इंड‍िया वाले देख रहे US का सपना, अम‍ेर‍िका वाले भाग रहे बाहर....ये है टेक फील्ड का नया ट्रेंड 

एक तरफ भारतीयों में 'अमेरिकी सपना' इतना बड़ा है कि वे वहां पहुंचने के लिए जान जोखिम में डालकर 'डंकी रूट' जैसे खतरनाक रास्ते अपना रहे हैं. दूसरी तरफ, अमेरिका के अपने ही टॉप प्रोफेशनल्स अब उस चमक-धमक से तौबा कर रहे हैं. वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट खुलासा करती है कि भारी-भरकम सैलरी के बावजूद, छंटनी के डर और अस्थिरता ने वहां के दिग्गजों को यूरोप और फिनलैंड जैसे देशों में 'सुकून' और 'सुरक्षा' ढूंढने पर मजबूर कर दिया है.  

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aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 07 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 12:26 PM IST

दशकों तक दुनिया भर के टेक स्टूडेंट अमेरिका का सपना देखते हैं. उनके ल‍िए कामयाबी का सबसे बड़ा पैमाना जैसे अमेर‍िका बना हुआ है. हर सॉफ्टवेयर इंजीनियर और वैज्ञानिक का सपना होता था कि वो सिलिकॉन वैली जाए और डॉलर्स में कमाई करे. लेकिन अब हवा का रुख बदल चुका है. वॉल स्ट्रीट जर्नल (WSJ) की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के हाई-टेक प्रोफेशनल्स और STEM (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग, गणित) फील्ड के दिग्गज अब 'यूएस' छोड़कर यूरोप और नॉर्डिक देशों (जैसे फिनलैंड) का रुख कर रहे हैं.

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हैरान करने वाली बात यह है कि ये पलायन ज्यादा पैसे के लिए नहीं, बल्कि 'स्थायित्व' (स्टेबिल‍िटी) और 'नौकरी की सुरक्षा' के लिए हो रहा है.

'सबसे खुशहाल देश' फिनलैंड की नई पुकार
हाल ही में मैसाचुसेट्स के कैम्ब्रिज में एक दिलचस्प नजारा दिखा. करीब दो दर्जन टेक प्रोफेशनल्स एक प्रेजेंटेशन को बड़े गौर से देख रहे थे. विषय था, 'फिनलैंड में अपना करियर दोबारा कैसे शुरू करें?' फिनलैंड सरकार के 'वर्क इन फिनलैंड' प्रोग्राम ने उन्हें वो ऑफर दिया जो आज अमेरिका नहीं दे पा रहा. महज दो हफ्ते में रेजिडेंस परमिट और सरकार की तरफ से हेल्थकेयर व चाइल्डकेयर पर भारी सब्सिडी.

क्यों टूट रहा है 'अंकल सैम' से मोह?

राजनीतिक अस्थिरता: बार-बार होने वाले फेडरल शटडाउन और रिसर्च फंडिंग में कटौती ने वैज्ञानिकों के मन में असुरक्षा पैदा कर दी है. उन्हें डर है कि उनकी बरसों की मेहनत एक राजनीतिक फैसले से मिट्टी में मिल सकती है.

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AI और छंटनी का खौफ: एआई (AI) इंजीनियर एमिलियो गार्सिया जैसे युवाओं का मानना है कि अमेरिकी कंपनियां एआई के नाम पर बड़े पैमाने पर छंटनी की तैयारी में हैं. यहां भविष्य 'सुरक्षित' नहीं, बल्कि 'संदेह' में लगता है.

सोशल सेफ्टी नेट का अभाव: फिनलैंड और जर्मनी जैसे देशों में अगर आप बीमार पड़ते हैं या नौकरी जाती है, तो सरकार आपका हाथ थाम लेती है. इसके उलट, अमेरिका का 'हायर एंड फायर' कल्चर अब युवाओं को डराने लगा है.

'सैलरी कम मंजूर, पर सड़क पर नहीं सोना'
विदेशी जमीन पर जाने का मतलब है कम सैलरी, ज्यादा टैक्स और एक बिल्कुल नई भाषा. फिर भी लोग जाने को बेताब हैं. वॉल स्ट्रीट जनरल में एआई इंजीनियर एमिलियो कहते हैं कि जब सरकार रिसर्च और सोशल प्रोग्राम्स से हाथ खींच रही हो, तो यहां रुककर क्या करेंगे? वहीं टेरेल मेट्सोवुरी का कहना है कि फिनलैंड में कोई बेघर होकर सड़क पर नहीं सोता. वहां एक सिस्टम है, एक भरोसा है.

क्या वाकई 'घास दूसरी तरफ ज्यादा हरी' है?
बेशक, अमेरिका छोड़ना इतना आसान नहीं है. वहां का 'रिस्क-रिवॉर्ड' कल्चर उन लोगों के लिए आज भी 'चुंबक' है जो बहुत तेजी से अमीर बनना चाहते हैं. फिनलैंड उन लोगों के लिए है जो एक 'नॉर्मल' और सुरक्षित जिंदगी चाहते हैं. टैक्स का बोझ और बच्चों की पढ़ाई के बीच तालमेल बिठाना आज भी एक बड़ी चुनौती है.

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