मराठी भाषा मंत्री उदय सामंत ने यह निर्णय भाषा विभाग के सचिव से विस्तृत चर्चा के बाद लिया. सरकार ने स्पष्ट किया है कि 1976 के पुराने नियमों की प्रासंगिकता की अब 2026 के वर्तमान संदर्भ में गहन समीक्षा की जाएगी, जिसके बाद ही कोई अगला कदम उठाया जाएगा.
यह विवाद तब शुरू हुआ जब प्रशासन ने 28 जून 2026 को मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे शहरों में इस परीक्षा के आयोजन की घोषणा की. 'महाराष्ट्र नागरिक सेवा नियम, 1976' के तहत उन कर्मचारियों के लिए हिंदी पास करना अनिवार्य था, जिन्होंने 10वीं तक यह विषय नहीं पढ़ा था. इस नियम के उल्लंघन पर वेतन वृद्धि और पदोन्नति (Promotion) रोकने जैसे कड़े प्रावधान थे, जिसे लेकर कर्मचारियों में भारी असंतोष था.
विपक्ष और मनसे (MNS) जैसे संगठनों ने इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए इसे मराठी भाषी राज्य पर हिंदी थोपने का प्रयास बताया. आलोचकों का तर्क था कि प्राथमिकता गैर-मराठी भाषियों को मराठी सिखाने की होनी चाहिए. व्यापक राजनीतिक विरोध और संभावित अशांति की चेतावनी को देखते हुए, मंत्री उदय सामंत ने तत्काल प्रभाव से परीक्षा पर रोक लगा दी है.
हिंदी भाषा की परीक्षा की कोई ज़रूरत है या नहीं, मैं देखूंगा: उदय सामंत
महाराष्ट्र के मराठी भाषा मंत्री उदय सामंत ने कहा कि मुझे अभी मीडिया के ज़रिए सरकारी कर्मचारियों के लिए होने वाली हिंदी भाषा की परीक्षा के बारे में पता चला है. मैंने मराठी भाषा विभाग के प्रधान सचिव किरण कुलकर्णी से इस मुद्दे पर चर्चा करने के बाद फ़िलहाल इस परीक्षा को स्थगित करने का फ़ैसला लिया है.
मैं साल 1976 के नियमों की निजी तौर पर समीक्षा करूंगा और यह देखूंगा कि साल 2026 के मौजूदा संदर्भ में हिंदी भाषा की परीक्षा की कोई ज़रूरत है या नहीं. अगर यह ज़रूरी लगा तो इसे आगे बढ़ाया जाएगा, नहीं तो हम इस व्यवस्था को स्थायी रूप से बंद कर देंगे.
ऋत्विक भालेकर