खुशखबरी: जर्मनी कर रहा 90,000 इंड‍ियंस की भर्ती, जॉब स‍िक्योरिटी के साथ होगी मोटी सैलरी

यूरोप का प्रमुख देश जर्मनी इन दिनों गंभीर वर्कफोर्स (श्रमिक) की कमी का सामना कर रहा है. तेजी से बढ़ती उम्रदराज आबादी, कम जन्म दर और उद्योगों की बढ़ती मांग के कारण वहां लाखों नौकरियां खाली पड़ी हुई हैं. इस संकट से निपटने के लिए अब जर्मनी ने भारत से मदद मांगी है.

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जर्मनी में युवाओं की कमी है जिसकी वजह से उन्होंने भारत से मदद मांगी है. (Photo: Pexels) जर्मनी में युवाओं की कमी है जिसकी वजह से उन्होंने भारत से मदद मांगी है. (Photo: Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 25 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 9:31 AM IST

अगर आप भी डिग्री हाथ में लेकर कम सैलरी वाली नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो यूरोप का सबसे ताकतवर देश जर्मनी आपके लिए 'रेड कार्पेट' बिछाकर इंतजार कर रहा है. जर्मनी इस समय इतिहास के सबसे बड़े वर्कफोर्स संकट से जूझ रहा है और इस खालीपन को भरने के लिए उसकी नजरें अब भारत के हुनरमंद युवाओं पर टिकी है.

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हैरानी की बात यह है कि जर्मनी को सिर्फ इंजीनियर या डॉक्टर ही नहीं, बल्कि बढ़ई, लोहार, बेकर और कसाई जैसे स्किल्ड कामगारों की भी सख्त जरूरत है. हालात ये हैं कि जर्मनी ने भारतीयों के लिए 'स्किल्ड वर्क वीजा' का कोटा 20,000 से बढ़ाकर सीधे 90,000 सालाना कर दिया है.

एक ईमेल और बदल गई हजारों की दुनिया

इस बड़े बदलाव की नींव साल 2021 में पड़ी, जब जर्मनी के फ्रीबर्ग में काम करने वाली 'वॉन अनगर्न-स्टर्नबर्ग' को भारत से एक साधारण सा ईमेल मिला. इसमें पूछा गया था कि क्या जर्मनी को भारत के उत्साही और वोकेशनल ट्रेनिंग चाहने वाले युवाओं की जरूरत है? उस समय जर्मनी में बुचर (कसाई) और बेकर जैसे पारंपरिक व्यवसायों के लिए लोग नहीं मिल रहे थे. वॉन ने इस प्रस्ताव को एक मौका दिया और 2022 में 'मैजिक बिलियन' एजेंसी के जरिए 13 भारतीय युवाओं का पहला जत्था जर्मनी पहुंचा. आज यह संख्या बढ़कर सैकड़ों में पहुंच चुकी है.

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क्यों जर्मनी को चाहिए 'देसी' हाथ?

जर्मनी की आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही है और वहां की 'बेबी बूमर' पीढ़ी अब रिटायर हो रही है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, जर्मनी को अपनी इकोनॉमी चलाने के लिए हर साल 2.88 लाख विदेशी कामगारों की जरूरत है. दूसरी तरफ, भारत में युवाओं की फौज है. यही वजह है कि दोनों देशों के बीच 2022 में एक साझेदारी हुई, जिससे अब भारतीयों के लिए वहां जाना बेहद आसान हो गया है.

'डिग्री के पीछे भागने से बेहतर है हुनर सीखना'

बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में दिल्ली की रहने वाली 20 साल की इशू गरिया की कहानी शेयर की है. ये कहानी उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो लीक से हटकर सोच रहे हैं. इशू ने कॉलेज की महंगी डिग्री और फिर कम सैलरी के संघर्ष को चुनने के बजाय जर्मनी जाने का फैसला किया.

आज इशू जर्मनी के ब्लैक फॉरेस्ट इलाके में एक 'बेकर' के रूप में काम कर रही हैं. उनकी सुबह 3 बजे शुरू होती है, कड़ाके की ठंड होती है, लेकिन वह खुश हैं. इशू कहती हैं कि मैं डिग्री पर पैसा बर्बाद करके कम सैलरी के लिए धक्के नहीं खाना चाहती थी. यहां मुझे अच्छी सैलरी मिलती है, जिससे मैं अपने परिवार की मदद कर पा रही हूं और यहां की हवा भी बहुत साफ है.

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इन क्षेत्रों में है नौकरियों की भरमार

  • सड़क निर्माण
  • मैकेनिक और टेक्नीशियन
  • बेकर और कसाई (Butchers)
  • पत्थर मिस्त्री (Stone Masons)
  • हेल्थकेयर और नर्सिंग

आंकड़ों में देखिए भारत का बढ़ता दबदबा

2015: महज 23,320 भारतीय
2024: 1,36,670 भारतीय कामगार

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