दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे संगठित साइबर सिंडिकेट का पर्दाफाश किया है, जिसने शेयर बाजार में निवेश के नाम पर देशभर के निवेशकों से लगभग 99.77 करोड़ रुपये की ठगी की. इस गिरोह का सरगना रवि राठौर है, जो एक कंप्यूटर साइंस इंजीनियर है और एक मल्टीनेशनल कंपनी (MNC) में सालाना 30 लाख रुपये के पैकेज पर काम कर रहा था. कई राज्यों में चलाए गए एक ऑपरेशन के बाद उसे बेंगलुरु से उसके दो साथियों के साथ गिरफ्तार किया गया.
जांचकर्ताओं के अनुसार, इस गिरोह ने पीड़ितों को ट्रेडिंग के नाम पर पैसे लगाने के लिए लुभाने के लिए एक नकली मोबाइल ऐप और एक फर्जी वेबसाइट का इस्तेमाल किया. वे पीड़ितों को भारी और गारंटीड मुनाफे का वादा करते थे.
DCP सेंट्रल रोहित राजवीर सिंह ने एक बयान में कहा, "इस धोखाधड़ी का खुलासा तब हुआ जब पहाड़गंज के एक निवासी ने 'नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल' पर शिकायत दर्ज कराई. उसने आरोप लगाया था कि एक नकली ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के जरिए उसके साथ ठगी की गई है."
शिकायतकर्ता को कुछ अनजान लोगों के फोन और मैसेज आए, जिन्होंने उसे वह मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए मनाया. धोखेबाजों ने दावा किया कि उनकी कंपनी शेयर बाजार में हाई टेक सॉफ्टवेयर-आधारित तकनीकों का इस्तेमाल करती है और उन्होंने शिकायतकर्ता को भरोसा दिलाया कि उसके इन्वेस्टमेंट से बिना किसी वित्तीय जोखिम के भारी मुनाफा होगा. उनके दावों पर भरोसा करके, शिकायतकर्ता ने अलग-अलग ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम के जरिए कई बार में कुल 10,000 रुपये ट्रांसफर कर दिए.
शुरुआत में App रोजाना नकली मुनाफा दिखाता था ताकि पीड़ित का भरोसा जीता जा सके और उसे और पैसे लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके. DCP ने कहा, "लेकिन जब भी पीड़ित पैसे निकालने की कोशिश करता था, तो उससे अलग-अलग बहाने बनाकर, जैसे कि टैक्स, अकाउंट एक्टिवेशन और प्रोसेसिंग चार्ज के नाम पर, और पैसे जमा करने के लिए कहा जाता था."
पुलिस ने बताया कि साइबर धोखाधड़ी से जुड़ी सरकारी चेतावनियों को देखने के बाद शिकायतकर्ता को शक हुआ. उसने तुरंत इस मामले की सूचना दी, जिसके बाद 1 मई को एक FIR दर्ज की गई.
जांच के दौरान पुलिस ने बड़े पैमाने पर तकनीकी विश्लेषण, डिजिटल निगरानी, वित्तीय लेन-देन की जांच, IP ट्रैकिंग और सर्वर लॉग विश्लेषण किया.
ऑपरेशन 'बेंगलुरु टू सनावद'
जांच से पता चला कि इस फर्जी ऐप का 'बैकएंड इंफ्रास्ट्रक्चर' और 'कंट्रोल पैनल' कर्नाटक के बेंगलुरु से चलाया जा रहा था, जबकि कॉलिंग ऑपरेशन और पैसे के लेन-देन का तार मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के सनावद से जुड़ा हुआ था.
पुलिस ने बताया कि कर्नाटक और मध्य प्रदेश में आरोपियों का पता लगाने और उन्हें गिरफ्तार करने के लिए एक साथ दो टीमें बनाई गईं. एक टीम ने टेक्निकल सर्विलांस और डिजिटल इंटेलिजेंस इनपुट के जरिए बेंगलुरु में रवि राठौर को ट्रैक किया. उसे 3 मई को गिरफ़्तार कर लिया गया और पुलिस ने उसके कब्जे से दो लैपटॉप, एक मोबाइल फोन और एक SUV बरामद की, जिनके बारे में आरोप है कि उन्हें अपराध से कमाए गए पैसों से खरीदा गया था.
एक दूसरी टीम ने सनावद में छापे मारे और 5 मई को सह-आरोपी सुदामा और विकास राठौड़ को गिरफ्तार कर लिया. उस जगह की तलाशी के दौरान, जिसका कॉल सेंटर के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा था, पुलिस ने 17 मोबाइल फोन, 5 कंप्यूटर, 13 SIM कार्ड, बैंक अकाउंट की डिटेल्स, ATM कार्ड और हजारों संभावित पीड़ितों की डिटेल्स वाला डिजिटल डेटा बरामद किया.
पुलिस ने बताया कि आरोपियों ने एक संगठित अंतर-राज्यीय साइबर धोखाधड़ी सिंडिकेट बनाया था, जो खास तौर पर उन लोगों को निशाना बनाता था जिनकी ऑनलाइन शेयर बाजार में निवेश करने में दिलचस्पी थी.
महिला कॉलर्स का जाल
पुलिस ने बताया कि कॉल सेंटर में जान-बूझकर महिला कॉलर्स को नौकरी पर रखा गया था, ताकि वे पुरुष पीड़ितों को प्रभावित कर सकें और उन्हें बड़ी रकम निवेश करने के जाल में फंसा सकें.
एक पुलिस अधिकारी ने बताया, "रवि राठौर एक कंप्यूटर साइंस इंजीनियर है, जिसने पहले कई इंटरनेशनल सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कंपनियों के साथ काम किया है और हाल ही में एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी कर रहा था. पूछताछ के दौरान उसने बताया कि उसे मोबाइल एप्लिकेशन डेवलपमेंट और बैकएंड ऑपरेशंस में महारत हासिल है''
पुलिस ने बताया कि राठौर की मुलाकात सुदामा से एक रिश्तेदार के जरिए हुई थी और उन दोनों ने मिलकर एक नकली ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म बनाने की साजिश रची, जो असली निवेश एप्लिकेशन्स जैसा दिखता था.
ठगी का हाई-टेक तरीका
राठौर ने नकली एप्लिकेशन और धोखाधड़ी वाली वेबसाइट को बनाया और उसका रखरखाव किया; नकली पहचान का इस्तेमाल करके उसे अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर अपलोड किया और प्लेटफ़ॉर्म को असली दिखाने के लिए उसके रिव्यू और टेक्निकल इंफ्रास्ट्रक्चर में हेरफेर किया.
पुलिस ने बताया कि सुदामा ने इस पूरे सेटअप के लिए पैसे का इंतजाम किया और उसका ऑपरेशनल मैनेजमेंट संभाला, जबकि विकास राठौड़ जिसे पहले कॉल सेंटर्स में काम करने का अनुभव था, उसने पीड़ितों से बातचीत करने, उन्हें फोन करने और निवेशकों को निवेश के लिए लुभाने का काम संभाला.
आरोपियों ने जान-बूझकर पीड़ितों को शुरू में छोटी रकम निवेश करने के लिए राजी किया, ताकि उन पर किसी को शक न हो और उनके खिलाफ शिकायत दर्ज होने की संभावना कम हो जाए.
DCP ने बताया, "आरोप है कि यह सिंडिकेट पीड़ितों की रिएक्शंस और अपने ऑपरेशनल अनुभव के आधार पर एप्लिकेशन और वेबसाइट को लगातार अपडेट करता रहता था, ताकि यह धोखाधड़ी और भी ज्यादा भरोसेमंद लगे."
एडमिन पैनल और बैकएंड डेटा की टेक्निकल जांच से पता चला कि इस नकली प्लेटफ़ॉर्म के जरिए लगभग 636 पीड़ितों के अकाउंट बनाए गए थे और उन्हें ऑपरेट किया जा रहा था. जांचकर्ताओं को लगभग 14,232 ऐसे ट्रांजैक्शन भी मिले, जिनमें धोखाधड़ी से हासिल की गई कुल रकम लगभग 99.77 करोड़ रुपये थी. धोखाधड़ी से कमाए गए पैसे को आरोपियों के बीच, इस ऑपरेशन में उनकी भूमिका के हिसाब से बांटा गया था.
काली कमाई का निवेश
DCP ने आगे बताया, 'राठौड़ ने इस कमाई के कुछ हिस्से का इस्तेमाल इंदौर में फ्लैट और दूसरी प्रॉपर्टी खरीदने के साथ-साथ महंगी गाड़ियां खरीदने में किया; इनमें वह SUV भी शामिल है जो छापेमारी के दौरान बरामद हुई थी.'"
पुलिस को यह भी पता चला कि सुदामा ने इस कमाई का कुछ हिस्सा स्थानीय क्रिकेट टूर्नामेंट करवाने में खर्च किया था और वह एक टेनिस बॉल क्रिकेट टीम से भी जुड़ा हुआ था.
पुलिस ने बताया कि इन आरोपियों के अलग-अलग राज्यों में हुए कई ऐसे ही साइबर धोखाधड़ी के मामलों में शामिल होने का शक है. सभी पीड़ितों की पहचान करने, पैसे के लेन-देन का पता लगाने और 'म्यूल बैंक खातों' का पता लगाने के लिए जांच चल रही है.
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