जब से डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, तभी से अमेरिका के कई देशों के साथ रिश्ते तल्ख होते जा रहे हैं. चीन और रूस के साथ पहले से ही तनातनी है. लेकिन अब भारत समेत कई देशों के साथ भी रिश्तों में तनाव की आहट है.
ताजा मामला यूरोपीय देशों के साथ अमेरिकी रिश्तों को लेकर है. इन देशों के साथ भी अब डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ धमकी वाली रणनीति अपनाई है. जिससे ग्लोबल मार्केट पर असर देखने को मिल रहा है. तमाम अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में गिरावट हावी है. सोमवार को इसी कारण से भारतीय बाजार में भी भारी गिरावट देखी गई.
दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोप के कुल 8 देशों को ग्रीनलैंड को लेकर टैरिफ लगाने की धमकी दी है. इन देशों में डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन), नीदरलैंड और फिनलैंड शामिल हैं.
ट्रंप ग्रीनलैंड पर कब्जे की तैयारी में हैं, इस बीच उन्होंने ऐलान किया है कि 1 फरवरी 2026 से इन 8 देशों के सभी सामान पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाएगा, वहीं अगर ये देश अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड खरीदने को समर्थन नहीं करते हैं तो फिर 1 जून से यह टैरिफ बढ़ाकर 25% तक किया जाएगा.
भारत के लिए कैसे मौका?
EU पर टैरिफ लगने से यूरोपीय सामान अमेरिका में महंगा हो जाएगा. ऐसे में भारत एक विकल्प बन सकता है, खासकर फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट्स, ऑटो पार्ट्स, स्टील और इंजीनियरिंग गुड्स, आईटी और बिजनेस सर्विसेज सेक्टर्स के लिए मौके हो सकते हैं.
EU और US के बीच तनाव बढ़ने पर मल्टीनेशनल कंपनियां न्यूट्रल और ग्रोथ मार्केट ढूंढ़ती हैं, जिसके लिहाज से भारत एक ठिकाना हो सकता है. वहीं अगर बदले में यूरोपीय देश भी अमेरिका पर टैरिफ लगाते हैं तो फिर EU में US से आने वाले प्रोडक्ट महंगे हो जाएंगे, यहां भी भारत विकल्प बन सकता है. खासकर फार्मा और मेडिकल डिवाइसेज, टेक्सटाइल, गारमेंट्स, लेदर,ऑटो पार्ट्स और केमिकल्स सेक्टर्स में.
क्या है ट्रंप की कोशिश?
ट्रंप का मानना है कि ग्रीनलैंड की भू-रणनीतिक स्थिति और उसके संसाधन अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के लिए महत्वपूर्ण हैं और उन्होंने इसे 'ग्लोबल पीस एंड सिक्योरिटी' से जोड़कर बताया है. इसी कड़ी में वो यूरोपीय देशों पर दबाव बना रहे हैं.
ट्रंप का ये बयान अमेरिका-नाटो सहयोगियों के बीच रिश्तों को तनाव में डाल रहा है, क्योंकि ये सभी देश नाटो के सदस्य हैं और अमेरिका के मजबूत सहयोगी रहे हैं. ट्रंप के इस ऐलान का विरोध भी होने लगा है, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि धमकियां मंजूर नहीं है, और यूरोपीय संघ ने ट्रांसअटलांटिक व्यापार समझौते पर बातचीत को रोक दिया है, जिससे अमेरिका-EU के बीच आर्थिक तनाव और बढ़ गया है.
अब सवाल उठता है कि अगर सही में ट्रंप यूरोपीय देशों पर टैरिफ पहले 10 फीसदी फिर उसे बढ़ाकर 25 फीसदी करते हैं, तो उसका क्या असर होगा. सबसे पहले आर्थिक तनाव बढ़ सकता है, आठ बड़े यूरोपीय देशों की वस्तुएं महंगी होंगी, जिससे व्यापार प्रभावित होगा. नाटो जैसे सुरक्षा गठबंधन में भरोसा कमजोर हो सकता है.
क्या ट्रंप अपनी ताकत दिखा रहे हैं?
तमाम जानकार ट्रंप के इस कदम को रणनीतिक दबाव और शक्ति प्रदर्शन का हिस्सा मान रहे हैं. ट्रंप न केवल ग्रीनलैंड को हासिल करने की अपनी मांग को आगे बढ़ा रहे हैं, बल्कि वह संयुक्त राष्ट्र, नाटो सहयोगियों और व्यापार साझेदारों पर भी दबाव डाल रहे हैं कि वे अमेरिका के हितों के अनुरूप व्यवहार करें.
EU-US के बीच बड़ा व्यापार
हर साल अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच हजारों अरब डॉलर का कारोबार होता है, अमेरिका यूरोप को एनर्जी, टेक्नोलॉजी और डिफेंस से जुड़े कई आधुनिक चीजें सप्लाई करता है. बदले में यूरोप अमेरिका को मशीनरी, ऑटो पार्टस, केमिकल्स और फार्मास्यूटिकल्स उत्पाद निर्यात करता है. इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स की बात मानें तो अगर यह तनाव सीमित रहता है तो नुकसान कंट्रोल में रहेगा, जबकि तनाव गहराने से यूरोप की GDP पर 0.5 से 1% तक दबाव आ सकता है.
बता दें, EU-US के बीच प्रोडक्ट और सर्विस को मिलाकर व्यापार का कुल मूल्य करीब $1.7 ट्रिलियन का है, जो दुनिया के सबसे बड़े द्विपक्षीय ट्रेड पार्टनर संबंधों में से एक है. यह लगभग 30% वैश्विक व्यापार और 43% वैश्विक GDP का प्रतिनिधित्व करता है.
अमित कुमार दुबे