ईरान इस वक्त बड़े उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है. सरकार के खिलाफ लगातार विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, महिलाएं और युवा खुलकर सड़कों पर उतर रहे हैं, और सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने हालात को और तनावपूर्ण बना दिया है. इसी बीच अमेरिका की ओर से बयानबाजी तेज हो गई है, जिससे यह अंदेशा बढ़ गया है कि ईरान की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव हो सकता है. अमेरिका के भीतर तो सालों से यह आवाज उठती रही है कि ईरान में शासन बदलना चाहिए. यह नई बात नहीं है. 1953 में अमेरिका ने एक बार सत्ता परिवर्तन कराया भी था, लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति ने पूरा खेल हमेशा के लिए उलट दिया.
आज, चार दशक बाद भी अमेरिका और इजराइल को ईरान की मौजूदा व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती लगती है. लेकिन इस व्यवस्था को हिलाना इतना आसान नहीं है, क्योंकि इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं. और उन जड़ों में सबसे मजबूत बुनियाद हैं ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई, जो 36 साल से भी ज्यादा वक्त से सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं. विरोध चाहे जितना भी हो, अंतरराष्ट्रीय दबाव कितना भी बढ़ जाए, सिस्टम इसलिए नहीं डगमगाता क्योंकि खामेनेई के पास वह ढांचा है जिसे ईरान की असली ताकत माना जाता है.
खामेनेई की कुर्सी इतनी मजबूत कैसे बनी
इसका जवाब ईरान के उस राजनीतिक ढांचे में छिपा है, जिसे आम लोग कम समझते हैं, लेकिन वास्तव में वही तय करता है कि ईरान को कौन चलाएगा. इस ढांचे की शुरुआत 1979 की क्रांति से होती है, जब ईरान में एक अनोखा पद बनाया गया. रहबर-ए-आला, यानी सुप्रीम लीडर. यह सिर्फ राजनीतिक पद नहीं था, बल्कि राष्ट्र का धार्मिक मार्गदर्शक भी माना गया. इसलिए यह पद राष्ट्रपति से कई गुना शक्तिशाली हो गया. सेना, विदेश नीति, खुफिया एजेंसियां, न्यायपालिका, मीडिया. सबके फैसलों की अंतिम मंजूरी सुप्रीम लीडर के हाथ में है.अब सवाल उठता है कि इतनी ताकत किसे मिलती है और किसके पास यह अधिकार है कि वह ईरान का सबसे बड़ा नेता चुने.
क्या है मजलिस-ए-खुबरेगान
यहीं आता है पहला बड़ा संस्थान. मजलिस-ए-खुबरेगान.बीबीसी ऊर्दू की रिपोर्ट के मुताबिक, बाहर से देखने पर यह एक चुनी हुई परिषद लगती है, जिसमें 88 धर्मगुरु होते हैं और इनका चुनाव जनता करती है. इनके जिम्मे दो काम होते हैं. सुप्रीम लीडर की निगरानी करना और जरूरत पड़े तो उनकी जगह किसी और को चुनना. लेकिन यह सुनकर लग सकता है कि सिस्टम लोकतांत्रिक है, जबकि असलियत इससे कहीं ज्यादा जटिल है.मजलिस अरबी मूल का शब्द है, जिसका अर्थ काउंसिल होता है.खुबरेगान फारसी शब्द है, जिसका मतलब 'विशेषज्ञ' या 'जानकार लोग'से होता है.
शूरा-ए-निगेहबान का क्या काम है
मजलिस-ए-खुबरेगान का सदस्य बनने से पहले हर उम्मीदवार को मंजूरी देनी होती है शूरा-ए-निगेहबान को. यही वह संस्था है जो ईरान में किसी भी चुनाव का असली गेटकीपर मानी जाती है. कौन चुनाव लड़ने के लायक है, कौन अयोग्य घोषित होगा, संसद का कानून इस्लामी मूल्यों के हिसाब से सही है या नहीं. यह सब शूरा-ए-निगेहबान तय करती है.
अहम बात यह है कि इस काउंसिल के ज्यादातर सदस्य सीधे या परोक्ष रूप से सुप्रीम लीडर द्वारा ही नियुक्त होते हैं. यानी जो संस्था सुप्रीम लीडर को चुनने वालों को मंजूरी देती है, वह खुद सुप्रीम लीडर के प्रभाव में होती है. इसी वजह से ईरान में सत्ता एक बंद घेरे की तरह काम करती है, जहां बाहर की ताकतों या विरोधी विचारों के लिए बहुत कम जगह बचती है.
क्या है बुन्याद
ईरान की ताकत सिर्फ राजनीति और धर्म से नहीं आती, उसकी जड़ें अर्थव्यवस्था में भी मजबूती से फैली हुई हैं. यहां बुन्याद नाम की विशाल संस्थाएं हैं. बाहर से ये चैरिटी या वेलफेयर संगठन लगती हैं, लेकिन असल में इनके पास अरबों डॉलर की संपत्तियां हैं. फैक्ट्रियां, कंपनियां, बैंक और रियल एस्टेट. इन पर सरकार का सीधा नियंत्रण नहीं होता और ये सामान्य तरीके से टैक्स भी नहीं चुकातीं. इनका जवाबदेह सिर्फ सुप्रीम लीडर को माना जाता है. यही वजह है कि बुन्याद को ईरान की पैरलल इकॉनमी कहा जाता है.
तो फिर खामेनेई इतने मजबूत कैसे बने
इसका जवाब तीन दशकों की उनकी रणनीति में छिपा है. उन्होंने धीरे-धीरे हर अहम संस्था में अपने भरोसेमंद लोगों को बैठाया. शूरा-ए-निगेहबान हो, मजलिस-ए-खुबरेगान हो, न्यायपालिका हो या बुन्याद. हर जगह सत्ता का संतुलन उनके पक्ष में गया.
इसी दौरान रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, यानी पासदारान-ए-इंकलाब, ईरान की राजनीति और अर्थव्यवस्था में बेहद ताकतवर बन गई. खामेनेई और पासदारान का रिश्ता आपसी भरोसे और हितों पर टिका रहा. यही गठजोड़ ईरान में किसी भी तरह के रिजीम चेंज की राह में सबसे बड़ी दीवार बना हुआ है.
यही वजह है कि ईरान में सत्ता किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस पूरे ढांचे से चलती है जिसे खामेनेई ने दशकों में मजबूत किया है. इसलिए उनकी कुर्सी आज भी मजबूत दिखती है.
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