बंगाल की ज़मीन पर एक ऐसी खूनी साजिश रची गई, जिसने चार राज्यों के अपराधियों को एक धागे में जोड़ दिया. मामला है चंद्रनाथ की हत्या का. जिसके लिए करोड़ों रुपये की सुपारी दी गई, और कत्ल का पूरा ऑपरेशन मोबाइल एप के जरिए कंट्रोल होता रहा. शूटरों को हर पल लोकेशन अपडेट मिलती रही, जबकि पर्दे के पीछे बैठा क्राइम सिंडिकेट मौत का पूरा खेल चला रहा था. आखिर कौन थे इस हाईटेक मर्डर प्लान के मास्टरमाइंड, और कैसे 4 राज्यों के गैंगस्टरों ने मिलकर रची खून की ये साजिश? जानते हैं सिलसिलेवार कहानी.
कोलकाता से करीब 20 किलोमीटर दूर मौजूद है मध्यमग्राम का शैलेशपाड़ा इलाका, जहां बुधवार 6 मई की रात कातिलों ने पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी के पीए चंद्रनाथ रथ को अपनी गोलियों का निशाना बनाया था. इस केस की तफ्तीश अपने हाथ में लेने के बाद सीबीआई की टीम अब तक दो-दो बार मौका-ए-वारदात का जायजा ले चुकी है. ब्लड स्टेन यानी खून के धब्बों और बैलिस्टिक एविडेंस कलेक्ट करने से लेकर सीन ऑफ क्राइम के एक-एक इंच की मैपिंग कर पूरे घटनाक्रम को समझने की कोशिश कर चुकी है. फुटप्रिंट और फिंगर प्रिंट जैसे फिजिकल एविडेंस भी जुटाए हैं.
उधर, राज सिंह, मयंक राज मिश्र और विक्की मौर्या की सूरत में सीबीआई के पास इस केस के तीन शूटर तो खैर पहले से ही मौजूद हैं. ऐसे में अब अगर कुछ बाकी है, तो वो है पूरे शूटआउट की कहानी को समझना और उस मास्टरमाइंड तक पहुंचना, जिसने से चंद्रनाथ के कत्ल की साजिश रची और सुपारी दी. जाहिर है इसके बाद ही सीबीआई चंद्रनाथ रथ की हत्या की असली वजह यानी मोटिव पर से पर्दा उठा पाएगी. लेकिन अब तक की तफ्तीश में ही इस केस को लेकर सीबीआई को जो कुछ पता चला है, वो भी कम चौंकाने वाला नहीं है.
भले ही इस केस का कनेक्शन फिलहाल यूपी, बिहार और झारखंड तक से जुड़ता नजर आ रहा हो, लेकिन चंद्रनाथ का दुश्मन कोई दूर बैठा शख्स नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के मध्यग्राम का ही लोकल आदमी है, जिसने उनके नाम की सुपारी दी थी. अब अगर इस लोकल के पीछे भी किसी और का हाथ हो, तो वो सच तफ्तीश में सामने आ सकता है.
सूत्रों की मानें तो बिहार के बक्सर से गिरफ्तार मयंक राज मिश्र और विक्की मौर्या ने ये कबूला है कि उन्हें जिसने चंद्रनाथ के कत्ल की सुपारी दी, वो शख्स मध्यमग्राम का ही है. इस आदमी ने पहले चंद्रनाथ की लोकेशन साझा की, उनका मूवमेंट ट्रैक करने में शूटरों की मदद की और फिर इसी आदमी ने सिग्नल एप पर कत्ल का ऑर्डर भी दिया था. फिलहाल सीबीआई मध्यमग्राम के इस शख्स की तलाश में जुटी है, ताकि बाकी कड़ियों को जोड़ा जा सके.
असल में शूटरों की शक्ल में सीबीआई के हाथ इस केस के तीन अहम कड़ी जरूर लगे हैं, लेकिन ये भी सही है कि इस मर्डर केस को लेकर तीनों को ए-टू-जेड सारी जानकारी नहीं है. कम से कम तीनों से अब तक हुई पूछताछ के बाद तो कुछ ऐसे ही संकेत मिले हैं. बहुत मुमकिन है कि कत्ल की साजिश रचने वाले शख्स ने भी अपने बारे में पहले से ही कम से कम जानकारी शेयर की हो. ताकि वो मामले की सीक्रेसी बनाए रखने के साथ-साथ खुद को कानून की नजरों से भी छुपाए रख सके. इसलिए सीबीआई के लिए अब साजिश की तह तक पहुंचने के लिए डिजिटल एविडेंस एक अहम कड़ी साबित हो सकते हैं.
अब बात जब डिजिटल एविडेंस की चल रही है, तो बक्सर के शूटर मयंक राज मिश्र के बारे में बात करना जरूरी हो जाता है. सीबीआई के सूत्रों का कहना है कि शूटआउट को अंजाम देने के लिए इस केस के मास्टरमाइंड ने मयंक राज मिश्र को ही फंड मैनेजर के तौर पर चुना था. असल में बक्सर से लेकर यूपी होते हुए बंगाल पहुंचने तक ये मयंक ही था, जिसने पूरे रास्ते में पड़ने वाले सभी टोल नाकों पर अपने मोबाइल से यूपीआई पेमेंट की.
बंगाल पुलिस ने हावड़ा के बाली टोल गेट पर किए गए यूपीआई पेमेंट को ट्रैक करते हुए ही शूटरों को धर दबोचा था. लेकिन अब जानकारी मिली है कि शूटरों ने सिर्फ बाली टोल गेट पर नहीं, बल्कि पूरे रास्ते के तमाम टोल नाकों पर यूपीआई के जरिए पेमेंट की थी. और इस यूपीआई का ओनर मयंक राज मिश्र ही था. जाहिर है मयंक को इसके लिए पैसे दिए गए थे, जिन्हें वो अपने एकाउंट में रख कर यूज कर रहा था.
सूत्रों का दावा है कि चंद्रनाथ के कत्ल की साजिश कोई आनन-फानन में नहीं रची गई, बल्कि इसके लिए काम महीने भर से भी ज्यादा समय से चल रहा था. क़रीब महीने भर से तो चंद्रनाथ की तस्वीरें और पल-पल की लोकेशन किराये के कातिलों को शेयर की जा रही थी. ताकि वो टारगेट को अच्छी तरह पहचानने के साथ-साथ उसके मूवमेंट को भी ठीक तरह से समझ लें. मसलन वो कहां रहते हैं, क्या करते हैं, घर से कब निकलते हैं, कहां जाते हैं, कब लौटते हैं वगैरह-वगैरह. शूटर बंगाल चुनाव के दौरान ही एक बार चंद्रनाथ रथ के काफी करीब आ चुके थे. इरादा उन्हें सेकेंड फेज के चुनाव से पहले ही टारगेट करने का था. लेकिन पूरे राज्य में मौजूद चुनावी भीड और भारी सुरक्षा व्यवस्था के चलते शूटरों को तब ये प्लान टालना पड़ा.
कातिलों ने खर्च किए एक करोड़ से ज्यादा
सीबीआई से जुड़े सूत्रों का दावा है कि पूरे काम को अंजाम देने में कम से कम 1 करोड़ रुपये या फिर उससे भी ज्यादा की रकम लगाई गई. इनमें तकरीबन 70 लाख रुपये तो सुपारी के तौर पर ही दिए गए. इसके अलावा बाकी के खर्चे भी थे. शूटरों के पास ग्लॉक कम से कम दो ग्लॉक 47एक्स लेवल के पिस्टल होने की बात सामने आई है. कुछ चश्मदीदों ने दावा किया है कि एक शूटर एक ही हथियार से लगातार नॉन स्टॉप फायरिंग कर रहा था और ऐसी फायरिंग बेहद सॉफिस्टिकेटेड हथियार से ही की जा सकती है. किसी देसी कट्टे से नहीं.
वैसे भी जो क्राइम सिंडिकेट इतने बड़े आदमी को टारगेट कर रहा हो, जिसका नेक्सस 4 या फिर उससे भी राज्यों से जुड़ा हो, उसके शूटर किसी काम चलाऊ हथियार से दो गोली चलाएंगे नहीं. ऐसे हथियारों के बारे में कहा जा सकता है कि ये ब्लैक मार्केट में 10 लाख रुपये तक में मिलते हैं. इस हिसाब से भी देखें तो रकम आसानी से 90 लाख रुपये तक पहुंच जाती है. फिर इसके अलावा गाड़ी और बाइकों का इंतजाम करना, उनके लिए बिल्कुल असली से दिखने वाले फेक नंबर प्लेट जुगाड़ करना, चेसिस नंबर तक घिस देना, महीने भर से भी ज्यादा समये से टारगेट का पीछा करना, इन कामों में भी पैसा लगता है.
तफ्तीश के दौरान शूटआउट में इस्तेमाल की गई निसान माइक्रा कार के बारे में भी जानकारी काफी हद तक साफ हुई है. खबरों के मुताबिक इस कार का इंतजाम केस से जुड़े बक्सर का शूटर मयंक राज मिश्र ने ही किया था. हालांकि कार बिहार नहीं, बल्कि झारखंड की बताई जाती है. जिसे पहले लिफ्ट किया गया और फिर इस काम में यूज किया गया. इस तरह इस केस का कनेक्शन अब तक बंगाल के बाहर यूपी, बिहार और झारखंड से भी जुड़ता नजर आ रहा है. ये कहा जा रहा है कि शूटआउट के नेटवर्क के इसी फैलाव को देखते हुए ही बंगाल सरकार ने इस केस को सीबीआई के हवाले करने का फैसला किया. ताकि एक सेंट्रल एजेंसी के तौर पर वो खुल कर इस मामले की तफ्तीश कर सके.
कुछ इसी बात को ध्यान में रखते हुए सीबीआई ने 8 ऑफिसर्स की एक ऐसी एसआईटी बनाई, जिसमें सभी राज्यों के अफसरों को शामिल किया गया. जिनमें सबसे ऊपर नई दिल्ली से सीबीआई के डीआईजी पंकज कुमार सिंह का नाम है, जबकि इसके बाद नई दिल्ली से ही दो एसपी सुभाष चंद्र कुंडू और अनिल कुमार यादव हैं. जबकि अगला नाम झारखंड के धनबाद डीएसपी विकास पाठक का है. इसके बाद पटना और रांची के डीएसपी अमित कुमार और कुलदीप हैं, जबकि लखनऊ के सीबीआई इंस्पेक्टर विवेक श्रीवास्तव को भी इस टीम में रखा गया है. ये ऑर्डर बताता है कि इस टीम की तरफ से की जाने वाली जांच का सुपरविजन कोलकाता के ज्वाइंट डायरेक्टर करेंगे, जो जरूरत पड़ने में इस टीम में और भी अफसरों को शामिल करने का फैसला कर सकते हैं.
अब तक सामने आ चुके इन सीसीटीवी फुटेज के अलावा तफ्तीश में कुछ और सीसीटीवी फुटेज भी सीबीआई के हाथ लगे हैं, जिससे शूटआउट को अंजाम देने का पूरा सिक्वेंस की काफी हद तक क्लियर होता दिख रहा है. इन फुटेज के मुताबिक मयंक राज मिश्र ही इस निसान माइक्रा कार को लेकर चला था. कत्ल से पहले वो बंगाल पहुंचने के बाद जशोर रोड इलाके में बिराटी मोड़ के पास इस गाड़ी से उतरा. जिसके बाद ये कार बारासात के 11 नंबर रेलवे फाटक के पास पहुंचाई गई. जहां एक दुकान के सामने कार कत्ल वाले दिन शाम 4 बजकर 5 मिनट से 6 बजकर 55 मिनट तक खड़ी रही. जिसके बाद कातिल कार को लेकर आगे निकल गए.
अब चूंकि इस केस के तीन शूटर पुलिस के हाथ लग चुके हैं. शूटआउट के बाद इन तीनों के साथ-साथ बाकी के शूटरों के भागने का रूट मैप भी काफी हद तक क्लियर हो चुका है. जानकारी के मुताबिक वारदात को अंजाम देने के बाद दोहड़िया इलाके से शूटर अलग-अलग दिशाओं में निकल गए. लेकिन इसके बाद सभी के सभी फिर से रात 11 बजे सियालदह स्टेशन पर इकट्ठा हुए और वहां से यूपी और बिहार के लिए ट्रेन पकड़ी.
(कोलकाता से तापस सेनगुप्ता और लखनऊ से संतोष शर्मा के साथ अरविंद ओझा और सुप्रतिम बनर्जी का इनपुट)
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