राजस्थान में 'खेजड़ी' पेड़ को बचाने के लिए सड़कों पर भीड़ उतर आई है. आमरण अनशन चल रहे हैं और सरकार की विकास योजनाओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है. वजह यह है कि सौर ऊर्जा कंपनियां सोलर पैनल लगाने के लिए बड़ी मात्रा में जमीन हासिल कर रही थीं और उन जमीनों पर खड़े खेजड़ी पेड़ों को काटा जा रहा था.
बिश्नोई समाज और संत समुदाय इस कटाई के खिलाफ एकजुट हो गया है. लोगों का कहना है कि खेजड़ी को बचाना सिर्फ पर्यावरण की लड़ाई नहीं बल्कि उनकी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा है. इसी वजह से यह पूरा आंदोलन आज दुनिया के पहले पर्यावरण आंदोलन-1730 के खेजड़ली बलिदान से जोड़कर देखा जा रहा है.
क्यों याद किया जा रहा है अमृता देवी को
यही वह बलिदान था, जब बिश्नोई समाज की अमृता देवी बिश्नोई ने खेजड़ी पेड़ को गले लगाकर सैनिकों का सामना किया था. उनके अंतिम शब्द थे-सर सांतेय रूंख रहे तो भी सस्तो जान यानी सिर कट जाए, पर पेड़ नहीं कटने चाहिए. उन्होंने पेड़ को इतना कसकर पकड़ा कि सैनिकों की कुल्हाड़ी का पहला वार ही उनके जीवन का अंत बन गया, लेकिन उनकी शहादत ने समाज में ऐसी आग जलाई जिसे सदियों बाद भी महसूस किया जा रहा है.
1730 की अमृता देवी की शहादत
घटना 1730 की है. खेजड़ली गांव, जो आज के जोधपुर के पास है. राजा अभय सिंह राठौड़ ने महल निर्माण के लिए लकड़ी का आदेश दिया. सैनिकों ने खेजड़ी पेड़ों को काटना शुरू किया. इस आदेश का विरोध करते हुए अमृता देवी और उनकी दो बेटियों ने पेड़ों को गले लगाया और शहीद हो गईं. खबर दूर तक फैली और 83 गांवों से पुरुष, महिलाएं और बच्चे खेजड़ी पेड़ों से लिपटकर खड़े हो गए. सैनिकों ने कुल 363 बिश्नोई लोगों को मार दिया, लेकिन पेड़ काट नहीं पाए. यह घटना इतिहास में 'खेजड़ली नरसंहार' के नाम से दर्ज हुई और माना जाता है कि इसी ने आगे चलकर 1970 के दशक के चिपको आंदोलन को प्रेरित किया.
यह भी पढ़ें: खेजड़ी, काला हिरन और भगवान विष्णु की पूजा... 29 नियमों को मानने वाला बिश्नोई समाज अनूठा क्यों है
बिश्नोई समाज की प्रकृति के प्रति यह समर्पण नया नहीं है. समुदाय की स्थापना 1485 में गुरु जंभाजी ने की थी, जिन्होंने 29 नियम बनाए जिनमें हरे पेड़ न काटने और जीव-जंतुओं की रक्षा करने पर खास जोर था.
इसी परंपरा के कारण बिश्नोई समाज ने 1998 के ब्लैकबक शिकार मामले में भी वर्षों तक लड़ाई लड़ी. उनके लिए वन्यजीव और पेड़ दोनों पवित्र हैं. यही वजह है कि राजस्थान में खेजड़ी की कटाई ने समाज को एक बार फिर आंदोलन के लिए मजबूर कर दिया है.
यह भी पढ़ें: सिर साठे रुख रहे... खेजड़ी बचाने के लिए क्यों जान की बाजी लगा देता है बिश्नोई समाज
खेजड़ी रेगिस्तान की जान
खेजड़ी पेड़ सिर्फ सांस्कृतिक रूप से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है. ICAR के अनुसार यह पेड़ थार रेगिस्तान का मुख्य आधार है.यह मिट्टी को उपजाऊ बनाता है, चारे और भोजन का स्रोत है और कठोर गर्मी में भी टिक जाता है. इस पेड़ को नुकसान पहुंचाना पूरे इकोसिस्टम को प्रभावित कर सकता है.
आज, जब खेजड़ी पेड़ों की कटाई के आरोप सामने आए, तो बिश्नोई समाज का विरोध स्वाभाविक था. हजारों लोग सड़क पर उतरे, कई संत आमरण अनशन पर बैठ गए और कलेक्टरेट का घेराव भी हुआ. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह सिर्फ विकास बनाम पर्यावरण की लड़ाई नहीं, बल्कि सदियों पुरानी उस परंपरा की रक्षा है जिसने इस भूमि को जीवंत रखा है.
300 साल पुरानी आवाजें आज फिर सुनाई दे रही हैं.जहां पेड़ खड़े हैं, वहां जीवन खड़ा है.और राजस्थान के लोग आज फिर उसी विश्वास के साथ खड़े हैं.
aajtak.in