CBSE का बड़ा फैसला... अब 9वीं में 3 भाषाएं पढ़ना होगा जरूरी, 1 जुलाई से नए नियम लागू

CBSE ने सत्र 2026-27 के कक्षा 9वीं के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किया, जिसमें 2 भारतीय भाषाएं जरूरी हैं. तीसरी भाषा के लिए कोई बोर्ड परीक्षा नहीं होगी, आंतरिक मूल्यांकन होगा.

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10वीं में नहीं देना होगा तीसरी भाषा का बोर्ड पेपर.(Photo: Representational) 10वीं में नहीं देना होगा तीसरी भाषा का बोर्ड पेपर.(Photo: Representational)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 16 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:54 PM IST

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE ने कक्षा 9 और 10 के लिए भाषा नीति में बड़ा बदलाव किया है. अब 2026-27 सत्र से कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य होगा. यह नया नियम 1 जुलाई 2026 से देशभर के सभी CBSE स्कूलों में लागू किया जाएगा. हालांकि राहत की बात यह है कि तीसरी भाषा का कक्षा 10 बोर्ड परीक्षा में पेपर नहीं होगा.

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CBSE ने 15 मई 2026 को जारी सर्कुलर में कहा कि नई शिक्षा नीति यानी National Education Policy (NEP) के तहत बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह फैसला लिया गया है. बोर्ड का कहना है कि छात्रों को भारतीय भाषाओं से जोड़ना और भाषाई समझ विकसित करना इसका मुख्य उद्देश्य है.

अब 3 भाषाएं पढ़ना होगा जरूरी

नई व्यवस्था के तहत छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिन्हें R1, R2 और R3 नाम दिया गया है. इनमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय भाषाएं होना अनिवार्य रहेंगी.

अगर कोई छात्र विदेशी भाषा पढ़ना चाहता है, तो वह तभी तीसरी भाषा के रूप में विदेशी भाषा चुन सकेगा, जब बाकी दो भाषाएं भारतीय हों. विदेशी भाषा को अतिरिक्त चौथे विषय के रूप में भी लिया जा सकेगा.

यानी अब छात्रों के लिए हिंदी, संस्कृत, पंजाबी, मराठी, तमिल, तेलुगु, बंगाली जैसी भारतीय भाषाओं का अध्ययन अधिक जरूरी हो जाएगा.

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तीसरी भाषा का बोर्ड एग्जाम नहीं होगा

CBSE ने साफ कर दिया है कि कक्षा 10 में तीसरी भाषा यानी R3 का बोर्ड एग्जाम नहीं कराया जाएगा.

इस विषय का मूल्यांकन स्कूल स्तर पर ही होगा. स्कूल इंटरनल परीक्षा लेकर अंक देंगे और वही अंक CBSE प्रमाणपत्र में दिखाई देंगे.

बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी भी छात्र को सिर्फ तीसरी भाषा की वजह से कक्षा 10 बोर्ड परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जाएगा.

CBSE का कहना है कि इसका उद्देश्य बच्चों पर अतिरिक्त बोर्ड परीक्षा का दबाव डालना नहीं, बल्कि भाषा सीखने को बढ़ावा देना है.

जुलाई से लागू होगा नया नियम

हालांकि 2026-27 का शैक्षणिक सत्र अप्रैल से शुरू हो चुका है, लेकिन CBSE ने इसे 'ट्रांजिशन ईयर' माना है.

बोर्ड ने कहा है कि स्कूलों को नई व्यवस्था लागू करने के लिए समय और लचीलापन दिया जाएगा ताकि छात्रों को अचानक बदलाव का सामना न करना पड़े.

CBSE के अनुसार इस दौरान किसी भी छात्र को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा.

स्कूलों के सामने शिक्षक की चुनौती

नई भाषा नीति लागू होने के बाद कई स्कूलों में भाषा शिक्षकों की कमी की समस्या सामने आ सकती है. इसे देखते हुए CBSE ने स्कूलों को कई विकल्प दिए हैं.

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जरूरत पड़ने पर स्कूल:

  • ऑनलाइन और हाइब्रिड पढ़ाई का सहारा ले सकते हैं
  • दूसरे स्कूलों के साथ शिक्षक साझा कर सकते हैं
  • रिटायर्ड शिक्षकों की मदद ले सकते हैं
  • दूसरे विषय पढ़ाने वाले ऐसे शिक्षकों को भाषा पढ़ाने की जिम्मेदारी दे सकते हैं जिन्हें संबंधित भाषा का ज्ञान हो

स्कूलों को 30 जून 2026 तक OASIS पोर्टल पर अपनी भाषा संबंधी जानकारी अपडेट करनी होगी.

अभी कौन-सी किताबें पढ़ाई जाएंगी?

नई किताबें तैयार होने तक छात्रों को तीसरी भाषा के लिए कक्षा 6 की किताबों से पढ़ाया जाएगा.

CBSE के मुताबिक, कक्षा 6 और 9वीं के भाषा कौशल में लगभग 75 से 80 प्रतिशत समानता है, इसलिए शुरुआती चरण में यही व्यवस्था अपनाई जा रही है.

इसके साथ स्कूल स्थानीय साहित्य, कविताएं, कहानियां और अन्य सामग्री भी पढ़ा सकेंगे ताकि बच्चों की भाषा समझ बेहतर हो सके.

CBSE 15 जून तक विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करेगा.

स्पेशल चाइल्ड और विदेशी छात्रों को राहत

CBSE ने दिव्यांग बच्चों के लिए विशेष छूट का प्रावधान भी रखा है.

Rights of Persons with Disabilities Act (RPWD Act 2016) के तहत जरूरत पड़ने पर ऐसे छात्रों को दूसरी या तीसरी भाषा से छूट दी जा सकेगी.

इसके अलावा, विदेश से लौटने वाले छात्रों और भारत के बाहर स्थित CBSE स्कूलों के लिए भी विशेष लचीले नियम लागू किए जा सकते हैं.

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क्यों अहम माना जा रहा है यह फैसला?

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह हाल के वर्षों में स्कूल शिक्षा से जुड़ा सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है. नई नीति से भारतीय भाषाओं को बढ़ावा मिलेगा और छात्र अपनी मातृभाषा तथा क्षेत्रीय भाषाओं से अधिक जुड़ सकेंगे.

हालांकि, कई पैरेंट्स और स्कूलों के सामने अतिरिक्त भाषा, शिक्षक उपलब्धता और समय प्रबंधन जैसी चुनौतियां भी रहेंगी.

फिलहाल CBSE ने बोर्ड परीक्षा का दबाव हटाकर और स्कूलों को लचीलापन देकर इस बदलाव को आसान बनाने की कोशिश की है.

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