ईरान और अमेरिका के बीच दुश्‍मनी के 40 साल

सदियों से गरीबी का दंश झेल रहे अरब देशों में तेल और गैस के भंडार किसी नेमत की तरह निकले थे. जो उनकी गरीबी और पिछड़ेपन को दूर करने जा रहे थे. मगर ऊपर वाले की इन नेमतों पर नज़र पश्चिमी देशों की भी थी.

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ईरान के तेल और गैस पर दुनिया के कई देशों की नजरें लगी थीं ईरान के तेल और गैस पर दुनिया के कई देशों की नजरें लगी थीं

परवेज़ सागर

  • नई दिल्ली,
  • 22 जुलाई 2019,
  • अपडेटेड 3:13 PM IST

साल 1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद सबसे पहला शिकार राजधानी तेहरान में अमेरिकी दूतावास ही बना था. हज़ारों लाखों छात्रों की भीड़ ने अमेरिकी दूतावास पर चढ़ाई कर दी और वहां काम कर रहे अमेरिकी अधिकारियों और कर्मचारियों को बंधक बना लिया. उनकी एक ही मांग थी, अमेरिका फौरन मोहम्मद रज़ा पहेलवी को ईरान वापस भेजे ताकि ये मुल्क उसके किए का उससे हिसाब ले सके.

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सदियों से गरीबी का दंश झेल रहे अरब देशों में तेल और गैस के भंडार किसी नेमत की तरह निकले थे. जो उनकी गरीबी और पिछड़ेपन को दूर करने जा रहे थे. मगर ऊपरवाले की इन नेमतों पर नज़र पश्चिमी देशों की भी थी. क्योंकि दो दो विश्वयुद्ध लड़ने के बाद किसी खास देश की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की ही अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी थी.

दरअसल, हर कोई अरब देशों में फूटी तेल की इसी गंगा में हाथ धो लेना चाहता था. खासकर अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत यूनियन. मगर 50 के दशक में अमेरिका सुपर पॉवर बन चुका था लिहाज़ा दुनिया के हर कोने में उसने दखल देना शुरू कर दिया. कुछ जगहों पर उसे कामयाबी मिली लेकिन ईरान में वो नाकामयाब रहा.

ईरान में अमेरिका का हनीमून पीरियड अब बस खत्म होने वाला था. क्योंकि उनके इस मखमली रास्ते में चट्टान की तरह खड़े होने वाले थे आयतुल्लाह रुहुल्लाह खुमैनी. जो अमेरिका को ईरानी लोगों की ज़बरदस्ती की दोस्ती के बाद ज़बरदस्त दुश्मनी दिखाने वाले थे.

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