इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में उर्दू पत्रकारिता कोर्स की प्रवेश परीक्षा को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कानूनी मोड़ ले चुका है. परीक्षा की लिपि को लेकर उठे इस मामले पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने संस्थान को नोटिस जारी किया है और एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है. इस पूरे विवाद ने हिंदी और उर्दू भाषा को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है.
दरअसल, याचिका दायर करने वाले छात्रों का आरोप है कि उर्दू पत्रकारिता कोर्स की प्रवेश परीक्षा में लिपि को लेकर जो बदलाव किए गए हैं या जो नियम तय किए गए हैं,वे उर्दू भाषा के छात्रों के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं. उनका कहना है कि उर्दू पत्रकारिता जैसे कोर्स में भाषा और उसकी मूल लिपि का सम्मान होना चाहिए. छात्रों का यह भी मानना है कि अगर परीक्षा प्रक्रिया में स्पष्टता नहीं होगी, तो इससे कई अभ्यर्थियों के भविष्य पर असर पड़ सकता है.
परीक्षा तक सीमित नहीं है मामला
याचिकाकर्ता छात्रों की ओर से अदालत में पेश हुए वकील अभिषेक ने कहा कि यह मामला केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है,बल्कि यह भाषाई पहचान, समान अवसर और शिक्षा के अधिकार से भी जुड़ा भी हुआ है. उन्होंने अदालत से मांग की कि छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर संवेदनशीलता के साथ फैसला लिया जाए. इस विवाद के सामने आने के बाद शिक्षा और मीडिया जगत में भी चर्चा तेज हो गई है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में भाषाओं और लिपियों का सम्मान बनाए रखना बेहद जरूरी है. खासकर पत्रकारिता जैसे क्षेत्र में भाषा की विविधता को सुरक्षित रखना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी अहम माना जाता है.
क्या है पूरा विवाद?
छात्रों के वकील ने बताया कि ये मामला कुछ छात्रों से जुड़ा हुआ है जिन्होंने IIMC में उर्दू पत्रकारिता में एडमिशन के लिए फॉर्म भरा था. IIMC में पहले 27 अप्रैल को एक सूचना जारी की थी जिसके तहत उर्दू पत्रकारिता के पीजी डिप्लोमा में एडमिशन लेने के लिए उर्दू और देवनागरी दोनों में परीक्षा दे सकते थे लेकिन 6 मई को एक नया नोटिफिकेशन जारी हुआ जो कहता है कि परीक्षा सिर्फ उर्दू में कराई जाएगी, हिंदी का यहां पर कोई जिक्र नहीं. कई बच्चे ने फीस पेमेंट भी कर दी है, जो देवनागरी भाषा में परीक्षा देना चाहते थे, अब उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया है.
संजय शर्मा