हम अक्सर सुनते हैं कि सफलता समय और मेहनत मांगती है. कई लोगों के लिए यह बस किताबों में लिखी एक अच्छी लगने वाली बात होती है लेकिन कुछ लोगों के लिए हकीकत. यह कहानी भी एक ऐसे ही शख्स की है जिसने रातों-रात अमीर बनने का ख्वाब नहीं देखा बल्कि अपनी रातों की नींद और दिन का सुकून दांव पर लगाकर फर्श से अर्श तक का सफर तय किया. जो कभी 15,000 रुपये की इंटर्नशिप करता था वह कैसे गूगल में करोड़ों का मालिक बन बैठा.
मशहूर एंटरप्रेन्योर और कंटेंट क्रिएटर अंकुर वारिकू ने हाल ही में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की स्टोरी शेयर की है, जो इन दिनों आग की तरह वायरल हो गई है. हर कोई इस पर चर्चा कर रहा है. टेक की दुनिया में कामयाबी का कोई शॉर्टकट नहीं होता है. हम अक्सर लोगों की आज की चमक देखते हैं, लेकिन उसके पीछे छिपे सालों के संघर्ष और खामोश मेहनत को भूल जाते हैं. यह इस बात का सबूत है कि करियर की असली ऊंचाई रातों-रात नहीं मिलती, बल्कि यह धीरे-धीरे हर रोज किए गए प्रयासों से आती है.
छोटे से की करियर की शुरुआत
इस इंजीनियर ने अपने करियर की शुरुआत एक सिंपल से माहौल में की जहां उसने एक छोटी कंपनी में इंटर्न के रूप में काम किया. उस समय सैलरी कम थी और अवसर लिमिटेड थे लेकिन उन्होंने अपने स्किल को निखारने और एक मजबूत नींव बनाने पर ध्यान लगाया. उनकी ये मेहनत रंग लाई जब उन्हें गूगल में हाई सैलरी वाली नौकरी मिली, जहां उनकी सैलरी 15 हजार से बढ़कर 7.5 करोड़ के सालाना पैकेज में बदल गया.
स्किल के लिए जरूरी है प्रैक्टिस
अंकुर वारिकू ने अपने पोस्ट में बताया कि इस इंजीनियर की कामयाबी कोई तुक्का नहीं थी बल्कि इसके पीछे एक पक्की प्लानिंग और कड़ी मेहनत थी. उन्होंने अपने करियर की सफलता के लिए तीन बड़े कदम उठाए-
कोडिंग की प्रैक्टिस- उन्होंने अपनी स्किल को इंप्रूव करने के लिए LeetCode जैसे प्लेटफॉर्म पर करीब 500 कोडिंग चैलेंज सॉल्व किए. यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई खिलाड़ी मैदान पर उतरने से पहले हजारों घंटे नेट प्रैक्टिस करता है, ताकि इंटरव्यू के समय कोई भी सवाल उन्हें अटका न सके.
दुनिया के साथ मिलकर सीखना- उन्होंने खुद को केवल अपनी नौकरी तक सीमित नहीं रखा बल्कि करीब 12 ओपन-सोर्स प्रोजेक्ट्स पर काम किए. इससे उन्हें घर बैठे दुनिया भर के दिग्गज डेवलपर्स के साथ काम करने और असल दुनिया की तकनीकी समस्याओं को सुलझाने का मौका मिला. इसी अनुभव ने उन्हें भीड़ से अलग खड़ा कर दिया.
बदलाव से नहीं डरे- उन्होंने एक और साहसिक फैसला लिया. हर दो साल में कंपनी बदलने का. यह कदम उन्होंने सिर्फ सैलरी बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि खुद को नई चुनौतियों में झोंकने के लिए उठाया. हर नई कंपनी के साथ उन्हें नया सीखने को मिला और उनका पद और पैसा दोनों बढ़ते गए.
सफलता के लिए नहीं है कोई शॉर्टकट
अंकुर वारिकू, जो खुद इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (ISB) जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से पढ़े हैं, हमेशा से इस बात पर जोर देते आए हैं कि असली कामयाबी रातों-रात नहीं बल्कि धीरे-धीरे हुनर निखारने से मिलती है. वे सिर्फ बातें ही नहीं करते बल्कि युवाओं को सिखाने के लिए कई बड़े कदम भी उठा रहे हैं-
सिखाने का जज्बा: उन्होंने वेबवेदा नाम का एक लर्निंग प्लेटफॉर्म बनाया है, जहां दुनिया भर के करीब 4.8 लाख से ज्यादा लोग अपना करियर संवारने और खुद को बेहतर बनाने की स्किल सीख रहे हैं.
होनहारों को सहारा: उन्होंने इंडिया जीनियस चैलेंज नाम की एक स्कॉलरशिप भी शुरू की है. इसके जरिए वे देश के होनहार छात्रों को 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद दे रहे हैं ताकि पैसों की कमी उनके सपनों के बीच न आए.
इस सॉफ्टवेयर इंजीनियर की पूरी कहानी हमें करियर का एक बहुत ही सादा मगर जरूरी सबक सिखाती है कि टेक्नोलॉजी की दुनिया में लॉटरी नहीं लगती बल्कि मेहनत लगती है. यहां सफलता तब मिलती है जब आप हर रोज थोड़ा-थोड़ा सीखते हैं, अनुशासन के साथ प्रैक्टिस करते हैं और सही समय पर सही फैसले लेते हैं.
आजतक एजुकेशन डेस्क