अमेरिकी टैरिफ (Tariff) बढ़ने से जो सेक्टर्स सबसे ज्यादा दबाव में थे, उन्हीं सेक्टर्स में अब टैरिफ कम होने से तेजी देखने को मिलेगी. इस डील का इंतजार उद्योग जगत करीब 10 महीने से कर रहा है. ट्रंप प्रशासन ने पहली बार भारत अप्रैल-2025 में 25% टैरिफ लगाया था, फिर रूसी तेल खरीदने पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया. लेकिन अब भारतीय प्रोडक्ट पर केवल 18 फीसदी लगाया जाएगा.
दरअसल, अमेरिका के साथ ट्रेड डील (Trade Deal) के बाद अब कई सेक्टर्स के लिए नए अवसर खुलते दिख रहे हैं. टैरिफ में राहत, सप्लाई चेन में ठहराव और व्यापारिक अनिश्चितता के कम होने से खासतौर पर 5 सेक्टर ऐसे हैं, जिन्हें इस समझौते से सबसे ज्यादा फायदा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है.
आईटी सेक्टर को सबसे ज्यादा फायदा
अमेरिका भारत के आईटी उद्योग का सबसे बड़ा बाजार है. टैरिफ घटने और व्यापारिक रिश्तों के मजबूत होने से आईटी कंपनियों को नए प्रोजेक्ट मिलने की संभावना बढ़ी है. डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में मांग तेज हो सकती है. इसका फायदा सिर्फ बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मिड कैप और स्मॉलकैप आईटी कंपनियां भी नए कॉन्ट्रैक्ट हासिल कर सकती हैं. TCS, Infosys ही नहीं, मिडकैप IT को भी अच्छा-खासा फायदा होने वाला है.
फॉर्मा के लिए राहत की खबर
दूसरा अहम सेक्टर फार्मा और हेल्थकेयर है. भारतीय फार्मा कंपनियां पहले से ही अमेरिकी बाजार में जेनेरिक दवाओं की बड़ी सप्लायर हैं. टैरिफ बढ़ने से इन कंपनियों की चुनौतियां बढ़ गई थीं. लेकिन अब टैरिफ में कटौती से दवाओं का निर्यात सस्ता हो सकता है. भारतीय कंपनियों के लिए मार्जिन में सुधार और निर्यात में बढ़ोतरी की संभावना है. साथ ही, API और स्पेशलिटी फार्मा सेगमेंट को भी दीर्घकालिक फायदा मिल सकता है.
टेक्सटाइल और गारमेंट इंडस्ट्रीज के लिए बूस्टर डोज
तीसरा सेक्टर टेक्सटाइल और गारमेंट का है. पहले ट्रंप ने वियतनाम और बांग्लादेश पर भारत से कम टैरिफ लगाया था. जिससे इन दोनों इंडस्ट्रीज पर खतरा मंडराने लगा था. बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों पर अमेरिका द्वारा ज्यादा टैरिफ लगाए जाने के बाद भारत को वैकल्पिक सप्लायर के रूप में बढ़त मिल सकती है. रेडीमेड गारमेंट, होम टेक्सटाइल और कॉटन आधारित उत्पादों की अमेरिकी बाजार में मांग बढ़ने की संभावना है. इससे रोजगार सृजन और उत्पादन क्षमता दोनों को मजबूती मिल सकती है.
ऑटो कंपोनेंट्स सेक्टर के लिए राहत
चौथा सेक्टर इंजीनियरिंग गुड्स और ऑटो कंपोनेंट्स का है. ट्रेड डील से मशीनरी, ऑटो पार्ट्स और इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट के निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है. अमेरिका की 'चीन+1' रणनीति के तहत भारतीय कंपनियों को सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका मिलने की उम्मीद है, जिससे खासकर स्मॉल और मिडकैप कंपनियों को फायदा हो सकता है.
केमिकल सेक्टर के लिए भी बूस्टर डोज
5वां और तेजी से उभरता सेक्टर केमिकल्स और स्पेशलिटी केमिकल्स का है. अमेरिका चीन पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक स्रोत तलाश रहा है. ऐसे में भारतीय केमिकल कंपनियों को लॉन्ग-टर्म ऑर्डर और बेहतर प्राइसिंग पावर मिलने की संभावना है.
आजतक बिजनेस डेस्क