इंदौर, कोयंबटूर, जयपुर, भुवनेश्वर और लखनऊ जैसे शहरों का नाम आमतौर पर भारत के बड़े जॉब मार्केट की चर्चा में नहीं लिया जाता. ये शहर न तो सबसे ज्यादा सैलरी देने वाले हैं और न ही करियर के लिए पहली पसंद माने जाते हैं. लेकिन इसके बावजूद, ये शहर धीरे-धीरे उस क्षेत्र में शामिल हो रहे हैं, जहां सबसे तेजी से नई नौकरियां पैदा हो रही हैं. इन शहरों में नौकरियों के मौके सैलरी बढ़ने की रफ्तार से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही हैं. पहली नजर में यह खास आकर्षक नहीं लगता, लेकिन अगर ध्यान से देखें तो यह एक बड़ा बदलाव दिखाता है. अब भारत में रोजगार के अवसर सिर्फ कुछ बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहे बल्कि छोटे और मध्यम शहरों में भी तेजी से फैल रहे हैं. इससे नौकरी के मौके ज्यादा लोगों तक पहुंच रहे हैं और यह सिस्टम पहले से ज्यादा स्थिर और लंबे समय तक टिकने वाला बनता जा रहा है.
दशकों से भारत में करियर आगे बढ़ाने का एक ही तरीका माना जाता था. अच्छी नौकरी के लिए बड़े शहरों में जाना. लेकिन अब यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है. आज कंपनियां कम खर्च, कर्मचारियों के लंबे समय तक टिके रहने और छोटे शहरों में भी बढ़ती अच्छी प्रतिभा की वजह से टियर-2 शहरों में भी तेजी से हायरिंग कर रही है.
द बिग फाइव
उदाहरण के तौर पर, इंदौर में आईटी और सर्विस सेक्टर की नौकरियां तेजी से बढ़ रही है. कोयंबटूर अपने पुराने मैन्युफैक्चरिंग बेस के साथ अब टेक सेक्टर को भी जोड़ रहा है. इसके साथ जयपुर धीरे-धीरे स्टार्टअप और बड़ी कंपनियों के सेंटर के रूप में उभर रहा है, जबकि भुवनेश्वर बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी सपोर्ट के चलते लोकप्रिय हो रहा है. वहीं, लखनऊ, जिसे पहले सिर्फ प्रशासनिक शहर माना जाता था, अब बैंकिंग, फाइनेंस (BFSI) और सर्विस सेक्टर में तेजी से नौकरियां दे रहा है. एम्प्लॉयइंडेक्स सर्विसेज की सह-संस्थापक देबोदिना चक्रवर्ती बताती हैं कि आज कंपनियों के लिए स्थान की कोई बड़ी सीमा नहीं रही. डिजिटल बदलाव और वर्क फ्रॉर्म होम की सुविधा ने उन्हें उन प्रतिभाशाली लोगों तक पहुंचने का मौका दिया है, जिनका पहले सही इस्तेमाल नहीं हो पाता था.
ये बदलाव खींच रहे हैं ध्यान
इस बदलाव में सबसे खास बात सिर्फ नौकरियों के बढ़ने के स्थान नहीं बल्कि उनके तरीके में हो रहे बदलाव हैं. बड़े शहरों में अक्सर सैलरी तेजी से बढ़ती है, लेकिन इन छोटे और मध्यम शहरों में सैलरी का बढ़ना धीरे-धीरे हो रहा है. इसका मतलब यह नहीं कि यहां विकास धीमा है, बल्कि यह रोजगार का संतुलन बन रहा है. वहीं, पुणे के रोजगार सलाहकार शांतनु राज कहते हैं कि आजकल कंपनियां सैलरी को लेकर आक्रामक प्रतिस्पर्धा के बजाय टिकाऊ हायरिंग पर फोकस कर रही हैं. टियर-2 शहर एक ऐसा संतुलन प्रदान करते हैं, जहां कंपनियां सैलरी संरचना को बिगाड़े बिना टीमों का विस्तार कर सकती हैं. असल में, कंपनियां कम पोस्ट के लिए अधिक सैलरी देने के बजाय अधिक लोगों को नौकरी पर रखना पसंद कर रही हैं. नौकरी चाहने वालों को इससे क्या फायदा है? यह बदलाव कई मायनों में स्थिति को बदल देता है.
कम सैलरी लेकिन सुरक्षा पूरी
इंदौर या जयपुर जैसे शहरों में मध्यम सैलरी वाले अक्सर बड़े शहरों की तुलना में लाइफस्टाइल के खर्च को बेहतर ढंग से पूरा कर लेते हैं. किराया, यात्रा और रोजमर्रा के खर्चों को मिलाकर देखें तो इसका मतलब होता है ज्यादा बचत, कम वित्तीय तनाव और बेहतर जीवन स्तर. दिल्ली की करियर काउंसलर निशा खन्ना कहती हैं कि युवा अब केवल सैलरी देखकर नौकरी नहीं चुन रहे, बल्कि वास्तविक आय और वित्तीय स्थिरता पर ध्यान दे रहे हैं. छोटे शहर में थोड़ी कम सैलरी भी आर्थिक सुरक्षा दे सकती है. यह शुरुआती करियर वाले पेशेवरों के लिए और भी अहम है. करियर के शुरुआती साल में स्किल सीखना, अनुभव जुटाना और वित्तीय स्थिरता बनाना अक्सर अधिक महत्वपूर्ण होता है बजाय केवल उच्च सैलरी के.
युवाओं को मिलता है ये फायदा
करियर काउंसलर निशा खन्ना कहती हैं कि जब नौकरियां लोगों के नजदीकी शहरों में होती है , तो अधिक लोग आसानी से उन्हें पा सकते हैं. इससे लंबी अवधि में आर्थिक और सामाजिक फायदा होता है. पहले करियर के फैसले अक्सर समझौते वाले होते थे—जैसे नौकरी या परिवार के बीच चुनना. अब यह दोनों साथ में संभव हो रहा है. इंदौर, कोयंबटूर, जयपुर, भुवनेश्वर और लखनऊ ऐसे शहर हैं जो भारत के बदलते रोजगार बाजार को दिखाते हैं:
ये शहर अभी सबसे ज्यादा सैलरी नहीं देते, लेकिन स्थिरता और लंबी अवधि के करियर के अच्छे मौके देते हैं. इसका मतलब है कि अब अच्छी नौकरी सिर्फ सैलरी तक नहीं, बल्कि सीखने, बढ़ने और सुरक्षित भविष्य तक फैल गई है.
दीबाश्री मोहंती