नाम में खां होने की वजह से कई लोग चंगेज खां को मुसलमान समझ लेते हैं. जबकि, दूर-दूर तक उसका इस्लाम से कोई वास्ता नहीं था. चंगेज खान 40 वर्ष की आयु पार करने के बाद ही चंगेज खां बने. लगभग 1162 में एक कबीले के योद्धा सरदार के बेटे के रूप में उनका जन्म हुआ और उनका नाम तेमुजिन रखा गया.
चंगेज खां एक मंगोल खानाबदोश थे. आधी से ज्यादा दुनिया चंगेज खां का नाम सुनकर ही थर-थर कांपती थी. चंगेज खां की क्रूरता के किस्से आज भी मशहूर हैं. बीबीसी की हिस्ट्री एक्स्ट्रा की रिपोर्ट के मुताबिक, 'द सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ़ मंगोल', जो चंगेज खां की मृत्यु के तुरंत बाद मंगोलियाई भाषा में लिखी गई थी. उसमें जिक्र है कि जब उसका जन्म हुआ तो हथेली में ख़ून का एक थक्का था. जिसे उन लोगों ने एक महान विजेता होने की निशानी के रूप में देखा.
शुरुआत में चंगेज खां ने खाई थी दर-दर की ठोकर
अगर तेमुजिन महान बनने के लिए पैदा हुआ था, तो उसके शुरुआती जीवन में इसके कोई संकेत नहीं थे. आठ या नौ साल की उम्र में, उनके पिता को प्रतिद्वंद्वी कबीले वालों ने जहर देकर मार दिया. चंगेज खां बहुत कम उम्र में बेसहारा हो गया था. उन्हें और उनकी मां को उनके कबीले ने त्याग दिया और मंगोलिया के घास के मैदानों में भेज दिया. जहां वे बेर, चूहे और पक्षियों को खाकर गुज़ारा करते थे. यह एक अपमानजनक और दयनीय जीवन था.
युवा तेमुजिन को यह अहसास हुआ कि अपनी किस्मत पलटने और अपने लिए एक मजबूत आधार बनाने का सबसे अच्छा मौका गठबंधन करना था. इसके लिए उसे शादी सबसे आसान रास्ता लगा. महज 16 वर्ष की आयु में उन्होंने ओल्खोनुद जनजाति की बोर्टे नामक लड़की से विवाह करके यही किया. 'द सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ मंगोल' में वो लिखते हैं कि बोर्टे मेरी थी और उसका कबीला भी मेरा था. तेमुजिन ने इस विवाह पर विजय का भाव व्यक्त किया.
हिंसक और उग्र मंगोलियाई मैदानों में, विवाह करना भी मुसीबत का कारण बन सकता था.तेमुजिन और बोर्टे के विवाह के तुरंत बाद, प्रतिद्वंद्वी जनजाति, मेरकिट ने तेमुजिन पर घात लगाकर हमला किया और उनकी दुल्हन को अपने साथ ले गए. इस तरह काफी चुनौतियों और मुश्किल हालातों का सामना कर तेमुजिन चंगेज खां बना.
इस धर्म को मानता था चंगेज खां
उसकी बहादुरी, जीत और उपलब्धियों की वजह से सम्मान के तौर पर आदरसूचक उपाधि'खां'से नवाजा गया. नाम के साथ 'खां' टाइटल उसके धर्म को नहीं, बल्कि उसकी उपलब्धि और आधी से ज्यादा दुनिया जीतने के कारण डर या आदर जो भी कहा जाए, उस वजह से दिया गया एक तमगा था.
चंगेज खां एक मंगोल था और उस वक्त शामानी धर्म को मानते थे. चंगेज खां भी शामानी धर्म को मानता था.जिसमें आसमान की पूजा करने की परंपरा रही थी. मंगोल लोग आसमान की पूजा करते थे. उसके नेतृत्व में मंगोल राजवंश का उदय हुआ, जिसने पूरे चीन, मध्य एशिया, ईरान, पूर्वी यूरोप और रूस के एक बड़े हिस्से पर राज किया.
चंगेज खां के सैनिक ऑस्ट्रिया, फिनलैंड, क्रोएशिया, हंगरी, पोलैंड, वियतनाम, बर्मा, जापान और यहां तक कि इंडोनेशिया तक पहुंचे. उसने अपनी उम्र के 50वें पड़ाव में जीत का सिलसिला शुरू किया था. वह मशहूर ईरानी इतिहासकार मिनहाज अल सिराज जुजजानी ने लिखा है कि चंगेज खां जब वो ख़रासान आया था तो उसकी उम्र थी 65 वर्ष थी. फिर भी उसके शरीर में ज़बरदस्त ऊर्जा थी. दुश्मनों के लिए उससे निर्दयी कोई नहीं हो सकता था.
सन 1211 से लेकर 1216 तक का पांच वर्ष का समय चंगेज़ ने मंगोलिया से दूर चीन को फ़तह करने के अपने लक्ष्य में लगाया. जलालउद्दीन का पीछा करते करते चंगेज भारत की सीमा तक पहुंच गया था. चंगेज और जलाल की सेना के बीच आखिरी लड़ाई सिंधु नदी के तट पर हुई थी. हालांकि, कुछ ऐसा हुआ कि चंगेज खान भारत आने की बजाय सिंधु नदी के तट से लौट गया.
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