ट्रंप का सबसे खतरनाक मिशन... जब ईरान से 450 KG यूरेनियम छीनने उतरेगी US आर्मी

ईरान के यूरेनियम भंडार को ज़ब्त करने की अमेरिका की एक बेहद जोखिम भरे मिलिट्री एक्शन पर विचार किया जा रहा है. इससे पहले से ही अस्थिर चल रहे इस संघर्ष में दांव और ऊंचे हो गए हैं, क्योंकि एक तरफ कूटनीति काम कर रही है, तो दूसरी तरफ पर्दे के पीछे चुपचाप सैन्य विकल्प आकार ले रहे हैं.

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ईरान 10 से 11 परमाणु बम बनाने की क्षमता रखता है. (Photo:X) ईरान 10 से 11 परमाणु बम बनाने की क्षमता रखता है. (Photo:X)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:22 PM IST

वाशिंगटन में राष्ट्रपति ट्रंप ईरान में एक बहुत ही जोखिम भरे मिलिट्री ऑपरेशन पर विचार कर रहे हैं. कुछ खुफिया अधिकारियों ने बताया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्या अमेरिकी सेना को ईरान भेजकर ईरान की सबसे बेशकीमती चीज 453.5 किलोग्राम एनरिच्ड यूरेनियम पर कब्जा कर लिया जाए. ये यूरेनियम ही है जिसके लिए ईरान इतनी लंबी जंग लड़ रहा है, अपने टॉप नेताओं, मिलिट्री कमांडर्स की कुर्बानी दे चुका है. अमेरिका इसी साढ़े चार क्विंटल यूरेनियम को हर हाल में हासिल करना चाहता है. 

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वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार अगर इस प्रस्तावित मिशन को मंजूरी मिल जाती है तो अमेरिकी सैनिक कई दिनों तक और शायद उससे भी ज़्यादा समय तक ईरान की धरती पर मौजूद रहेंगे. यह कदम मौजूदा संघर्ष में एक बहुत बड़ी तेज़ी का संकेत होगा. 

अधिकारियों ने बताया कि अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है, लेकिन इस ऑप्शन को लेकर ट्रंप के विचार खुले हैं, क्योंकि यह ट्रंप के टारगेट के अनुरूप है. ट्रपं चाहते हैं कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार विकसित न कर पाए. लेकिन उनके सामने इस ऑपरेशन में शामिल होने वाले अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं भी हैं. 

453.5 किग्रा 60% enriched से लगभग 10-11 बम बनाए जा सकते हैं. हालांकि यह सैद्धांतिक अनुमान है और असलियत थोड़ा बहुत कम या ज्यादा हो सकता है. 

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राष्ट्रपति ट्रंप ने एक कूटनीतिक विकल्प पर भी ज़ोर दिया है और अपने सलाहकारों से कहा है कि वे ईरान पर दबाव डालें कि वह युद्ध खत्म करने के लिए एक बड़े समझौते के तहत वह सामग्री सौंप दे. हालांकि उन्होंने निजी बातचीत में यह साफ कर दिया है कि "ईरानी लोग वह मैटेरियल अपने पास नहीं रख सकते", और अगर बातचीत नाकाम रहती है तो यूरेनियम को जबरन भी हासिल करने की संभावना पर भी विचार किया जा सकता है. 

रविवार रात को ट्रंप ने एक कड़ा अल्टीमेटम देते हुए पत्रकारों से कहा कि ईरान को अमेरिका की मांगें माननी ही होंगी, वरना "उनके पास कोई देश ही नहीं बचेगा." यूरेनियम का ज़िक्र करते हुए उन्होंने आगे कहा, "वे हमें वह न्यूक्लियर डस्ट सौंप देंगे."

कहां रखा है ईरान का ये सबसे सीक्रेट चीज

पिछले साल जून में अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हवाई हमलों से पहले यह माना जाता था कि ईरान के पास 60 प्रतिशत तक  अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (Highly enriched uranium) 400 किलोग्राम से ज़्यादा और 20 प्रतिशत फिजन मैटेरियल लगभग 200 किलोग्राम थी.

IAEA के चीफ राफेल ग्रॉसी के अनुसार यह भंडार संभवतः उन दो मुख्य जगहों पर केंद्रित है जिन्हें उन हमलों में निशाना बनाया गया था. इस्फहान में एक भूमिगत सुरंग और नतान्ज में एक प्लांट में.  विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो ईरान के पास नए भूमिगत संवर्धन केंद्र स्थापित करने की क्षमता अभी भी मौजूद है. 

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कितना कठिन हो सकता है यह ऑपरेशन

सैन्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यूरेनियम पर कब्जा करने का कोई भी प्रयास हाल के वर्षों में अमेरिका द्वारा किए गए सबसे जटिल अभियानों में से एक होगा. 

अमेरिकी सेनाओं को ऐसे शत्रु-क्षेत्र में प्रवेश करना होगा, जहां उन्हें ईरानी हवाई सुरक्षा प्रणालियों, ड्रोन और मिसाइलों से खतरा होगा. एक बार ज़मीन पर पहुंचने के बाद, सैनिक उस क्षेत्र की घेराबंदी करके उसे सुरक्षित करेंगे, जबकि विशेष टीमें मलबे, बारूदी सुरंगों और दूसरे ट्रैप  से बचते हुए उस यूरेनियम की तलाश करेंगी. 

माना जाता है कि ये यूरेनियम 40 से 50 खास सिलेंडरों में रखा है. अगर अमेरिकी सेना इन यूरेनियम पर कब्जा कर भी लेती है तो उसे फिर सुरक्षित इक्विपमेंट  में सुरक्षित रूप से ले जाना होगा, जिसके लिए शायद कई गाड़ियों की ज़रूरत पड़ सकती है. 

US सेंट्रल कमांड के पूर्व कमांडर जोसेफ वोटेल ने कहा, “यह कोई ऐसा काम नहीं है जो झटपट हो जाए.”

जमीनी हालात के आधार पर, इस मिशन में कई दिन या शायद एक हफ्ता भी लग सकता है. अगर जहां से यूरेनियम की बरामदगी होती है और वहां कोई सही हवाई अड्डा उपलब्ध नहीं है, तो सेनाओं को साज़ो-सामान लाने-ले जाने और उस सामग्री को निकालने के लिए खुद एक हवाई अड्डा बनाना पड़ सकता है. 

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खूनी जंग का अंदेशा

एनरिच्ड यूरेनियम ईरान के वजूद का सवाल है, जानकारों ने चेतावनी दी है कि इस तरह के किसी भी ऑपरेशन से ईरान की तरफ से जवाबी कार्रवाई हो सकती है, और यह संघर्ष उस 4 से 6 हफ़्ते की समय-सीमा से भी आगे खींच सकता है. ट्रंप की टीम ने इसका जिक्र सार्वजनिक तौर पर किया था. 

इसके साथ ही प्रशासन के कुछ लोग एक लंबे युद्ध से बचना चाहते हैं. खास तौर पर तब जब मध्यावधि चुनाव नज़दीक आ रहे हैं और देश के भीतर राजनीतिक दबाव भी बढ़ रहा है. 

जारी हैं सैन्य तैयारियां

इस क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सेनाएं पहले से ही कई तरह की स्थितियों से निपटने की तैयारी कर रही हैं. अधिकारियों ने बताया कि इन विकल्पों में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती, मरीन की 'रैपिड रिस्पॉन्स यूनिट' को तैनात करना और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जगहों को सुरक्षित करने के लिए '82वीं एयरबोर्न डिवीज़न' के पैराट्रूपर्स को सक्रिय करना शामिल है.

पेंटागन अपनी ऑपरेशनल क्षमता को बढ़ाने के लिए, जमीन पर लड़ने वाले 10,000 तक अतिरिक्त सैनिकों को भेजने पर भी विचार कर रहा है. 

अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इस महीने की शुरुआत में संकेत दिया था कि वॉशिंगटन बातचीत से हल निकालने को प्राथमिकता देता है, लेकिन उसके पास सैन्य विकल्प भी मौजूद हैं.

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उन्होंने 13 मार्च को कहा, "राष्ट्रपति ने अपना ध्यान परमाणु क्षमताओं पर केंद्रित रखा है." "हमारे पास कई विकल्प हैं, और हम ईरान के इस फ़ैसले का स्वागत करेंगे कि वे इन क्षमताओं को छोड़ देंगे."

कूटनीतिक रास्ता अब भी खुला है

शांतिपूर्ण समाधान अब भी संभव है. अमेरिका ने पहले भी दूसरे देशों से एनरिच्ड यूरेनियम हटाने की प्रक्रिया की देखरेख की है, जिनमें 1994 में कज़ाकिस्तान और 1998 में जॉर्जिया शामिल हैं.

अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था से जमीन पर किसी जोखिम भरे सैन्य अभियान की जरूरत खत्म हो जाएगी. हालांकि कोई सीधी बातचीत न होने और दोनों पक्षों के रुख सख़्त होने के कारण कूटनीति के लिए उपलब्ध समय का दायरा शायद सिकुड़ता जा रहा है. 

फिलहाल फैसला ट्रंप के हाथ में है, जबकि सैन्य योजनाकार उस अभियान की तैयारी में जुटे हैं जो इस संघर्ष का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट बन सकता है. 

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