फाइटर जेट संकट से जूझ रही एयरफोर्स... राफेल पर फिर भारत-फ्रांस के बीच डील की तैयारी

भारत और फ्रांस के बीच अतिरिक्त राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद पर बातचीत तेज हो गई है. वायुसेना सरकार से सरकार के बीच डील के जरिए राफेल को अंतरिम समाधान मान रही है, जबकि फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के भारत दौरे से पहले इस सौदे को लेकर राजनीतिक और रणनीतिक गतिविधि बढ़ गई है.

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फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के भारत दौरे से पहले राफेल डील पर बातचीत तेज हो गई. (Photo: PTI) फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों के भारत दौरे से पहले राफेल डील पर बातचीत तेज हो गई. (Photo: PTI)

शिवानी शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 11 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:01 AM IST

भारतीय वायुसेना की घटती लड़ाकू क्षमता और स्क्वाड्रन संकट के बीच भारत और फ्रांस के बीच राफेल फाइटर जेट की अतिरिक्त खरीद को लेकर बातचीत तेज हो गई है. रक्षा सूत्रों के मुताबिक, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के अगले महीने होने वाले भारत दौरे से पहले इस फॉलो-ऑन राफेल डील पर गंभीर मंथन चल रहा है.

दरअसल, भारतीय वायुसेना की लड़ाकू स्क्वाड्रन संख्या लगातार घटने से चिंता गहराती जा रही है. रक्षा सूत्रों के मुताबिक, वायुसेना ने सरकार से सरकार (G2G) के आधार पर फ्रांस से और राफेल विमान खरीदने का मजबूत पक्ष रखा है. यह बातचीत ऐसे समय में हो रही है, जब एयरफोर्स की स्क्वाड्रन संख्या घटकर 29 रह गई है, जबकि स्वीकृत संख्या 42.5 स्क्वाड्रन है. चीन और पाकिस्तान से संभावित दोहरे मोर्चे की चुनौती को देखते हुए यह स्थिति बेहद गंभीर मानी जा रही है. एक स्क्वाड्रन में आमतौर पर 16 से 18 फाइटर जेट होते हैं.

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रक्षा अधिकारियों के मुताबिक, MiG-21 बेड़े के पिछले साल रिटायर होने के बाद हालात और बिगड़ गए. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी यह कमी साफ तौर पर सामने आई, जिसने संयुक्त खतरे की स्थिति में एयरफोर्स की क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए.

वायुसेना लंबे समय से मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) प्रोग्राम के तहत 114 आधुनिक लड़ाकू विमानों की खरीद की योजना पर काम कर रही है. इस परियोजना की अनुमानित लागत 1.2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है, लेकिन बीते 7–8 साल से यह योजना प्रक्रियागत देरी और प्राथमिकताओं में बदलाव के चलते अटकी हुई है.

इसी बीच वायुसेना राफेल को सबसे तेज और व्यावहारिक अंतरिम समाधान के तौर पर देख रही है, क्योंकि यह विमान पहले से ही एयरफोर्स में ऑपरेशनल है. एक रक्षा सूत्र ने कहा कि अंतिम फैसला तब लिया जाएगा, जब MRFA प्रस्ताव डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) के सामने जाएगा, लेकिन वायुसेना ने अपनी तात्कालिक ऑपरेशनल जरूरत साफ तौर पर रख दी है.

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'मेक इन इंडिया' पर जोर

सूत्रों के मुताबिक, अगर राफेल की अतिरिक्त डील होती है तो उसमें 'मेक इन इंडिया' का मजबूत पहलू होगा. भारत पहले ही नौसेना के लिए 24 राफेल-एम विमानों का सौदा कर चुका है, जो कीमत और कॉन्ट्रैक्ट के लिहाज से एयरफोर्स के लिए बेंचमार्क बन सकता है.

भारत और फ्रांस के बीच औद्योगिक सहयोग भी तेजी से बढ़ रहा है. टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) और डसॉल्ट एविएशन के बीच हैदराबाद में राफेल फ्यूजलेज सेक्शन के निर्माण के लिए साझेदारी हो चुकी है. यह प्लांट FY 2028 तक पहले कंपोनेंट्स की डिलीवरी शुरू कर सकता है और सालाना 24 फ्यूजलेज तक उत्पादन क्षमता रखेगा.

इसके अलावा हैदराबाद में इंजन मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी और उत्तर प्रदेश के जेवर में मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल (MRO) हब की योजनाएं भी चल रही हैं. इन सभी पहलों के जरिए भविष्य में राफेल की करीब 60 प्रतिशत मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू भारत में लाने की तैयारी है.

मैक्रों के दौरे पर टिकी नजर

रक्षा अधिकारियों का मानना है कि ऑपरेशनल जरूरत, इंडस्ट्रियल तैयारियां और उच्चस्तरीय राजनीतिक संवाद एक साथ आने से इस डील पर आगे बढ़ने का माहौल बना है. हालांकि अभी किसी औपचारिक ऐलान की उम्मीद नहीं है, लेकिन मैक्रों के भारत दौरे के दौरान राफेल से जुड़े मुद्दे अहम एजेंडे में रहेंगे. किसी भी अंतिम समझौते के लिए DAC की मंजूरी, लागत पर बातचीत और कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की स्वीकृति जरूरी होगी.

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तेजस Mk1A की देरी से बढ़ा दबाव

वायुसेना की मुश्किलें स्वदेशी LCA तेजस Mk1A की डिलीवरी में देरी से और बढ़ गई हैं. एयरफोर्स ने 83 Mk1A विमानों का ऑर्डर दिया है और 97 अतिरिक्त जेट्स को DAC पहले ही मंजूरी दे चुका है. लेकिन सप्लाई चेन, इंजन उपलब्धता और प्रोडक्शन रैंप-अप से जुड़ी दिक्कतों के चलते डिलीवरी शेड्यूल खिसक गया है.

वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह भी सार्वजनिक रूप से इस देरी पर चिंता जता चुके हैं. उनका कहना है कि MiG-21 जैसे पुराने प्लेटफॉर्म्स के चरणबद्ध रिटायरमेंट से पैदा हुई क्षमता की खाई Mk1A की देरी से और चौड़ी हो गई है. इसी वजह से एयरफोर्स को राफेल जैसे अंतरिम समाधानों पर ज्यादा निर्भर होना पड़ रहा है.

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