बच्चों को स‍िर्फ पढ़ाई नहीं 'बोर' भी होने दें! जान‍िए CBSE के नए पेरेंटिंग कैलेंडर से क्या सीखना चाहिए?

बोर्ड ने माता-पिता को बच्चों की काबिलियत को केवल मार्कशीट से न आंकने और उनकी खुशहाली पर ध्यान देने की सलाह दी है. साथ ही, बच्चों के लिए खाली समय और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया गया है. नशीली दवाओं के सेवन को लेकर भी जागरूकता बढ़ाने के लिए NCB के साथ सहयोग किया गया है.

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CBSE ने माता-पिता के लिए बनाया खास प्लान (Representational image from Pexels) CBSE ने माता-पिता के लिए बनाया खास प्लान (Representational image from Pexels)

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 08 मई 2026,
  • अपडेटेड 10:48 AM IST

अक्सर कहा जाता है कि बच्चों की पहली पाठशाला उनका घर होता है लेकिन आज के दौर में पेरेंटिंग किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है. इसी को देखते हुए CBSE (सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन) अब सिर्फ छात्रों के सिलेबस पर ही नहीं, बल्कि माता-पिता की काउंसिलिंग पर भी ध्यान दे रहा है. बोर्ड ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए एक नया 'पेरेंटिंग कैलेंडर' पेश किया है, जिसमें स्क्रीन एडिक्शन से लेकर प्यूबर्टी (किशोरावस्था) जैसे गंभीर मुद्दों पर बात की गई है.

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'टॉपर कल्चर' को कहें बाय-बाय
कैलेंडर की सबसे बड़ी बात है, अंकों की रेस से बाहर निकलना. बोर्ड ने साफ कहा है कि 3 से 7 साल के बच्चों के लिए सफलता का पैमाना यह नहीं है कि किसने पहले पढ़ना सीखा या किसके ज्यादा नंबर आए. असली सफलता यह है कि क्या आपका बच्चा खुशी-खुशी स्कूल जा रहा है और खुशी-खुशी घर लौट रहा है? बोर्ड ने माता-पिता को चेतावनी दी है कि वे बच्चे की काबिलियत को सिर्फ उसकी मार्कशीट से न तौलें.

स्क्रीन एडिक्शन और सोशल मीडिया का 'जाल'
आजकल छोटे बच्चों को शांत कराने के लिए फोन देना एक आम बात हो गई है, लेकिन CBSE ने इसे खतरनाक बताया है. बोर्ड का कहना है कि स्क्रीन बच्चों के आपसी संवाद और भावनाओं को खत्म कर रही है. वहीं टीनेजर्स के लिए सोशल मीडिया सिर्फ स्क्रीन-टाइम की समस्या नहीं, बल्कि उनकी 'पहचान' और 'जुड़ाव' का मुद्दा बन गया है. बोर्ड की सलाह है कि सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाने के बजाय बच्चों से खुलकर बात करें और उन्हें ऑनलाइन खतरों के प्रति सचेत करें.

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मेंटल हेल्थ: कहीं आप 'आखिरी' तो नहीं?
रिपोर्ट में एक चौंकाने वाली बात कही गई है कि अक्सर जब बच्चा मानसिक रूप से परेशान होता है, तो माता-पिता को सबसे अंत में पता चलता है. बोर्ड ने एंग्जायटी, नींद में बदलाव और स्कूल जाने से इनकार करने जैसे लक्षणों पर नजर रखने को कहा है. स्कूलों को भी निर्देश दिया गया है कि वे काउंसिलिंग को और आसान बनाएं.

ड्रग्स और प्यूबर्टी पर 'खामोशी' नहीं 
CBSE ने नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के साथ मिलकर नशीली दवाओं के सेवन को लेकर भी माता-पिता को जागरूक करने का फैसला किया है. इसके अलावा, किशोरावस्था (प्यूबर्टी) के दौरान होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलावों पर भी बोर्ड ने चुप्पी तोड़ी है. बोर्ड का कहना है कि अगर घर पर इन मुद्दों पर बात नहीं होगी, तो बच्चे इंटरनेट जैसी असुरक्षित जगहों से गलत जानकारी लेंगे.

'खाली समय' भी है जरूरी
कैलेंडर में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि बच्चों को एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज के नाम पर इतना बिजी कर दिया गया है कि उनके पास 'बोर' होने का भी वक्त नहीं है. बच्चों के लिए बिना किसी प्लान के खेलना और खाली बैठना उनके मानसिक विकास के लिए बहुत जरूरी है.

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