दुश्मन देश से US डिफेंस ने छुड़ाया पायलट, भारत में गरुड़ कमांडो करते हैं ये काम, ऐसे होती है भर्ती

युद्ध के मैदान में जब किसी फाइटर पायलट का विमान दुश्मन के इलाके में क्रैश होता है, तो हर सेकंड उसकी जिंदगी के लिए अहम होता है. हाल ही में ईरान क्षेत्र में अमेरिकी कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू (CSAR) मिशनों की सक्रियता ने दुनिया का ध्यान खींचा है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत के पास भी ऐसी ही एक खतरनाक और हाई-ट्रेंड स्पेशल फोर्स मौजूद है जिसका नाम है गरुड़ कमांडो फोर्स. 

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भारत में गरुड़ कमांडो फोर्स में ऐसे होती है भर्ती. (Photo: ITG) भारत में गरुड़ कमांडो फोर्स में ऐसे होती है भर्ती. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 9:34 AM IST

ईरान के साथ चल रहे युद्ध में अमेरिका ने अपने एफ-15 लड़ाकू विमान के एक पायलट को जिंदा बचा लिया है. बदलते युद्ध के दौर में अब लड़ाई सिर्फ हथियारों की नहीं बल्कि हर हाल में अपने सैनिकों को सुरक्षित वापस लाने की क्षमता की भी हो गई है. दुश्मन की सरहद के भीतर गिरा एक पायलट, चारों तरफ खतरा से घिरा रहता है. ऐसे हालात में रेस्क्यू मिशन किसी चुनौती से कम नहीं होती. ईरान क्षेत्र में अमेरिकी CSAR ऑपरेशंस की चर्चा के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या भारत के पास ऐसी क्षमता है? भारतीय वायुसेना की ‘गरुड़ कमांडो फोर्स’ इसी तरह के हाई-रिस्क मिशनों के लिए तैयार की गई एक बेहद खास और जांबाज यूनिट है. 

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क्या है CSAR मिशन और गरुड़ की भूमिका?

CSAR यानी कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू का मतलब होता है युद्ध के बीच फंसे सैनिक या पायलट को सुरक्षित निकालना. इंडियन एयर फोर्स के गरुड़ कमांडो इसी तरह के हाई-रिस्क ऑपरेशंस के लिए ट्रेन किए जाते हैं. ये कमांडो दुश्मन के इलाके में बेहद कम ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं और हेलीकॉप्टर से उतरते हैं या पैराशूट के जरिए ‘पैरा-ड्रॉप’ करते हैं और पायलट को ढूंढकर सुरक्षित बाहर निकालते हैं. 

मौत के साए में होता है ऑपरेशन 

अदृश्य हमला- ये कमांडो दुश्मन के रडार से बचकर, घने जंगलों या ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों में 'पैरा-ड्रॉप'(पैराशूट से कूदना) करते हैं. 

तकनीकी मार- इनके पास 'SDR-Air' (सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो) होते हैं, जिससे ये पायलट के सिग्नल को ट्रैक करते हैं, जबकि दुश्मन को इसकी भनक भी नहीं लगती. 

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खतरों का खेल- मिसाइल, ड्रोन और पैनी नजर, रेस्क्यू मिशन में गरुड़ कमांडो के सामने मौत हर कदम पर खड़ी होती है. 

दुश्मन का रडार- हेलीकॉप्टर को बहुत कम ऊंचाई (Tree-top level) पर उड़ना पड़ता है ताकि दुश्मन की मिसाइलें उसे लॉक न कर सकें. 

ड्रोन का पहरा- आज के दौर में छोटे-छोटे ड्रोन आसमान से निगरानी रखते हैं. गरुड़ कमांडो को 'एंटी-ड्रोन'गन और जैमर्स के साथ उस इलाके में उतरना पड़ता है. 

घात (Ambush)- अगर पायलट को ढूंढने में देरी हुई, तो दुश्मन वहां जाल बिछा सकता है. ऐसे में गरुड़ कमांडो को चंद मिनटों में 'फायर फाइट' करके पायलट को हेलीकॉप्टर में चढ़ाना होता है. 

होती है बहुत कठिन ट्रेनिंग

गरुड़ कमांडो फोर्स की ट्रेनिंग भारतीय सशस्त्र बलों में सबसे कठिन और लंबी ट्रेनिंग में गिनी जाती है. इनकी कुल ट्रेनिंग अवधि लगभग 72 हफ्ते (करीब 1.5 साल) होती है. इसमें अलग-अलग चरण शामिल होते हैं, जो आगे और स्पेशलाइजेशन के साथ बढ़ भी सकते हैं. 3 साल की ट्रेनिंग के बाद ही एक कमांडो पूरी तरह से ऑपरेशनल कमांडो बनता है.  

ट्रेनिंग के चरण- 

  • बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग एडवांस कमांडो ट्रेनिंग
  • स्पेशल स्किल ट्रेनिंग
  • पैराशूट जंप
  • जंगल और पहाड़ी युद्ध
  • काउंटर-टेरर ऑपरेशन
  • सर्वाइवल स्किल्स

हथियार चलाने में भी होते हैं माहिर 

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गरुड़ कमांडो कई तरह के हथियार चलाने में भी माहिर होते हैं. इनमें एके 47, आधुनिक एके-103, सिगसोर, तवोर असाल्ट राइफल, आधुनिक निगेव LMG और एक किलोमीटर तक दुश्मन का सफाया करने वाली गलील स्नाइपर शामिल हैं. 

कैसे होती है भर्ती?

अगर आप भी इस जांबाज टीम का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो इसके लिए एजुकेशन और फिजिकल क्राइटेरिया ये है:

योग्यता- भारतीय वायुसेना में अग्निवीर वायु के माध्यम से या IAF ऑफिसर (NDA/CDSE/AFCAT) के जरिए गरुड़ के लिए आवेदन किया जा सकता है. 

आयु- 17.5 से 21 वर्ष (अग्निवीर के लिए) और 20-24 साल (ऑफिसर्स के लिए) आवेदन कर सकते हैं. 

एजुकेशन क्वालिफिकेशन - 12वीं पास (फिजिक्स,मैथ्स और इंग्लिश में 50% अंकों के साथ) या इंजीनियरिंग/ग्रेजुएशन. 

सिलेक्शन- लिखित परीक्षा के बाद सबसे कठिन दौर फिजिकल फिटनेस टेस्ट और अडाप्टेबिलिटी टेस्ट का आयोजन. 

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