध में #UGCRolleback ट्रेंड होना शुरू हुआ. फिर इसके खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और इसे भेदभाव बढ़ाने वाला नियम बताया. अब बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने यूजीसी के इस बदलाव के विरोध में इस्तीफा दे दिया. ऐसे में जानते हैं कि आखिर यूजीसी जो नया नियम लेकर आया है वो क्या है और उसे बनाने की जरूरत क्यों पड़ी.

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यूजीसी ने 13 जनवरी को एक नया नियम लागू किया है. इसका नाम है - 'Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations 2026'. इसको लेकर बवाल मचा हुआ है. सामान्य वर्ग यानी सवर्ण समाज इससे खासे खफा हैं. बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने  तो यहां तक कहा कि इस नए कानून के जरिए यूजीसी ने कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले सामान्य वर्ग के छात्रों को स्वघोषित अपराधी बना दिया है. 

क्या है UGC का नया नियम
यूजीसी का कहना है कि नए नियम की जरूरत एससी, एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकना और उस पर निगरानी रखना है.   नए Equity Rule के तहत सभी यूनिवर्सिटी, कॉलेज और उच्च शिक्षण संस्थानों को परिसर में  24x7 हेल्पलाइन,  Equal Opportunity Centre, Equity Squads और Equity Committee का गठन करना होगा. अगर कोई भी संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है तो यूजीसी उनकी मान्यता रद्द करने या फंड रोकने जैसी सख्त कार्रवाई कर सकता है.

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नए नियम के किस सेक्शन से हो रही समस्या 
यूजीसी के इस नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की गई है. इस पीआईएल में इस नियम को भेदभावपूर्ण और मनमाना बताया गया है. याचिकाकर्ता ने बताया है कि यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी को जिस नए नियम को अधिसूचित किया है उसका 3(C) भेदभाव बढ़ाने वाला है. याचिकाकर्ता ने इस नियम को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है. 

जनहित याचिका में कहा गया है कि यूजीसी के Equity Rule का सेक्शन 3(C) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत आजादी जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. यह नियम यूजीसी अधिनियम 1956 के विरुद्ध है और उच्च शिक्षा में समान अवसर देने के अवसर को खत्म करता है. इसी तरह के साथ याचिका में इन प्रावधानों को हटाने की मांग सुप्रीम कोर्ट से की गई है. 

यह भी पढ़ें: UGC के नए नियम को दी गई चुनौती, सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर

यूजीसी के अनुसार इस नए नियम की जरूरत उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़ी और अनुसूचित जाति और जनजातियों के खिलाफ बढ़ते भेदभाव के मामले को रोकने के लिए पड़ी. 2020 से 2025 के बीच जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में 100 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हो गई थी. इसके अलावा इस नियम को बनाने के पीछे रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों में की गई सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को भी वजह बताया गया. 

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नियम में क्या खामियां बता रहे छात्र
छात्रों का कहना है कि इसमें झूठी शिकायतों पर कार्रवाई का प्रावधान नहीं है. इस वजह से किसी पर भी बिना किसी सबूत के झूठे आरोप लगाए जा सकते हैं. इससे किसी भी छात्र को परेशानी होगी और उनका शिक्षण और करियर प्रभावित होगा. वहीं इक्विटी कमेटी में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को जरूरी नहीं बताया गया है. वहीं इक्विटी स्क्वाड को भी काफी अधिकार दे दिए गए हैं और 'भेदभाव' परिभाषा स्पष्ट नहीं की गई है.

यूनिवर्सिटी अनुदान आयोग का मानना है कि निगरानी व्यवस्था के बिना कैंपस में एक समान और सुरक्षित माहौल नहीं बन पाएगा. वहीं सामान्य वर्ग के छात्रों का आयोग से बिलकुल विपरीत दृष्टिकोण है. छात्रों का कहना है कि नया नियम एकतरफा हैं और इससे भेदभाव को और अधिक बढ़ावा मिलेगा. 

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