भारत में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का पता बदलने वाला है. अब नए कलेवर में पीएमओ साउथ ब्लॉक से 'सेवा तीर्थ' परिसर में शिफ्ट हो जाएगा. मकर संक्रांति के बाद से पीएमओ का सारा काम-काज यहीं से होगा. साथ ही पीएमओ के काम करने के तौर-तरीके भी बदलने वाले हैं. ऐसा पहली बार नहीं हुआ. पीएमओ के गठन से लेकर अबतक इसमें कई बदलाव हुए हैं. यहां तक की आज जिसे हम पीएमओ कहते है, ये नाम भी नहीं था. ऐसे में जानते हैं PMO के बनने का इतिहास क्या है और इसका स्ट्रक्चर कैसे बदलता गया.
वैसे तो भारत में प्रधानमंत्री कार्यालय की औपचारिक शुरुआत 2 सितंबर 1946 को अंतरिम सरकार बनने के साथ ही हो गई थी. जब वायसराय की कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में जवाहरल लाल नेहरू की नियुक्ति की गई थी. हालांकि, उस वक्त पीएमओ जैसा कोई शब्द प्रचलित नहीं था और न ही ऐसी कोई व्यवस्था थी. इसकी जगह पीएमएस (PMS) यानी प्रधानमंत्री सचिवालय था. PMO इसी पीएमएस का मौजूदा वर्जन है. हालांकि, इसके स्ट्रक्चर में समय के साथ कई तब्दीलियां आ गई हैं.
पंडित नेहरू के निजी सचिव रहे एमओ मथाई ने पहले प्रधानमंत्री के कार्यकाल में भारत में पीएमएस के बनने की पूरी कहानी अपनी किताब 'REMINISCENCES OF THE NEHRU AGE' में बताई है. उन्होंने लिखा है कि भारत में प्रधानमंत्री सचिवालय का गठन 15 अगस्त 1947 को एडहॉक आधार पर किया गया था. इसमें एक वरिष्ठ ICS अधिकारी एचवी आर अयंगर प्रिंसिपल प्राइवेट सेक्रेटरी (PPS) थे. अपने छोटे से कार्यकाल के दौरान अयंगर काफी दबंग पर्सनैलिटी थे. उनकी काबिलियत पर कोई शक नहीं था. किसी तरह उन्होंने सरदार पटेल, शनमुखम चेट्टी और जॉन मथाई को नाराज कर दिया. क्योंकि उन सभी को अयंगर के कैबिनेट मीटिंग में शामिल होने पर आपत्ति थी.
आखिरकार सरदार पटेल ने लोगों को ऊपर के पद पर भेजने का तरीका अपनाया. उन्होंने नेहरू से अयंगर को होम सेक्रेटरी के पद पर नियुक्त करने के लिए रिलीज करने का अनुरोध किया. इस पर सहमति बन गई. इसके बाद प्रधानमंत्री सचिवालय में उनकी जगह एवी पाई ने ली. वो भी एक वरिष्ठ ICS अधिकारी थे. पाई बहुत ही नरम स्वभाव के व्यक्ति थे. वह बहुत निष्पक्ष और एक परफेक्ट जेंटलमैन थे. वह नेहरू के सबसे अच्छे PPS थे. अयंगर के जाने के बाद से, किसी भी PPS ने कैबिनेट मीटिंग में हिस्सा नहीं लिया है.
इंग्लैंड के पैटर्न पर व्यवस्थित किया गया था भारत का PMS
मथाई लिखते हैं कि 1948 में, जब हम लंदन में थे, तो नेहरू ने एटली से अनुरोध किया कि मुझे कैबिनेट सिस्टम में प्रधानमंत्री की स्थिति और उनके सचिवालय के गठन और कामकाज का अध्ययन करने की सुविधा दी जाए. एटली ने अपने कैबिनेट सेक्रेटरी लॉर्ड नॉर्मन ब्रूक और ट्रेजरी सेक्रेटरी लॉर्ड एडवर्ड ब्रिजेस, जो पहले विंस्टन चर्चिल के समय युद्धकाल में कैबिनेट सेक्रेटरी थे. दोनों से मुझे मिलने और मुझे ज़रूरी जानकारी देने के लिए कहा. लॉर्ड नॉर्मन ब्रूक ने मेरे लिए एक नोट भी तैयार किया.
वहां प्रधानमंत्री आमतौर पर किसी भी डिपार्टमेंट का चार्ज नहीं लेते हैं. लेकिन, विदेश मामलों और रक्षा के क्षेत्रों में प्रधानमंत्री की एक खास स्थिति होती है. प्रधानमंत्री और उनके विदेश सचिव के बीच संबंध शायद प्रधानमंत्री और किसी अन्य मंत्री के बीच के संबंध से ज़्यादा करीबी होते हैं. राजनीतिक महत्व के मामले शायद किसी अन्य विभागीय मंत्री की तुलना में विदेश सचिव के काम के क्षेत्र में अधिक बार होते हैं. इन सभी मामलों को कैबिनेट में नहीं लाया जा सकता है, और इसी कारण से प्रधानमंत्री को विदेश मामलों से करीबी संपर्क बनाए रखना चाहिए.
आमतौर पर, जब विदेश सचिव बाहर होते हैं, तो उनके कर्तव्यों का पालन प्रधानमंत्री करते हैं. रक्षा के क्षेत्र में, प्रधानमंत्री सर्वोच्च ज़िम्मेदारी बनाए रखते हैं और रक्षा समिति के अध्यक्ष होते हैं। रक्षा मंत्री की नियुक्ति से सर्वोच्च ज़िम्मेदारी पर कोई असर नहीं पड़ता है. क्योंकि प्रधानमंत्री के पास कोई वैधानिक शक्तियां और कोई डिपार्टमेंट नहीं है, इसलिए उन्हें बड़े स्टाफ की ज़रूरत नहीं होती है; वे काफी हद तक सभी डिपार्टमेंट से सलाह और सहायता लेते हैं. एक ओर, सरकारी कामकाज के लेन-देन में, उनके पास ट्रेजरी के सचिव की सलाह होती है, और दूसरी ओर कैबिनेट मामलों के संचालन में कैबिनेट सचिव की सलाह होती है.
10 डाउनिंग स्ट्रीट में प्रधानमंत्री का सचिवालय एक छोटा, कॉम्पैक्ट ऑफिस है. खासकर निचले स्तरों पर बहुत सक्षम है. चूंकि सिद्धांत रूप में सरकार का पूरा बोझ प्रधानमंत्री पर होता है, इसलिए वह स्थापित परंपरा के अनुसार, अपने कार्यों के निर्वहन में सहायता के लिए किसी भी प्रकार के और किसी भी संख्या में लोगों को रख सकते हैं.प्रधानमंत्री के कर्मचारियों के लिए वित्तीय और प्रशासनिक मंज़ूरी अपने आप मिल जाती है,बशर्ते कि कर्मचारियों की ऐसी मांग को प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत मंज़ूरी मिली हो.
यहां तक कि यूनाइटेड किंगडम में कैबिनेट सचिवालय के पास भी कोई वैधानिक शक्तियां या कार्यकारी ज़िम्मेदारियां नहीं थीं. एटली के सचिवालय में एक प्रधान निजी सचिव थे जो सहायक सचिव के ग्रेड के थे (दिल्ली में एक वरिष्ठ उप सचिव के बराबर), चार निजी सचिव थे जो प्रधान के ग्रेड के थे (दिल्ली में एक अवर सचिव के बराबर), एक संसदीय निजी सचिव, एक जनसंपर्क अधिकारी और विभिन्न ग्रेड के पचास स्टेनो और लिपिक कर्मचारियों का एक दल था. प्रधान निजी सचिव सहित निजी सचिवों के बीच काम स्पष्ट रूप से परिभाषित थे.
नेहरू ने नहीं रखा था अपना PRO
यूनाइटेड किंगडम में प्रधानमंत्री आमतौर पर अख़बार वालों से नहीं मिलते हैं. PRO का काम प्रधानमंत्री और उनकी नीतियों को देश और विदेश में प्रेस को "बेचना" है. जब संसद का सत्र चल रहा होता है, तो वह लॉबी संवाददाताओं के साथ रोज़ाना दो कॉन्फ्रेंस करते हैं, जिनकी संख्या लगभग पचास होती है। यूनाइटेड किंगडम में प्रधानमंत्री और विदेश सचिव आमतौर पर लॉबी संवाददाताओं से नहीं मिलते हैं. बाकी सभी विभागीय मंत्री अनौपचारिक कॉन्फ्रेंस में लॉबी संवाददाताओं से मिलते हैं और उन्हें संसद में आने वाले बिलों के बारे में पहले से जानकारी देते हैं.
मथाई लिखते हैं कि 1950 में मैं प्रधान मंत्री के सचिवालय में PRO का एक पद बनाना चाहता था और उसे ब्रिटिश प्रधान मंत्री के PRO को मिलने वाली स्थिति और सुविधाएं प्रदान करना चाहता था. कैबिनेट सचिव और विदेश मंत्रालय के महासचिव को मेरे प्रस्ताव की भनक लग गई. उन्होंने मुझसे विनती की और कहा कि एक पत्रकार को गुप्त कागजात देखने देना खतरनाक होगा.
मैं उनसे सहमत नहीं था; लेकिन मैंने यह विचार छोड़ दिया क्योंकि मुझे पक्का नहीं था कि नेहरू PRO का पूरा इस्तेमाल करेंगे या नहीं. असल में, नेहरू खुद ही अपने PRO थे और उन्हें किसी इमेज बिल्डर की ज़रूरत नहीं थी. मैंने एक बार नेहरू से कहा था कि प्रेस कॉन्फ्रेंस राष्ट्रपति को एक मंच देने के लिए अमेरिकियों का आविष्कार है. संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री के पास संसद होती है, जहां वह खुलकर बात कर सकते हैं. न तो चर्चिल और न ही एटली ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं.
मैंने नेहरू को सुझाव दिया कि वह इस प्रथा को छोड़ने पर विचार कर सकते हैं. हालांकि, वह मुझसे सहमत थे, लेकिन उन्होंने यह सुझाव मानने से मना कर दिया. उन्हें दिखावा करना पसंद था. मुझे कोई शक नहीं है कि कुछ प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके कुछ बयान और बिना सोचे-समझे दिए गए बयानों से फायदे से ज़्यादा नुकसान हुआ.
लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने किया विस्तार
प्रधान मंत्री नेहरू के PMS को धीरे-धीरे ब्रिटिश पैटर्न के अनुसार फिर से व्यवस्थित किया गया. आखिरकार, प्रिंसिपल प्राइवेट सेक्रेटरी के पद को बिना किसी कार्यक्षमता में कमी के जॉइंट सेक्रेटरी के पद तक कम कर दिया गया. जब लाल बहादुर प्रधान मंत्री बने, तो उन्होंने एलके झा को अपना प्रिंसिपल प्राइवेट सेक्रेटरी बनाना चाहते थे. झा ने शर्त रखी कि सचिवालय को किसी अन्य मंत्रालय की तरह एक विभाग के रूप में नामित किया जाना चाहिए, उन्हें प्रधान मंत्री का सचिव होना चाहिए, न कि PPS, और वारंट ऑफ प्रेसिडेंस में उनकी स्थिति वही होनी चाहिए जो कैबिनेट सचिव की होती है. इन मांगों की ठीक से जांच किए बिना, लाल बहादुर ने विनम्रतापूर्वक सहमति दे दी.
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झा ने पार्किंसन के नियम को हावी होने दिया. उन्होंने एक विस्तार कार्यक्रम शुरू किया. एक सचिव आमतौर पर असहज महसूस करता है अगर उसके पास कुछ जॉइंट सेक्रेटरी न हों और एक जॉइंट सेक्रेटरी रोएगा अगर उसके पास कुछ डिप्टी सेक्रेटरी न हों, और इसी तरह आगे भी. फिर इंदिरा आईं जिन्होंने इस प्रक्रिया को पूरा किया. 1958-59 में प्रधान मंत्री के सचिवालय के कर्मचारियों में सभी श्रेणियों के 129 व्यक्ति शामिल थे. इसमें चपरासी भी शामिल थे; और बजट (वास्तविक) 675,000 रुपये था, जबकि 1976-77 में कर्मचारियों की संख्या 242 हो गई और बजट बढ़कर 3.07 मिलियन रुपये हो गया. पीएमएस का यह स्ट्रक्चर इंदिरा गांधी के कार्यकाल तक प्रभावी रहा.
मोरारजी देसाई ने पीएमएस को बनाया PMO
1977 में जब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने तो प्रधान सचिव का पद फिर से शुरू किया गया. तब ICS अफसर विद्या शंकर उनके प्रधान सचिव बने. उन्होंने पहले सरदार पटेल के सचिव के रूप में काम किया था और एक दशक पहले सेवा से रिटायर हो गए थे. उनको 1977 में प्रधान सचिव के रूप में नियुक्त किया गया. यह तब हुआ जब मोरारजी देसाई इमरजेंसी के बाद भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधान मंत्री बने.
शंकर का काफी प्रभाव था. हालांकि वे नरम स्वभाव के थे, लेकिन वे एक सख्त प्रशासक थे. प्रधानमंत्री को लगता था कि प्रधान मंत्री सचिवालय एक बहुत बड़ा ऑफिस है और उन्होंने घोषणा की कि वे इसे छोटा करेंगे. एक शक्तिशाली प्रधानमंत्री सचिवालय के प्रति अपनी सभी नापसंदगी के बावजूद देसाई सिर्फ इतना कर पाए कि उन्होंने प्रधानमंत्री सचिवालय (PMS) का नाम बदलकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) कर दिया. यह नाम आज भी जारी है.
सिद्धार्थ भदौरिया