ईरान की वो लड़की... जिसने मिसाइल नहीं, 'मैथ्स' से जीती दुनिया! पीछे छोड़ीं हिजाब की बंदिशें

मरियम मिर्ज़ाखानी, जो ईरान की पहली महिला थीं जिन्होंने गणित का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार फील्ड्स मेडल जीता, उनकी कहानी प्रेरणादायक है. बचपन में मैथ्स से नफरत करने वाली मरियम ने गणित को एक कहानी की तरह समझा और अपने जज़्बे से दुनिया में नाम कमाया. कैंसर से जंग लड़ते हुए भी उन्होंने अपनी खोज जारी रखी.

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Maryam Mirzakhani (Photo AFP) Maryam Mirzakhani (Photo AFP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 13 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 9:02 AM IST

ईरान का नाम सुनते ही आज के दौर में मिसाइलें, जंग और पाबंदियों की तस्वीरें जेहन में उभरती हैं. लेकिन इसी ईरान की मिट्टी से एक ऐसी लड़की निकली थी, जिसने दुनिया को बताया कि अंकों की कोई सरहद नहीं होती. हम बात कर रहे हैं मरियम मिर्ज़ाखानी की. मरियम ने गणित की दुनिया में वो मुकाम हासिल किया जो आज तक कोई भारतीय महिला भी नहीं कर पाई.

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जब मरियम ने कहा- 'मुझे मैथ्स पसंद नहीं'

हैरानी की बात ये है कि जिस मरियम ने गणित का 'नोबेल' जीता, उन्हें बचपन में मैथ्स से नफरत थी. तेहरान की गलियों में पली-बढ़ी मरियम एक लेखिका (Writer) बनना चाहती थीं. वो घंटों कहानियां पढ़ती थीं. लेकिन स्कूल में एक टीचर ने जब उन्हें गणित की पहेली सुलझाना सिखाया, तो मरियम को समझ आया कि गणित भी तो एक कहानी ही है, बस इसमें शब्द नहीं, अंक होते हैं.

दुनिया की पहली महिला, जिसने जीता 'नोबेल'

गणित की दुनिया का सबसे बड़ा इनाम होता है 'फील्ड्स मेडल' (Fields Medal). बता दें कि फील्ड्स मेडल' (Fields Medal) को ही दुनिया भर में 'गणित का नोबेल' कहा जाता है क्योंकि यह इस क्षेत्र का सबसे प्रतिष्ठित और सर्वोच्च सम्मान है. सालों-साल तक इस पर पुरुषों का कब्जा रहा. लेकिन साल 2014 में मरियम ने इस तिलिस्म को तोड़ दिया. वो दुनिया की पहली महिला बनीं जिन्हें इस सम्मान से नवाजा गया. ईरान जैसे देश से निकलकर स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर बनने तक का उनका सफर आसान नहीं था, लेकिन उनकी कलम कभी नहीं रुकी.

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ब्लैकबोर्ड पर बिखरा रहता था उनका जादू

मरियम की काम करने की शैली बड़ी अजीब और प्यारी थी. वो फर्श पर बड़े-बड़े सफेद कागज बिछा देती थीं और घंटों उन पर चित्र (Diagrams) बनाती रहती थीं. उनकी छोटी बेटी अक्सर उन्हें देखकर कहती थी, 'मम्मी फिर से पेंटिंग कर रही हैं.' असल में वो पेंटिंग नहीं, बल्कि गणित की वो पेचीदा गुत्थियां थीं जिन्हें सुलझाने में दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिक फेल हो गए थे.

Maryam Mirzakhani (Photo AFP)

कैंसर से जंग और वो अधूरा ख्वाब

मरियम की जिंदगी किसी फिल्म की तरह थी, जिसका अंत बेहद भावुक रहा. जिस वक्त वो दुनिया को गणित का नया फलसफा दे रही थीं, उन्हें ब्रेस्ट कैंसर ने जकड़ लिया. साल 2017 में सिर्फ 40 साल की उम्र में मरियम इस दुनिया को अलविदा कह गईं. उनके जाने पर ईरान ने अपने कड़े नियम भी तोड़ दिए थे; वहां के अखबारों ने पहली बार बिना हिजाब वाली मरियम की फोटो फ्रंट पेज पर छापी थी. यह उस महान गणितज्ञ को पूरे देश की तरफ से दी गई सबसे बड़ी विदाई थी.

आज जब ईरान और इजरायल के बीच बारूद की गंध है, तब मरियम की कहानी याद दिलाती है कि ईरान की असल ताकत उसके हथियार नहीं, बल्कि वो 'दिमाग' हैं जो बंकरों में भी गणित सुलझाने का हौसला रखते हैं. हमारे देश के वो छात्र जो मैथ्स से डरते हैं, उन्हें मरियम की ये बात जरूर याद रखनी चाहिए कि गणित में असली मजा तब नहीं आता जब आप जवाब ढूंढ लेते हैं, बल्कि तब आता है जब आप रास्ता ढूंढ रहे होते हैं.

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